जन्माष्टमी का जागरण – अधिकतर लोग मंदिर जाते हैं, दो घंटे भजन सुनते हैं, 12 बजे आरती देखते हैं और घर लौट आते हैं। यह भी एक पुण्य का काम है। लेकिन जो भक्त पूरी रात – संध्या से लेकर सूर्योदय तक – नाम जप में बिताना चाहते हैं, उनके लिए इस जागरण को घंटे-दर-घंटे…
सुबह का वक्त है। घर में गेंदे के फूलों की हल्की खुशबू है। कहीं से छोटी-सी घंटी की आवाज़ आती है – और फिर एक नन्ही-सी चांदी की घुंघरू की झंकार। किसी ने अपने लड्डू गोपाल को उठाया है। कपड़े बदले हैं। माखन-मिश्री की छोटी कटोरी सामने रखी है। और बस, दिन शुरू हो गया…
रात के 11 बज रहे हैं। आप जागते हुए बैठे हैं – दीपक जल रहा है, घर में भजन की आवाज़ है, मन में हलचल है। जन्माष्टमी की यह रात साल में एक बार आती है। निशीथ काल में कृष्ण के जन्म की वह घड़ी बस कुछ मिनट दूर है। और अब सवाल यह नहीं…
जन्माष्टमी का व्रत किसी ने आप पर थोपा नहीं है। आपने खुद चुना। और यही भेद है जो इस व्रत को खास बनाता है: यह भूख का व्रत नहीं, प्रेम का संकल्प है। एक दिन कह देना कि “आज मैं कृष्ण के साथ हूं” – यही है इस व्रत की आत्मा। बाकी सब – क्या…
मंदिर बंद हो, पंडित न आ सके, या आप किसी छोटे शहर में अकेले हों – घर पर जन्माष्टमी की पूजा उतनी ही पावन है जितनी किसी बड़े मंदिर में। श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है: “पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति।” जो प्रेम से पत्ता, फूल, फल या जल अर्पित करे –…
रात के ग्यारह बज रहे हैं। घर में बाकी सब सो चुके हैं। एक दीपक टिमटिमा रहा है। झूला सजा है, मूर्ति नहाई हुई है, और आप एक पल का इंतज़ार कर रहे हैं – रात 11 बजकर 57 मिनट का। यही है जन्माष्टमी का निशीथ काल। 45 मिनट का वह दरवाज़ा जब – परंपरा…
सावन सोमवार का व्रत रखने का निर्णय मन में आते ही अक्सर पहला सवाल यही होता है – “आज खाऊं क्या?” और फिर शुरू होती है असमंजस की एक लंबी सुबह। फोन पर search करो तो किसी ने एक सूची दी है, किसी ने दूसरी। माँ कह रही हैं एक बात, पड़ोसन कह रही हैं…
कभी आपने यह महसूस किया है – कथा सुन रहे हैं, लेकिन मन कहीं और भटक रहा है? कथा का एक शब्द कान में जाता है, दूसरा निकल जाता है। सावन सोमवार का व्रत है, थाली सजी है, माहौल बना है – पर भीतर से कोई गहराई महसूस नहीं होती। यह एक बहुत आम अनुभव…
अगस्त का पहला हफ़्ता था। पुणे में रहने वाली एक महिला का दिल्ली की बहन से फ़ोन पर झगड़ा हो गया – “तुमने सावन का व्रत शुरू क्यों नहीं किया? जुलाई के आखिर से ही सावन शुरू हो गया था!” पुणे वाली बहन हैरान – उसके पंडित जी ने तो 13 अगस्त से श्रावण बताया…
सावन का वन हरा था। आकाश घने बादलों से भरा था। और हिमालय की एक कन्या – हाड़-मांस की देह लेकर – उस ठंडी पथरीली धरती पर बैठी थी, आंखें बंद, ओठ हिलते हुए, बस एक ही नाम पर टिकी हुई – शिव। यह तपस्या वर्षों की नहीं, सहस्राब्दियों की थी। न भोजन, न जल,…