जय संतोषी माता: आरती और व्रत कथा – संपूर्ण पाठ अर्थ सहित
इस पृष्ठ पर संतोषी माता की पूरी आरती और शुक्रवार व्रत कथा का संपूर्ण पाठ दिया गया है – हिंदी में, अर्थ सहित। शुक्रवार के व्रत में पढ़ें।
जय संतोषी माता आरती
स्रोत: यह आरती 20वीं शताब्दी की लोक-परंपरा की देन है और भारत भर में शुक्रवार व्रत में गाई जाती है। यह सार्वजनिक लोक-आरती (public domain) है।
जय संतोषी माता, जय संतोषी माता।
अपने सेवक जन की सुख-सम्पत्ति दाता॥अर्थ: हे संतोषी माता – आपकी जय हो। आप अपने सेवकों को सुख और सम्पत्ति देने वाली हैं।
सुन्दर चीर सुनहरी माता, धारण किए हुए हो।
हरे-भरे वन की देवी, कानन में रहती हो॥
जय संतोषी माता…अर्थ: माँ सोने जैसे सुंदर वस्त्र धारण किए हुई हैं। हरे-भरे वन की देवी, वनों में निवास करती हैं।
चाँद सूरज जिनकी ज्योती, वेद जिनके गाते।
ऐसी माँ का ध्यान धरते, भक्त सब जन आते॥
जय संतोषी माता…अर्थ: चाँद और सूरज जिनकी ज्योति हैं, वेद जिन्हें गाते हैं। ऐसी माँ का ध्यान करने सब भक्त आते हैं।
सोलह शुक्रवार का व्रत, सेवक जो धारे।
मन की इच्छा पूर्ण होती, दुखड़े सब टारे॥
जय संतोषी माता…अर्थ: जो भक्त 16 शुक्रवार का व्रत करता है, उसकी मनोकामना पूरी होती है और सब दुख दूर होते हैं।
गुड़ और चने का भोग लगाओ, मैया को चढ़ाओ।
खटाई से दूर रहो, यह नियम निभाओ॥
जय संतोषी माता…अर्थ: गुड़ और चने का प्रसाद माँ को चढ़ाओ। खटाई (खट्टी चीज़ों) से दूर रहो – यह व्रत का नियम निभाओ।
भक्त की लाज रखो माता, शरण में लो मुझे।
संतोषी माँ के चरणों में, अर्पण हूँ मैं तुझे॥
जय संतोषी माता…अर्थ: हे माता, भक्त की लाज रखो और शरण में लो। संतोषी माँ के चरणों में स्वयं को अर्पण करता हूँ।
संतोषी माता व्रत कथा
शुक्रवार व्रत में आरती के बाद यह कथा पढ़ी जाती है। कथा पढ़ते समय हाथ जोड़कर बैठें।
एक नगर में एक बुढ़िया रहती थी। उसके सात बेटे थे। छह बेटे कमाते थे, एक बेटा बहुत गरीब था। बुढ़िया का छोटा बेटा बेरोजगार था और उसकी बहू बहुत दुखी रहती थी।
एक दिन उस बहू ने कुछ स्त्रियों को शुक्रवार का व्रत करते देखा। उसने पूछा – यह कौन सा व्रत है? स्त्रियों ने बताया – यह संतोषी माता का व्रत है। 16 शुक्रवार सच्चे मन से व्रत करने पर माँ सब मनोकामना पूरी करती हैं। बस खटाई न खाओ और गुड़-चने का प्रसाद चढ़ाओ।
बहू ने व्रत आरंभ किया। वह प्रतिशुक्रवार माँ का ध्यान करती, आरती गाती, कथा सुनती और गुड़-चने का प्रसाद चढ़ाती। उसके मन में गहरी श्रद्धा थी।
माँ संतोषी प्रसन्न हुईं। उन्होंने उसके पति के मन में प्रेरणा जगाई। पति परदेश गया, मेहनत की और धन कमाकर लौटा। घर में सुख-समृद्धि आई। बहू ने 16 शुक्रवार पूरे होने पर उद्यापन किया – आठ लड़कों को भोजन कराया, माँ को धन्यवाद दिया।
माँ संतोषी ने कहा: जो भी सच्चे मन से मेरा व्रत करेगा, उसकी मनोकामना अवश्य पूरी होगी। बस एक नियम – खटाई (खट्टी चीज़) व्रत के दिन न खाएं और किसी को न खिलाएं।
बोलो संतोषी माता की जय।
व्रत की पूरी विधि
- कब शुरू करें: किसी भी शुक्रवार से व्रत शुरू कर सकते हैं। लगातार 16 शुक्रवार व्रत रखें।
- व्रत का समय: सुबह से शाम की पूजा तक उपवास रखें। पूजा के बाद फलाहार या एक समय का सात्विक भोजन कर सकते हैं।
- प्रसाद: गुड़ और भुने चने (काले चने नहीं, पीले/हरे चने) माँ को चढ़ाएं। यही प्रसाद वितरित करें।
- खटाई का नियम: व्रत के दिन खट्टी चीज़ें – इमली, नींबू, आमचूर, दही, अचार, खटाई – न खाएं। घर में भी किसी को न खिलाएं।
- उद्यापन: 16 शुक्रवार पूरे होने पर उद्यापन करें। आठ लड़कों को भोजन कराएं और माँ को कृतज्ञता अर्पित करें। उद्यापन के बाद व्रत का नियम पूरा होता है।
- जप के साथ व्रत: व्रत के दिन “ॐ संतोष्यै नमः” या “जय माँ संतोषी” का जप करें। Devta App पर अपने जप का हिसाब रखें – माँ संतोषी का ध्यान करते हुए जप की संख्या देखना प्रेरणा देता है।
संतोषी माता कौन हैं
संतोषी माता की उपासना 20वीं शताब्दी में विशेष रूप से फली-फूली, खासकर उत्तर और मध्य भारत में। “संतोषी” शब्द “संतोष” से बना है – वे संतोष, तृप्ति और सुख की देवी हैं। एक लोक-परंपरा के अनुसार वे भगवान गणेश और माँ रिद्धि की पुत्री हैं।
1975 में आई फिल्म “जय संतोषी माँ” ने उनकी उपासना को पूरे देश में फैलाया। लेकिन उनके भक्तों की संख्या इस फिल्म से पहले भी थी – राजस्थान और मध्यप्रदेश के गाँवों में उनकी उपासना लंबे समय से चली आ रही है।
उनकी विशेषता है सरलता। न जटिल पूजन-विधान, न महंगे उपचार। केवल सच्चा मन, गुड़-चने का साधारण प्रसाद, और खटाई के त्याग का एक नियम। यही उनकी उपासना का मर्म है।
संतोषी माता का व्रत किस दिन रखा जाता है?
संतोषी माता का व्रत शुक्रवार को रखा जाता है। व्रत 16 शुक्रवार तक रखा जाता है। इस दिन खट्टी चीज़ें नहीं खाते और गुड़-चने का प्रसाद चढ़ाते हैं।
संतोषी माता कौन हैं?
संतोषी माता भगवान गणेश और माँ रिद्धि की पुत्री हैं – ऐसी एक लोक-परंपरा है। ‘संतोषी’ शब्द ‘संतोष’ से बना है – वे संतोष और तृप्ति की देवी हैं। उनकी उपासना से घर में शांति, सुख और समृद्धि आती है।
संतोषी माता के प्रसाद में क्या चढ़ाएं?
संतोषी माता को गुड़ और भुने चने का प्रसाद चढ़ाएं। खट्टी चीज़ें (इमली, नींबू, दही, खटाई) व्रत के दिन वर्जित हैं। प्रसाद में खटाई न मिलाएं।
संबंधित लेख