कृष्ण आरती - aarti-kunj-bihari-ki-arth-sahit

श्री कृष्ण आरती: आरती कुंजबिहारी की – अर्थ सहित

शाम ढलते ही वृंदावन के हर मंदिर में एक ही धुन गूंजने लगती है – “आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की।” यह श्री कृष्ण की सबसे प्रिय और सबसे ज्यादा गाई जाने वाली आरती है, फिर भी बहुत कम लोग जानते हैं कि इसकी हर पंक्ति में क्या छिपा है। नीचे इस आरती का पूरा पाठ है, हर श्लोक के बाद उसका सरल हिंदी अर्थ, ताकि अगली बार जब आप यह आरती गाएं तो सिर्फ शब्द नहीं, भाव भी आपके साथ हो।

पूरी आरती अर्थ सहित

यह आरती ब्रजभाषा में रची गई एक पारंपरिक रचना है और पीढ़ियों से मौखिक और लिखित रूप में एक जैसी चली आ रही है। आरती का मुखड़ा हर श्लोक के बाद दोहराया जाता है, ठीक वैसे ही जैसे नीचे दिखाया गया है।

आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की।

अर्थ: यह वृंदावन के कुंजों (लताओं-गुल्मों से घिरे रमणीय स्थलों) में विचरण करने वाले श्री कृष्ण की आरती है – वही कृष्ण जिन्होंने गोवर्धन पर्वत को गिरि की तरह धारण किया (गिरिधर) और जो मुरा नामक असुर का नाश करने वाले (मुरारी) हैं।

गले में बैजंती माला, बजावै मुरली मधुर बाला।
श्रवण में कुण्डल झलकाला, नंद के आनंद नंदलाला।
आरती कुंजबिहारी की…

अर्थ: कृष्ण के गले में वैजयंती माला सुशोभित है, वे अपनी मधुर मुरली बजा रहे हैं, कानों में कुंडल झिलमिला रहे हैं – यही हैं नंद बाबा के आनंद, नंदलाला।

गगन सम अंग कांति काली, राधिका चमक रही आली।
लतन में ठाढ़े बनमाली, भ्रमर सी अलक, कस्तूरी तिलक, चंद्र सी झलक, ललित छवि श्यामा प्यारी की।
आरती कुंजबिहारी की…

अर्थ: श्याम वर्ण की देह की कांति आकाश जैसी गहरी और अनंत है, और उनके साथ राधिका जी सखियों के बीच दमक रही हैं। लताओं के बीच खड़े वनमाली कृष्ण की अलकें भंवरे-सी घुंघराली हैं, माथे पर कस्तूरी का तिलक और मुख पर चंद्रमा-सी आभा – राधा-श्याम की यह छवि अत्यंत ललित और प्रिय है।

कनकमय मोर मुकुट बिलसै, देवता दरसन को तरसैं।
गगन सों सुमन रासि बरसै, बजे मुरचंग, मधुर मिरदंग, ग्वालिन संग, अतुल रति गोप कुमारी की।
आरती कुंजबिहारी की…

अर्थ: स्वर्ण-जड़ित मोर-पंख मुकुट शोभायमान है, स्वयं देवता भी इस रूप के दर्शन के लिए तरसते हैं। आकाश से फूलों की वर्षा हो रही है, मुरचंग और मृदंग की मधुर ध्वनि गूंज रही है, और गोपियों के साथ गोप-कुमारी (राधा) का यह अतुलनीय प्रेम-रास चल रहा है।

जहां ते प्रकट भई गंगा, सकल मन हारिणि श्री गंगा।
स्मरन ते होत मोह भंगा, बसी शिव सीस, जटा के बीच, हरै अघ कीच, चरन छवि श्रीबनवारी की।
आरती कुंजबिहारी की…

अर्थ: जिन चरणों से गंगा प्रकट हुईं और जो सबके मन का हरण करने वाली हैं, जिनके स्मरण मात्र से मोह-माया का बंधन टूट जाता है, वही गंगा भगवान शिव की जटाओं में विराजमान होकर सबका पाप-कीचड़ हर लेती हैं – यह उन्हीं श्री बनवारी (वनों में विहार करने वाले कृष्ण) के चरणों की महिमा है।

चमकती उज्ज्वल तट रेनू, बज रही वृंदावन बेनू।
चहुं दिसि गोपि ग्वाल धेनू, हंसत मृदु मंद, चांदनी चंद, कटत भव फंद, टेर सुन दीन दुखारी की।
आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की।

अर्थ: यमुना के तट की रेत चांदनी में चमक रही है, वृंदावन में मुरली की धुन बज रही है। चारों दिशाओं में गोपियां, ग्वाल-बाल और गायें हैं, चंद्रमा मंद-मंद मुस्कुरा रहा है – और जो भी दुखी-दीन प्राणी सच्चे मन से पुकारता है, उसका संसार-बंधन कट जाता है, ऐसी है इस आरती की करुणा।

यह पारंपरिक आरती है – सदियों से मौखिक और लिखित परंपरा में चली आ रही है, इसलिए अलग-अलग क्षेत्रों में एक-दो शब्दों का उच्चारण भेद मिल सकता है, पर भाव और क्रम में यही सर्वाधिक प्रचलित रूप है।

आरती कब और कैसे करें

आरती कुंजबिहारी की पारंपरिक रूप से शाम की पूजा में गाई जाती है, खासकर सूर्यास्त के समय जब घर या मंदिर में दीप जलाए जाते हैं। जन्माष्टमी, गोवर्धन पूजा और कृष्ण से जुड़े हर पर्व पर यह आरती विशेष रूप से गूंजती है, लेकिन इसे रोज़ की संध्या-पूजा में भी गाया जा सकता है – इसके लिए किसी विशेष अवसर की ज़रूरत नहीं।

  • दीपक जलाएं: घी या तेल का दीपक थाली में सजाएं, साथ में फूल और अक्षत रख सकते हैं।
  • मूर्ति या चित्र के सामने खड़े हों: श्री कृष्ण की मूर्ति, तस्वीर या मन में उनकी छवि लेकर आरती शुरू करें।
  • दीपक को गोलाकार घुमाएं: आरती के बोल गाते हुए दीपक को धीरे-धीरे दक्षिणावर्त (clockwise) घुमाएं।
  • अंत में आरती लें: आरती की लौ को दोनों हाथों से लेकर आंखों और सिर पर स्पर्श करें – यह श्री कृष्ण के तेज को स्वयं में समाहित करने का भाव है।

आरती के बाद अक्सर भक्त कुछ देर कृष्ण-नाम का जप भी करते हैं – “हरे कृष्ण” या केवल “कृष्ण कृष्ण” – क्योंकि आरती जिस भाव को जगाती है, नाम-जप उसी भाव को थोड़ी देर और थामे रखने का सरल तरीका है। अगर मन में डर हो कि माला के दाने या गिनती में उलझ जाएंगे, तो Devta App जैसा जप काउंटर काम आसान बना देता है – बस बोलते जाइए, गिनती अपने आप होती रहती है, और आपका पूरा ध्यान कृष्ण के नाम पर टिका रहता है।

इस आरती का महत्व

आरती कुंजबिहारी की सिर्फ शब्दों की एक कड़ी नहीं, बल्कि श्री कृष्ण के संपूर्ण रूप का एक जीवंत चित्र है – उनका मुकुट, उनकी मुरली, उनकी वैजयंती माला, राधा जी के साथ उनका रास, और वृंदावन का पूरा वातावरण, सब कुछ इन कुछ पंक्तियों में समाया हुआ है। यही वजह है कि यह आरती इतनी पीढ़ियों से इतनी लोकप्रिय बनी हुई है – इसे गाते समय भक्त सिर्फ आरती नहीं करता, वह मानो वृंदावन के उसी कुंज में पहुंच जाता है जहां श्री कृष्ण विराजमान हैं।

आरती की अंतिम पंक्तियां खास तौर पर मार्मिक हैं – “टेर सुन दीन दुखारी की” यानी जो दुखी और दीन पुकारता है, कृष्ण उसकी टेर सुनते हैं। यही भाव आरती को सिर्फ एक रस्म नहीं, बल्कि एक भरोसे का क्षण बना देता है। जो लोग रोज़ श्री कृष्ण के 108 नामों का जप या दर्शन अपनी दिनचर्या में रखना चाहते हैं, उनके लिए यह आरती और नाम-जप दोनों साथ-साथ बहुत स्वाभाविक ढंग से चल सकते हैं – सुबह जप, शाम आरती।

जिनके लिए हर दिन मंदिर जाना या मूर्ति-पूजा की पूरी व्यवस्था करना संभव नहीं, वे भी Devta App पर रोज़ श्री कृष्ण के दर्शन कर सकते हैं और अपनी आरती व जप की निरंतरता को ट्रैक कर सकते हैं – दूरी या समय की कमी अब भक्ति के बीच बाधा नहीं बनती।

अगली बार जब दीपक की लौ उठे और यह आरती शुरू हो, तो हर पंक्ति के साथ उसका अर्थ भी याद रखिए – शब्द वही रहेंगे, लेकिन भाव कहीं गहरा उतरेगा। “आरती कुंजबिहारी की” – यही तो श्री कृष्ण की सबसे मीठी पुकार है।

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आरती कुंजबिहारी की किसने लिखी और यह कब गाई जाती है?

यह एक पारंपरिक आरती है जो सदियों से श्री कृष्ण की पूजा में गाई जाती रही है। इसे रोज़ शाम की आरती में, वृंदावन के मंदिरों में और जन्माष्टमी जैसे पर्वों पर विशेष रूप से गाया जाता है।

आरती कुंजबिहारी की के दौरान क्या करना चाहिए?

दीपक जलाकर श्री कृष्ण की मूर्ति या चित्र के सामने आरती के बोल गाएं, दीपक को गोलाकार घुमाएं, अंत में आरती की लौ को हाथ से लेकर आंखों पर लगाएं और भाव के साथ श्री कृष्ण का नाम जपें।

क्या यह आरती हिंदी में समझने के लिए कठिन है?

शब्द ब्रजभाषा में हैं इसलिए कुछ शब्द अनजान लग सकते हैं, लेकिन हर पंक्ति का सरल हिंदी अर्थ साथ में पढ़ने से पूरा भाव और सुंदरता आसानी से समझ आ जाती है।

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