श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारे: शरणागति के इस श्लोक का जप
shri-krishna-govind-hare-murare-jap-arth-vidhi.jpgएक बार की बात है – एक भक्त किसी मंदिर में बैठा था, माला घुमा रहा था, पर मन भटक रहा था। तब पुजारी जी ने कहा: “बस यह एक श्लोक जपो – श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारे, हे नाथ नारायण वासुदेवाय। इसमें कृष्ण के छह नाम हैं, छह बार शरण।” उस दिन से उस भक्त की माला कभी अधूरी नहीं रही।
यह श्लोक वैष्णव परंपरा में एक विशेष धुन के रूप में प्रचलित है – कृष्ण के उन छह नामों का संग्रह जो शरणागति (पूर्ण समर्पण) के भाव को सबसे सघन रूप से व्यक्त करते हैं। न कोई जटिल विधि, न कोई शुद्धता की शर्त – बस नाम और भाव।
हर नाम का अर्थ: एक-एक शब्द में कृष्ण
इस श्लोक की शक्ति उसके छह नामों में है। हर नाम कृष्ण के एक अलग पहलू को उजागर करता है:
- कृष्ण (Krishna): “कृष्” धातु से – जो सबको आकर्षित करे। जो मन को खींच ले, वही कृष्ण। संसार में सबसे शक्तिशाली चुंबक।
- गोविंद (Govind): “गो” अर्थात् इंद्रियाँ, वेद, और गाएं – इन सबका स्वामी। गोवर्धन उठाने वाले, गोपियों के प्रिय। इंद्रियों पर स्वाभाविक अधिकार जिसका, वह गोविंद।
- हरे (Hare): “हर” धातु से – हरने वाले। पापों को हरने वाले, दुःख को हरने वाले, और भक्त के मन को भी हर लेने वाले।
- मुरारे (Murare): मुर नामक राक्षस के शत्रु। मुर वह राक्षस था जो सोते समय भी पाँच सिरों से रक्षा करता था – कृष्ण ने उसे मारा। अहंकार का नाश करने वाले।
- नारायण (Narayan): “नार” = जल/चेतना; “अयन” = निवास। जो चेतना में निवास करता हो। सर्वव्यापी परमात्मा।
- वासुदेव (Vasudev): वसुदेव के पुत्र और वह जो सब में वास करता हो। “वसु” = सब प्राणियों में। गीता में कृष्ण ने स्वयं कहा: “वासुदेवः सर्वम्” – सब कुछ वासुदेव ही है।
छह नाम जपने का अर्थ है – आकर्षण (कृष्ण), अधिकार (गोविंद), हरण (हरे), अहंकार-नाश (मुरारे), सर्वव्यापकता (नारायण) और सर्वसमावेशिता (वासुदेव) – इन छह भावों के साथ शरण।
यह श्लोक क्यों है विशेष – हरे कृष्ण मंत्र से क्या संबंध?
कई लोग पूछते हैं: यह “श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारे” और “हरे कृष्ण हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे” (महामंत्र) में क्या अंतर है?
महामंत्र कलि-सन्तारण उपनिषद से आया है – 16 नामों की एक विशेष लयबद्ध आवृत्ति जिसे “किसी भी अवस्था में, शुद्ध हों या अशुद्ध, जप करो” का अधिकार दिया गया है। “श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारे” इससे अलग एक परंपरागत नाम-संकलन श्लोक है – इसमें भाव शरणागति का है, आग्रह का नहीं।
दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। महामंत्र की जैसी विधिवत साधना होती है, वैसे इस श्लोक को दैनिक कार्यों में – चलते-फिरते, काम करते हुए – मन ही मन दोहराया जा सकता है। यह “चलते-फिरते नाम-जप” का एक सरल और पूर्ण माध्यम है।
जप विधि – माला हो या न हो
इस श्लोक का जप करने की कोई जटिल विधि नहीं है। परंपरागत रूप से कुछ सुझाव:
- माला के साथ: तुलसी की माला कृष्ण-जप के लिए सर्वोत्तम मानी जाती है। प्रत्येक मनके पर एक बार श्लोक का उच्चारण करें। 108 बार = एक माला।
- माला के बिना: यदि माला न हो या हाथ व्यस्त हो, तो Devta App का जप काउंटर उपयोग करें – स्क्रीन पर एक टैप से एक जप गिना जाता है। गिनती की चिंता हटे तो ध्यान भाव पर टिकता है।
- ध्वनि का स्तर: उपांशु (होठ हिलें, आवाज़ न हो) या मानसिक जप – दोनों उपयुक्त हैं। दिव्य लीला सोसाइटी (dlshq.org) के अनुसार मानसिक जप सबसे शक्तिशाली माना जाता है।
- सर्वोत्तम समय: प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त (सूर्योदय से पहले), और संध्या-काल। लेकिन यह श्लोक किसी भी समय, किसी भी अवस्था में जपा जा सकता है।
Devta App पर कृष्ण जी के दैनिक दर्शन करें और जप काउंटर से इस श्लोक की साधना को नियमित बनाएं। जब जप की संख्या रोज़ दिखती है, तो निरंतरता बनी रहती है।
एक भ्रांति और एक सच
बहुत लोग इस श्लोक को फिल्मी गानों से जोड़ते हैं और सोचते हैं कि “यह तो पुरानी हिंदी फिल्म का गाना है।” यह अधूरी समझ है। परंपरागत श्लोक “श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारे, हे नाथ नारायण वासुदेवाय” सदियों पुराना वैष्णव पाठ है। फिल्मों में इसी धुन का उपयोग हुआ – जैसे अनेक भजन और मंत्र फिल्मों में शामिल हुए। परंपरागत श्लोक का अपना अलग महत्व और शुद्ध रूप है।
दूसरी बात जो लोग भूल जाते हैं: “हे नाथ” से शुरू होने वाला दूसरा भाग (“हे नाथ नारायण वासुदेवाय”) उतना ही महत्वपूर्ण है। यह शरणागति का शिखर है – “हे नाथ” यानी “हे मेरे स्वामी, हे मेरे नाथ” – आत्मसमर्पण का वह क्षण जब भक्त अपने को कुछ नहीं और प्रभु को सब कुछ मानता है।
कृष्ण के नाम-जप के बारे में विस्तृत जानकारी के लिए हमारे कृष्ण के 108 नाम अर्थ सहित लेख में कृष्ण के प्रत्येक नाम की गहरी व्याख्या मिलेगी।
“वासुदेवः सर्वम्” – श्रीमद्भगवद्गीता 7.19 में कृष्ण स्वयं कहते हैं कि जो ज्ञानी बहुत जन्मों के बाद मुझे जानता है, वह “वासुदेव ही सब कुछ है” – इस भाव से मुझे भजता है। वह महात्मा अत्यंत दुर्लभ है। और यह श्लोक उसी “वासुदेवः सर्वम्” की सरल साधना है।
श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारे श्लोक का स्रोत क्या है?
यह एक परंपरागत वैष्णव श्लोक है जो कृष्ण के छह प्रमुख नामों – कृष्ण, गोविंद, हरे, मुरारे, नारायण और वासुदेव – को एक साथ जपने का माध्यम है। यह लोक-परंपरा से उतरा श्लोक है।
क्या इस श्लोक में फिल्मी गाने जैसे ‘हे नाथ’ शामिल हैं?
‘श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारे, हे नाथ नारायण वासुदेवाय’ परंपरागत सार्वजनिक डोमेन श्लोक है। कुछ फिल्मी संस्करण इसी धुन पर बने हैं जिनके अपने कॉपीराइट हैं – उनके लिए मूल यूट्यूब/स्ट्रीमिंग पर जाएं।
इस जप की माला कौन सी हो?
कृष्ण के लिए तुलसी माला सबसे उचित मानी जाती है। यदि माला न हो तो Devta App का जप काउंटर उपयोग करें – ध्यान श्लोक पर रहे, गिनती ऐप करे।
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