अंतिम समय में भगवान का नाम – वह आदत जो अभी से बनानी है
हज़ारों सालों से काशी को “मोक्ष की नगरी” कहा जाता है। लेकिन क्या सिर्फ काशी में मरने से मोक्ष मिलता है? रामचरितमानस में तुलसीदास एक रहस्य खोलते हैं जो बहुत कम लोगों को पता है – काशी में मोक्ष क्यों मिलता है, इसका असली कारण।
काशी का रहस्य – शिव जो मंत्र देते हैं
तुलसीदास रामचरितमानस में लिखते हैं:
“महामंत्र जोइ जपत महेसू। कासीं मुकुति हेतु उपदेसू॥”
अर्थ: जो महामंत्र स्वयं भगवान शिव (महेश) जपते हैं, वही मंत्र वे काशी में मरने वालों के कान में मोक्ष के लिए उपदेश करते हैं। और वह मंत्र है – राम नाम।
यह परंपरागत मान्यता है, लेकिन इसमें एक गहरा सत्य छिपा है। काशी में जो मरते हैं उन्हें शिव राम नाम सुनाते हैं – यानी अंतिम क्षण में ईश्वर का नाम ही मुक्ति का द्वार है। तो सवाल यह नहीं कि काशी कब जाएंगे – सवाल यह है कि राम नाम अभी से कितना जप रहे हैं।
अजामिल की कथा – जो गलत तरीके से समझी जाती है
भागवत पुराण (छठा स्कंध) में अजामिल की कथा है – एक परंपरागत आख्यान जो सदियों से कही जाती है। अजामिल एक ब्राह्मण था जो जीवन में बुरी आदतों में फँस गया। मृत्यु के समय जब यमदूत आए, तो उसने घबराकर अपने छोटे पुत्र को पुकारा जिसका नाम था “नारायण।” और इस एक पुकार में – भले ही पुत्र को पुकारी गई थी – भगवान नारायण का नाम आया। भागवत कहती है कि उस नाम के संयोग से उसे मुक्ति मिली।
लेकिन इस कथा को गलत तरीके से समझा जाता है। बहुत से लोग सोचते हैं – “तो फिर पूरी ज़िंदगी जो चाहें करो, अंत में नाम लो और हो गया।” यह कथा का उद्देश्य नहीं है। कथा का संदेश है – नाम की शक्ति इतनी अपार है कि वह अनजाने में भी फल देती है। तो जो व्यक्ति जानबूझकर, प्रेम से, नित्य नाम जपता है – उसकी दशा कितनी उत्तम होगी!
इसके अलावा, अनुभव यह कहता है कि अंतिम क्षण में वही निकलता है जो जीवनभर अभ्यास में रहा। जो व्यक्ति सारी ज़िंदगी क्रिकेट की बात करता है, वह अंतिम समय में क्रिकेट के आँकड़े याद करेगा – राम नाम नहीं। जो नित्य नाम जपता है, उसके लिए वह नाम इतना स्वाभाविक हो जाता है कि वह सोते-जागते, साँस के साथ निकलता है।
गीता का वचन – जो अंत में याद होता है, वही गति मिलती है
भगवद्गीता (8.5-6) में श्रीकृष्ण कहते हैं: “जो अंत समय में मुझे स्मरण करते हुए शरीर छोड़ता है, वह मुझे ही प्राप्त होता है।” और फिर (8.6): “मनुष्य मृत्यु के समय जिस भी भाव को याद करते हुए शरीर छोड़ता है, वह उसी भाव को प्राप्त होता है – क्योंकि वह सदा उसी के चिंतन में लगा रहा।”
यह दो श्लोक मिलकर एक सच्चाई कहते हैं: मृत्यु के समय का भाव, जीवन के अभ्यास का फल है। इसीलिए योगियों ने कहा है – “अभी जो बोओगे, वही अंत में काटोगे।” नाम जप का अभ्यास इसीलिए नित्य करना है – ताकि वह इतना गहरा हो जाए कि किसी प्रयास के बिना निकले।
मानसिक जप – वह साधन जो अंत तक साथ रहता है
स्वामी शिवानंद (Divine Life Society) लिखते हैं कि मानसिक जप (मन ही मन जप) चार प्रकारों में सर्वश्रेष्ठ है। इसकी विशेषता यह है कि यह तब भी हो सकता है जब शरीर इतना कमज़ोर हो कि बोला न जा सके। बीमारी में, बुढ़ापे में, जब जीभ चलना बंद हो जाए – तब भी मन काम करता है। और मन में जो नाम बसा हो, वह निकलता रहता है।
इसीलिए नाम जप की साधना को “अजपा जप” की ओर ले जाने की परंपरा है – वह अवस्था जब नाम जपना बंद नहीं होता, श्वास के साथ चलता रहता है। जप से अजपा तक का यह सफर जीवनभर के अभ्यास से बनता है।
Devta App जैसे डिजिटल जप काउंटर इसीलिए उपयोगी हैं – वे रोज़ की जप की गिनती और स्ट्रीक रखते हैं, जिससे आदत बनती है। जब आप हर सुबह दर्शन करते हैं और कुछ मिनट नाम जपते हैं, तो वह नाम धीरे-धीरे आपके अवचेतन में बसता जाता है। यह “insurance” नहीं है – यह एक जीवित भक्ति-संबंध है जो वर्षों में गहरा होता है।
अभी शुरू करें – यही एकमात्र समय है
लोग कहते हैं – “बुढ़ापे में शुरू करेंगे।” लेकिन जो आदत 40-50 साल में नहीं बनी, वह 80 में नहीं बनती – वह तो केवल दोहराई जाती है। नाम जप की आदत बनाने का सबसे अच्छा समय है – आज।
छोटी शुरुआत करें। रोज़ सुबह उठकर 108 बार राम नाम। या हरे कृष्ण। या ओम नमः शिवाय। बस एक माला। अगर माला न हो, दस उँगलियों के पर्वों पर गिनें, या एक काउंटर ऐप से। इसे 15 दिन करें – बस देखें क्या होता है। न कोई दावा, न कोई गारंटी – बस एक नाम और एक उपस्थित मन।
काशी जाना हो या न हो – नाम तो अभी से लेना है। शिव जो मंत्र देते हैं, वही मंत्र हर सुबह खुद को दें। यही सबसे बड़ी तैयारी है।
मृत्यु के समय कौन सा नाम जपना सबसे अच्छा है?
परंपरा में राम नाम को ‘तारक मंत्र’ कहा गया है – वह नाम जो तारता है, मुक्ति देता है। तुलसीदास के अनुसार भगवान शिव काशी में मरने वालों के कान में राम नाम ही कहते हैं। महामंत्र ‘हरे कृष्ण’ भी सर्वव्यापी माना जाता है। अंत में वही नाम सबसे अच्छा है जो आपके दैनिक जप में हो – क्योंकि अभ्यास से ही वह स्वतः निकलेगा।
अजामिल की कथा क्या सिखाती है?
अजामिल की कथा (भागवत पुराण, 6वाँ स्कंध – परंपरागत आख्यान) बताती है कि मृत्यु के समय उसने अपने पुत्र ‘नारायण’ को पुकारा, और भगवान के नाम के संयोग से उसे मुक्ति मिली। शिक्षा यह नहीं कि पूरी ज़िंदगी पाप करो और अंत में नाम लो – शिक्षा यह है कि नाम की शक्ति असीम है, इसलिए अभी से नाम जप की आदत डालो।
क्या बिना काशी गए मोक्ष मिल सकता है?
परंपरागत मान्यता में काशी में मृत्यु विशेष महत्व रखती है, लेकिन भक्ति-परंपरा यह भी कहती है कि जहाँ भगवान का नाम है, वहीं काशी है। सच्चे मन से जपा गया नाम कहीं भी, किसी भी अवस्था में मुक्तिदायी है।