दुर्गा चालीसा: संपूर्ण पाठ, अर्थ और लाभ
यहाँ दुर्गा चालीसा का संपूर्ण पाठ मिलेगा – सभी 40 चौपाइयाँ, सरल हिंदी अर्थ सहित। यह पारंपरिक रचना देवीदास जी को अर्पित मानी जाती है और सदियों से भक्त माँ दुर्गा की कृपा, शक्ति और रक्षा के लिए इसका नित्य पाठ करते आए हैं। नवरात्रि में इसका विशेष महत्व है, किंतु मंगलवार, शुक्रवार या किसी भी दिन श्रद्धापूर्वक इसे पढ़ा जा सकता है।
स्रोत और प्रामाणिकता: दुर्गा चालीसा एक सदियों पुरानी पारंपरिक अवधी रचना है जिसे देवीदास नामक भक्त-कवि ने रचा माना जाता है – यह पूर्णतः सार्वजनिक (public domain) पाठ है। इसमें 40 चौपाइयाँ हैं जो माँ दुर्गा के विविध स्वरूपों, उनकी सृजन-पालन-संहार शक्ति, असुर-संहार की गाथा और भक्तों पर उनकी असीम कृपा का वर्णन करती हैं।
दुर्गा चालीसा – संपूर्ण पाठ अर्थ सहित
चौपाई 1 से 10 – आवाहन, दिव्य स्वरूप और सृष्टि-शक्ति
चौपाई 1
नमो नमो दुर्गे सुख करनी।
नमो नमो दुर्गे दुःख हरनी॥
अर्थ: हे माँ दुर्गे! बार-बार आपको नमस्कार है – आप सुख देने वाली हैं। हे दुर्गे! पुनः प्रणाम है – आप दुखों को हर लेने वाली हैं।
चौपाई 2
निरंकार है ज्योति तुम्हारी।
तिहूँ लोक फैली उजियारी॥
अर्थ: आपकी ज्योति निरंकार (निराकार, रूपरहित) है और तीनों लोकों – स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल – में आपका दिव्य प्रकाश फैला हुआ है।
चौपाई 3
शशि ललाट मुख महाविशाला।
नेत्र लाल भृकुटि विकराला॥
अर्थ: माँ का ललाट (माथा) चंद्रमा-सा सुंदर है, मुख विशाल है; नेत्र रक्तिम (लाल) हैं और भौंहें भयंकर हैं – यह उनका रौद्र-सुंदर स्वरूप है।
चौपाई 4
रूप मातु को अधिक सुहावे।
दरश करत जन अति सुख पावे॥
अर्थ: माँ का यह स्वरूप अत्यंत मनोहर और सुंदर लगता है। उनका दर्शन मात्र करने से भक्तजनों को अपार सुख और शांति मिलती है।
चौपाई 5
तुम संसार शक्ति लै कीना।
पालन हेतु अन्न धन दीना॥
अर्थ: आपने ही अपनी शक्ति से यह संसार रचा और उसके पालन-पोषण के लिए अन्न तथा धन प्रदान किया।
चौपाई 6
अन्नपूर्णा हुई जग पाला।
तुम ही आदि सुन्दरी बाला॥
अर्थ: अन्नपूर्णा का रूप लेकर आपने ही जगत का पालन किया। आप ही आदि-काल की परम सुन्दरी बाला हैं।
चौपाई 7
प्रलयकाल सब नाशन हारी।
तुम गौरी शिवशंकर प्यारी॥
अर्थ: प्रलयकाल में आप ही सबका संहार करने वाली संहारिका हैं। आप शिव-शंकर की प्रिया गौरी भी हैं – सृष्टि, पालन और संहार तीनों में आप विद्यमान हैं।
चौपाई 8
शिव योगी तुम्हरे गुण गावें।
ब्रह्मा विष्णु तुम्हें नित ध्यावें॥
अर्थ: शिव जैसे महायोगी भी आपके गुणों का गायन करते हैं और ब्रह्मा-विष्णु भी नित्य आपका ध्यान करते हैं – त्रिदेव भी आपकी शक्ति के बिना अधूरे हैं।
चौपाई 9
रूप सरस्वती को तुम धारा।
दे सुबुद्धि ऋषि मुनिन उबारा॥
अर्थ: आपने ही सरस्वती का रूप धारण करके ऋषि-मुनियों को सुबुद्धि देकर उनका उद्धार किया। विद्या और ज्ञान भी आपकी ही देन है।
चौपाई 10
धरयो रूप नरसिंह को अम्बा।
परगट भई फाड़कर खम्बा॥
अर्थ: हे अम्बा! आपने ही नरसिंह का रूप धारण किया और खम्भे को फाड़कर प्रकट हुईं – यह लीला बताती है कि सृष्टि के हर कण में आपकी उपस्थिति है।
चौपाई 11 से 20 – अवतार, शक्तिपीठ और रौद्र स्वरूप
चौपाई 11
रक्षा करि प्रह्लाद बचायो।
हिरण्याक्ष को स्वर्ग पठायो॥
अर्थ: आपने प्रह्लाद की रक्षा की और उनके अत्याचारी पिता को उनके कर्मों का फल देकर मोक्ष दिलाया। भक्त की पुकार पर माँ सदा रक्षा के लिए आती हैं।
चौपाई 12
लक्ष्मी रूप धरो जग माहीं।
श्री नारायण अंग समाहीं॥
अर्थ: आपने लक्ष्मी का रूप धारण करके जगत में प्रकट हुईं और श्री नारायण (विष्णु) के साथ विराजमान हुईं। धन, समृद्धि और वैभव भी आपका ही स्वरूप है।
चौपाई 13
क्षीरसिन्धु में करत विलासा।
दयासिन्धु दीजै मन आसा॥
अर्थ: आप क्षीरसागर (दूध के सागर) में विलास करती हैं। हे करुणा की सागर! हमारे मन को भी आश्वासन और धैर्य प्रदान करें।
चौपाई 14
हिंगलाज में तुम्हीं भवानी।
महिमा अमित न जात बखानी॥
अर्थ: हिंगलाज शक्तिपीठ (वर्तमान बलूचिस्तान) में भी आप ही भवानी के रूप में विराजमान हैं। आपकी महिमा अपार है – पूरी तरह बखान नहीं की जा सकती।
चौपाई 15
मातंगी अरु धूमावति माता।
भुवनेश्वरी बगला सुख दाता॥
अर्थ: मातंगी, धूमावती, भुवनेश्वरी और बगलामुखी – दस महाविद्याओं में से ये सभी देवियाँ आपके ही दिव्य स्वरूप हैं जो भक्तों को सुख और मोक्ष देती हैं।
चौपाई 16
श्री भैरव तारा जग तारिणी।
छिन्न भाल भव दुःख निवारिणी॥
अर्थ: भैरवी, तारा देवी (जगत को तारने वाली) और छिन्नमस्तिका माँ (भवसागर के दुखों को दूर करने वाली) – ये सभी आपके ही रूप हैं।
चौपाई 17
केहरि वाहन सोह भवानी।
लांगुर वीर चलत अगवानी॥
अर्थ: भवानी माँ सिंह (केहरि = शेर) पर विराजमान होकर अत्यंत शोभित हैं। वीर लांगुर (माँ के गण) उनके आगे-आगे पथ-प्रदर्शन करते हुए चलते हैं।
चौपाई 18
कर में खप्पर खड्ग विराजै।
जाको देख काल डर भाजै॥
अर्थ: माँ के हाथ में खप्पर और खड्ग (तलवार) सुशोभित हैं। उनके इस शक्तिशाली रूप को देखकर काल (मृत्यु) भी भय से भाग खड़ा होता है।
चौपाई 19
सोहै अस्त्र और त्रिशूला।
जाते उठत शत्रु हिय शूला॥
अर्थ: माँ के अस्त्र और त्रिशूल अत्यंत प्रभावशाली हैं। इन्हें देखकर शत्रुओं के हृदय में भय और पीड़ा उत्पन्न होती है।
चौपाई 20
नगरकोट में तुम्हीं विराजत।
तिहुँलोक में डंका बाजत॥
अर्थ: नगरकोट (काँगड़ा, हिमाचल प्रदेश) की प्रसिद्ध शक्तिपीठ में भी आप ही विराजती हैं। तीनों लोकों में आपकी विजय-जयकार गूँजती रहती है।
चौपाई 21 से 30 – असुर-संहार और भक्त-कृपा
चौपाई 21
शुम्भ निशुम्भ दानव तुम मारे।
रक्तबीज शंखन संहारे॥
अर्थ: आपने शुम्भ और निशुम्भ राक्षसों का वध किया और रक्तबीज (जिसके रक्त की प्रत्येक बूँद से नया राक्षस उत्पन्न होता था) का पूरी तरह संहार किया।
चौपाई 22
महिषासुर नृप अति अभिमानी।
जेहि अघ भार मही अकुलानी॥
अर्थ: अत्यंत अभिमानी महिषासुर के पापों के भार से पृथ्वी व्याकुल हो गई थी और सभी देवता भी असहाय हो गए थे।
चौपाई 23
रूप कराल कालिका धारा।
सेन सहित तुम तिहि संहारा॥
अर्थ: तब आपने कालिका का विकराल रूप धारण किया और महिषासुर को उसकी पूरी सेना सहित नष्ट किया – यही दुर्गा पूजा का मूल उत्सव है।
चौपाई 24
परी गाढ़ सन्तन पर जब जब।
भई सहाय मातु तुम तब तब॥
अर्थ: जब-जब संतों और सज्जनों पर भारी विपत्ति आई, तब-तब आप स्वयं सहायता के लिए आईं। यह माँ का सनातन वचन है।

चौपाई 25
अमरपुरी अरु बासव लोका।
तब महिमा सब रहें अशोका॥
अर्थ: देवलोक और इन्द्रलोक में भी आपकी महिमा के प्रताप से सभी देवता शोकमुक्त और प्रसन्न रहते हैं।
चौपाई 26
ज्वाला में है ज्योति तुम्हारी।
तुम्हें सदा पूजें नरनारी॥
अर्थ: ज्वालामुखी शक्तिपीठ (हिमाचल) में प्रकट आपकी दिव्य ज्वाला-ज्योति आपकी साक्षात उपस्थिति है। नर और नारी दोनों सदा आपकी पूजा करते हैं।
चौपाई 27
प्रेम भक्ति से जो यश गावें।
दुःख दारिद्र निकट नहिं आवें॥
अर्थ: जो प्रेम और भक्ति से आपका यशोगान करते हैं, उनके पास दुख और दरिद्रता नहीं आती – भक्ति की शक्ति ही सबसे बड़ी सुरक्षा है।
चौपाई 28
ध्यावे तुम्हें जो नर मन लाई।
जन्ममरण ताकौ छुटि जाई॥
अर्थ: जो मन लगाकर एकाग्रचित्त से आपका ध्यान करते हैं, उनका जन्म-मृत्यु का बंधन छूट जाता है और वे मोक्ष की ओर बढ़ते हैं।
चौपाई 29
जोगी सुर मुनि कहत पुकारी।
योग न हो बिन शक्ति तुम्हारी॥
अर्थ: योगी, देवता और मुनि पुकार-पुकारकर कहते हैं – आपकी शक्ति के बिना योग की सिद्धि संभव नहीं। शक्ति ही योग का आधार है।
चौपाई 30
शंकर आचारज तप कीनो।
काम अरु क्रोध जीति सब लीनो॥
अर्थ: (चालीसा में एक प्रसिद्ध प्रसंग है कि) आदि शंकराचार्य ने कठोर तप किया और काम व क्रोध पर विजय पाई।
चौपाई 31 से 40 – शंकराचार्य का प्रसंग, शरणागति और फलश्रुति
चौपाई 31
निशिदिन ध्यान धरो शंकर को।
काहु काल नहिं सुमिरो तुमको॥
अर्थ: (प्रसंग जारी है) वे रात-दिन शिव का ध्यान करते रहे, किंतु किसी काल में उन्होंने आपको (शक्ति को) स्मरण नहीं किया।
चौपाई 32
शक्ति रूप का मरम न पायो।
शक्ति गई तब मन पछितायो॥
अर्थ: शक्ति-स्वरूप का रहस्य न समझ सके। जब शक्ति (ऊर्जा) चली गई तब पछतावा हुआ – यह चौपाई बताती है कि शिव भी शक्ति के बिना अधूरे हैं।
चौपाई 33
शरणागत हुई कीर्ति बखानी।
जय जय जय जगदम्ब भवानी॥
अर्थ: तब वे आपकी शरण में आए और स्तुति करने लगे – “जय जय जय जगदम्बे भवानी!” शरणागति ही सच्ची भक्ति का पहला कदम है।
चौपाई 34
भई प्रसन्न आदि जगदम्बा।
दई शक्ति नहिं कीन विलम्बा॥
अर्थ: आदि जगदम्बा प्रसन्न हुईं और बिना एक पल की देर किए उन्हें शक्ति प्रदान कर दी। माँ अपने शरणागत को कभी निराश नहीं करतीं।
चौपाई 35
मोको मातु कष्ट अति घेरो।
तुम बिन कौन हरै दुःख मेरो॥
अर्थ: (अब भक्त अपनी विनती करता है) हे माँ! मुझे बहुत कष्ट घेरे हुए हैं। आपके बिना मेरे दुखों को कौन हर सकता है?
चौपाई 36
आशा तृष्णा निपट सतावें।
मोह मदादिक सब बिनशावें॥
अर्थ: आशा और तृष्णा (लालसा) अत्यंत सता रही हैं। हे माँ! मोह, मद (अहंकार) आदि सभी विकारों को नष्ट करें।
चौपाई 37
शत्रु नाश कीजै महारानी।
सुमिरौं इकचित तुम्हें भवानी॥
अर्थ: हे महारानी! (बाहरी और आंतरिक) शत्रुओं का नाश करें। हे भवानी! मैं एकाग्र मन से केवल आपका स्मरण करता हूँ।
चौपाई 38
करो कृपा हे मातु दयाला।
ऋद्धिसिद्धि दै करहु निहाला॥
अर्थ: हे दयालु माँ! कृपा करें और ऋद्धि-सिद्धि (सुख-समृद्धि और सिद्धियाँ) देकर मुझे निहाल (आनंदित) कर दें।
चौपाई 39
जब लगि जिऊँ दया फल पाऊँ।
तुम्हरो यश मैं सदा सुनाऊँ॥
अर्थ: जब तक जीवित रहूँ, आपकी दया का फल पाता रहूँ और आपका यश सुनाता रहूँ – यही मेरी जीवन-साधना है।
चौपाई 40 – फलश्रुति
श्री दुर्गा चालीसा जो कोई गावै।
सब सुख भोग परमपद पावै॥
अर्थ: जो कोई भी इस दुर्गा चालीसा का पाठ करता है, वह सभी सांसारिक सुखों को भोगकर अंत में परम पद (मोक्ष) को प्राप्त करता है।
रचयिता का दोहा और समापन
रचयिता का दोहा
देवीदास शरण निज जानी।
करहु कृपा जगदम्ब भवानी॥
अर्थ: देवीदास (रचयिता) आपकी शरण में है – यह जानकर हे जगदम्बे भवानी! उस पर कृपा करें।
समापन दोहा
शरणागत रक्षा करे, भक्त रहे नि:शंक।
मैं आया तेरी शरण में, मातु लिजिये अंक॥
अर्थ: जो शरण में आए उसकी रक्षा करें, भक्त निर्भय रहे। मैं आपकी शरण में आया हूँ – हे माँ! मुझे अपनी गोद में ले लें।
नोट: ऑडियो और पीडीएफ संस्करण जल्द यहाँ उपलब्ध होगा। तब तक आप इस पृष्ठ को बुकमार्क करके पाठ कर सकते हैं।
दुर्गा चालीसा का महत्व – क्या है इसकी विशेषता?
दुर्गा चालीसा महज एक भजन नहीं है – यह 40 चौपाइयों में माँ दुर्गा का एक सम्पूर्ण परिचय है। इसमें उनके रूप का वर्णन है, उनके अवतारों की गाथा है, उनकी शक्ति का बखान है और अंत में भक्त की विनम्र प्रार्थना है। जो भक्त पूरे भाव से यह पाठ करता है, वह माँ के 40 पहलुओं से एक-एक करके परिचित होता जाता है।
इस चालीसा की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह माँ दुर्गा को केवल शक्ति की देवी के रूप में नहीं, बल्कि सृष्टि-पालन-संहार तीनों की नियंता के रूप में प्रस्तुत करती है। सरस्वती, लक्ष्मी, गौरी, कालिका, नरसिंही – सभी रूप माँ दुर्गा के ही अंश हैं। दस महाविद्याओं का उल्लेख (चौपाई 15-16) इस चालीसा को तांत्रिक और वैदिक दोनों परंपराओं को जोड़ने वाला पाठ बनाता है।
शंकराचार्य प्रसंग (चौपाई 29-34) विशेष रूप से गहरा है। यह बताता है कि शिव भी तब तक अधूरे हैं जब तक शक्ति उनके साथ न हो। शक्ति के बिना शिव “शव” मात्र हैं – यह भारतीय दर्शन का मूल सिद्धांत इन चंद पंक्तियों में समाहित है।
दुर्गा चालीसा के लाभ

परंपरा के अनुसार नित्य दुर्गा चालीसा पाठ से जो लाभ होते हैं वे इस प्रकार हैं – यह ध्यान रखें कि ये मान्यताएँ पारंपरिक हैं, कोई चिकित्सीय दावा नहीं:
- मन की शांति: चालीसा के लयबद्ध पाठ से एकाग्रता बढ़ती है और मन का भटकाव कम होता है। यह एक प्रकार का ध्यान (मेडिटेशन) ही है।
- भय से मुक्ति: “जाको देख काल डर भाजै” – माँ दुर्गा की उपासना से भक्त के मन का भय दूर होता है और आत्मविश्वास बढ़ता है।
- नकारात्मक विचारों से सुरक्षा: नियमित पाठ चित्त को सकारात्मक बनाए रखने में सहायक होता है।
- नवरात्रि फल: नौ दिनों तक प्रतिदिन पाठ करने से माँ का विशेष आशीर्वाद परंपरागत रूप से माना जाता है।
- कठिन समय में सहारा: चौपाई 24 (“भई सहाय मातु तुम तब तब”) का पाठ संकट के क्षणों में मन को धैर्य और बल देता है।
दुर्गा चालीसा पाठ की विधि – कब और कैसे करें
पाठ की कोई जटिल विधि नहीं है – भक्ति और स्वच्छता दो मूल शर्तें हैं। परंपरागत विधि इस प्रकार है:
- सबसे शुभ समय: सुबह स्नान के बाद सूर्योदय के निकट, अथवा शाम को दीप जलाने के बाद। इन दोनों संधि-काल में पाठ का प्रभाव अधिक माना जाता है।
- शुभ दिन: मंगलवार और शुक्रवार – ये दोनों दिन माँ दुर्गा की उपासना के लिए विशेष रूप से शुभ माने जाते हैं।
- नवरात्रि: वर्ष में दो बार आने वाले नवरात्रि (चैत्र और शारदीय) में नौ दिन प्रतिदिन पाठ करना सर्वश्रेष्ठ परंपरा है। चाहें तो 1, 3 या 7 बार पाठ करें।
- संकट में: किसी विशेष कठिनाई में 11, 21 या 40 दिन नियमित पाठ करने की परंपरा है।
- स्थान और दिशा: घर के पूजा स्थल पर पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठें। माँ दुर्गा की तस्वीर या मूर्ति सामने रखें।
- मन की स्थिति: पाठ के दौरान मन को भटकाव से बचाएँ। अगर बहुत काम है तो एक बार पढ़ें, लेकिन पूरी तरह ध्यान लगाकर।
एक आम भ्रम: कई लोग सोचते हैं कि पाठ के लिए बड़ी तैयारी चाहिए – फूल, धूप, घंटी सब हो तभी पढ़ें। वास्तव में दुर्गा चालीसा कहती है “प्रेम भक्ति से जो यश गावें” – प्रेम और भक्ति ही पर्याप्त है। माँ प्रसाद नहीं, भाव देखती हैं।
दुर्गा चालीसा का पाठ कैसे करें – जप काउंटर और नित्य दर्शन
दुर्गा चालीसा का पाठ करना आसान है, लेकिन उसे नित्य बनाए रखना सबसे बड़ी चुनौती है। “जब लगि जिऊँ दया फल पाऊँ / तुम्हरो यश मैं सदा सुनाऊँ” – चालीसा खुद कहती है कि यह एक बार का काम नहीं, जीवन-भर की साधना है। निरंतरता के लिए एक सरल उपाय है: Devta App जैसे जप काउंटर का उपयोग। यह आपका ध्यान गिनती की बजाय माँ के नाम और पाठ पर केंद्रित रखता है।
Devta App में नित्य दर्शन का विकल्प भी है – हर दिन माँ के दर्शन और अपने जप की गिनती एक ही जगह। जो भक्त नवरात्रि में 9 दिन 108 बार पाठ का संकल्प लेते हैं, उनके लिए काउंटर विशेष रूप से काम आता है – माला की जगह फोन में संकल्प-ट्रैकिंग, ताकि कहीं भी, किसी भी स्थिति में पाठ हो सके।
दुर्गा चालीसा कितनी बार पढ़नी चाहिए?
नियमित पाठ के लिए दिन में एक बार पर्याप्त है। नवरात्रि में या किसी विशेष मनोकामना के लिए 11, 21 या 108 बार पाठ करने की परंपरा है।
दुर्गा चालीसा किसने लिखी?
दुर्गा चालीसा एक पारंपरिक रचना है जिसे देवीदास नामक भक्त-कवि से जोड़ा जाता है। यह सदियों पुरानी रचना है और पूर्णतः सार्वजनिक (पब्लिक डोमेन) में है।
दुर्गा चालीसा पाठ कब करना चाहिए?
सुबह स्नान के बाद या शाम को दीप जलाने के बाद करें। मंगलवार और शुक्रवार विशेष शुभ हैं। नवरात्रि के नौ दिन प्रतिदिन पाठ करना सर्वश्रेष्ठ माना जाता है।