हनुमान चालीसा - hanuman-chalisa-path-chaupai-arth

हनुमान चालीसा: पूरा पाठ, हर चौपाई का अर्थ

यहाँ आपको हनुमान चालीसा का संपूर्ण पाठ मिलेगा – गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित दोनों दोहे और सभी 40 चौपाइयाँ, हर पंक्ति के सरल हिंदी अर्थ सहित। यह भारत का सबसे अधिक पढ़ा जाने वाला भक्ति-पाठ है, जिसे प्रतिदिन करोड़ों श्रद्धालु गाते और जपते हैं। यह पाठ तुलसीदास जी की अवधी रचना पर आधारित है और पूर्णतः सार्वजनिक-क्षेत्र (public domain) में है।

स्रोत एवं प्रामाणिकता: हनुमान चालीसा 16वीं शताब्दी के महाकवि गोस्वामी तुलसीदास (1532-1623 ईस्वी) की रचना है, जो रामचरितमानस के रचयिता थे। इसमें 2 आरंभिक दोहे, 40 चौपाइयाँ और 1 समापन दोहा है – कुल 43 छंद। यह पाठ हिंदुस्तानी भक्ति परंपरा का अभिन्न अंग है।

Table of Contents

दोहा – आरंभिक छंद

दोहा 1

श्रीगुरु चरन सरोज रज, निज मनु मुकुरु सुधारि।
बरनउँ रघुबर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि॥

अर्थ: श्रीगुरु के चरण-कमलों की धूल (रज) से अपने मन रूपी दर्पण को स्वच्छ करके, मैं श्रीरघुवर (राम जी) के निर्मल यश का वर्णन करता हूँ – जो धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष, इन चारों फलों को देने वाला है।

दोहा 2

बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन-कुमार।
बल बुधि बिद्या देहु मोहिं, हरहु कलेस बिकार॥

अर्थ: अपने आप को बुद्धिहीन और शरीर से दुर्बल जानकर, हे पवन-पुत्र हनुमान जी! मैं आपका स्मरण करता हूँ। कृपया मुझे बल, बुद्धि और विद्या दीजिए और मेरे दुख तथा विकारों को दूर कीजिए।

चौपाई 1 से 10 – हनुमान जी का रूप और गुण

चौपाई 1

जय हनुमान ज्ञान गुन सागर।
जय कपीस तिहुँ लोक उजागर॥

अर्थ: हे हनुमान जी! आप ज्ञान और गुणों के सागर हैं – आपकी जय हो। हे कपीश्वर (वानर-राज)! तीनों लोकों – स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल – में आपका प्रकाश फैला हुआ है – आपकी जय हो।

चौपाई 2

राम दूत अतुलित बल धामा।
अंजनि-पुत्र पवनसुत नामा॥

अर्थ: आप श्रीराम के दूत हैं और अतुलनीय बल के धाम हैं। आप अञ्जनी माता के पुत्र और पवन (वायु देव) के पुत्र – इन नामों से जाने जाते हैं।

चौपाई 3

महाबीर बिक्रम बजरंगी।
कुमति निवार सुमति के संगी॥

अर्थ: हे महावीर! आप अत्यंत पराक्रमी और वज्र के समान दृढ़ अंगों वाले (बजरंगी) हैं। आप कुबुद्धि को दूर करने वाले और सुबुद्धि (अच्छी बुद्धि) के साथी हैं।

चौपाई 4

कंचन बरन बिराज सुबेसा।
कानन कुंडल कुंचित केसा॥

अर्थ: आपका वर्ण सोने (कांचन) जैसा सुनहरा है और आप सुंदर वेशभूषा में विराजमान हैं। आपके कानों में कुंडल शोभित हैं और बाल घुँघराले हैं।

चौपाई 5

हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजै।
काँधे मूँज जनेऊ साजै॥

अर्थ: हाथ में वज्र और ध्वजा (झंडा) शोभित है। कंधे पर मूँज घास का जनेऊ सुंदर लगता है।

चौपाई 6

शंकर सुवन केसरी नंदन।
तेज प्रताप महा जग बंदन॥

अर्थ: आप शंकर (शिव) के अवतार हैं और केसरी जी के पुत्र हैं। आपका तेज और प्रताप महान है, सारा जगत आपकी वंदना करता है।

चौपाई 7

विद्यावान गुनी अति चातुर।
राम काज करिबे को आतुर॥

अर्थ: आप विद्यावान, गुणी और अत्यंत चतुर हैं। आप सदा श्रीराम के कार्य करने के लिए तत्पर (आतुर) रहते हैं।

चौपाई 8

प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया।
राम लखन सीता मन बसिया॥

अर्थ: आप प्रभु के चरित्र (कथाएँ) सुनने के रसिक (अनुरागी) हैं। आपके मन में श्रीराम, लक्ष्मण और माता सीता सदा बसते हैं।

चौपाई 9

सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा।
बिकट रूप धरि लंक जरावा॥

अर्थ: आपने सूक्ष्म (अतिशय छोटा) रूप धारण करके माता सीता को अशोक वाटिका में दर्शन दिए। फिर विकराल (भयंकर) रूप धारण करके लंका जलाई।

चौपाई 10

भीम रूप धरि असुर सँहारे।
रामचंद्र के काज सँवारे॥

अर्थ: भीमकाय (विशाल) रूप धारण करके आपने असुरों का संहार किया और इस प्रकार श्रीरामचंद्र जी के सभी कार्यों को सुंदर ढंग से सँवारा।

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चौपाई 11 से 20 – हनुमान जी के अद्भुत कार्य और पराक्रम

चौपाई 11

लाय संजीवन लखन जियाये।
श्रीरघुबीर हरषि उर लाये॥

अर्थ: आप द्रोणाचल पर्वत से संजीवनी बूटी लेकर आए और लक्ष्मण जी को जीवित किया। इस पर श्रीरघुबीर (राम जी) ने हर्षित होकर आपको अपने हृदय से लगाया।

चौपाई 12

रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई।
तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई॥

अर्थ: रघुपति (श्रीराम) ने आपकी बहुत प्रशंसा की और कहा – “तुम मेरे उतने ही प्रिय हो जितने मेरे भाई भरत – तुम मेरे भाई के समान हो।”

चौपाई 13

सहस बदन तुम्हरो जस गावैं।
अस कहि श्रीपति कंठ लगावैं॥

अर्थ: “हज़ार मुख वाले शेषनाग भी तुम्हारा यश गाते हैं” – ऐसा कहकर श्रीपति (श्रीराम) ने आपको कंठ से लगाया।

चौपाई 14 – 15

सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा।
नारद शारद सहित अहीसा॥
जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते।
कबि कोबिद कहि सके कहाँ ते॥

अर्थ: सनकादि ऋषि, ब्रह्मादि देव, मुनियों के ईश (शिव), नारद, सरस्वती और शेषनाग – यम, कुबेर और दिशाओं के पालक (दिग्पाल), कवि और विद्वान – ये सभी मिलकर भी आपकी महिमा का पूरा वर्णन नहीं कर सकते। (ये दो चौपाइयाँ एक संयुक्त भाव हैं।)

चौपाई 16

तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा।
राम मिलाय राज पद दीन्हा॥

अर्थ: आपने सुग्रीव का बड़ा उपकार किया – उन्हें श्रीराम से मिलवाकर किष्किंधा का राज-पद दिलवाया।

चौपाई 17

तुम्हरो मंत्र बिभीषन माना।
लंकेस्वर भए सब जग जाना॥

अर्थ: विभीषण ने आपका मंत्र (परामर्श) माना और राम जी की शरण ली, इसीलिए वे लंका के राजा (लंकेश्वर) बने – यह पूरा जग जानता है।

चौपाई 18

जुग सहस्र जोजन पर भानू।
लील्यो ताहि मधुर फल जानू॥

अर्थ: (बाल रूप में) हज़ारों योजन दूर स्थित सूर्य को आपने मीठा फल जानकर निगल लिया था – यह आपकी अद्भुत शक्ति का प्रमाण है।

चौपाई 19

प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं।
जलधि लाँघि गये अचरज नाहीं॥

अर्थ: प्रभु श्रीराम की मुद्रिका (अँगूठी) मुँह में रखकर आप समुद्र लाँघ गए – इसमें कोई आश्चर्य नहीं, क्योंकि आपकी शक्ति असीम है।

चौपाई 20

दुर्गम काज जगत के जेते।
सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते॥

अर्थ: जगत में जितने भी दुर्गम (कठिन) कार्य हैं, वे सब आपकी कृपा (अनुग्रह) से सुगम (सरल) हो जाते हैं।

चौपाई 21 से 30 – हनुमान जी की शरण और महिमा

चौपाई 21

राम दुआरे तुम रखवारे।
होत न आज्ञा बिनु पैसारे॥

अर्थ: आप श्रीराम के द्वार के रक्षक हैं। आपकी आज्ञा (अनुमति) के बिना कोई भी उनके पास नहीं जा सकता।

चौपाई 22

सब सुख लहै तुम्हारी सरना।
तुम रक्षक काहू को डर ना॥

अर्थ: जो भी आपकी शरण में आता है, उसे सभी सुख प्राप्त होते हैं। जब आप किसी के रक्षक हैं, तो उसे किसी से भी कोई डर नहीं।

चौपाई 23

आपन तेज सम्हारो आपै।
तीनों लोक हाँक तें काँपै॥

अर्थ: आप ही अपने तेज को धारण और संभाल सकते हैं – किसी और में यह सामर्थ्य नहीं। आपकी एक हुँकार से तीनों लोक काँप उठते हैं।

चौपाई 24

भूत पिशाच निकट नहिं आवै।
महाबीर जब नाम सुनावै॥

अर्थ: जब महाबीर हनुमान जी का नाम लिया जाता है, तब भूत और पिशाच पास नहीं आते – भय और नकारात्मकता दूर हो जाती है।

चौपाई 25

नासै रोग हरे सब पीरा।
जपत निरंतर हनुमत बीरा॥

अर्थ: हनुमान वीर का नाम निरंतर जपते रहने से रोग नष्ट होते हैं और सभी पीड़ाएँ दूर होती हैं – परंपरा में यही माना जाता है।

चौपाई 26

संकट तें हनुमान छुड़ावै।
मन क्रम बचन ध्यान जो लावै॥

अर्थ: जो मन, कर्म और वचन – तीनों से हनुमान जी का ध्यान करता है, हनुमान जी उसे सभी संकटों से मुक्त कराते हैं।

चौपाई 27

सब पर राम तपस्वी राजा।
तिनके काज सकल तुम साजा॥

अर्थ: राम जी सभी के सर्वोपरि तपस्वी राजा हैं। उनके सभी कार्यों को आप ही सँवारते (सम्पन्न करते) हैं।

चौपाई 28

और मनोरथ जो कोई लावै।
सोई अमित जीवन फल पावै॥

अर्थ: जो कोई भी अपनी मनोकामना (मन की इच्छा) लेकर आपके पास आता है, वह जीवन का असीम (अनंत) फल पाता है।

चौपाई 29

चारों जुग परताप तुम्हारा।
है परसिद्ध जगत उजियारा॥

अर्थ: सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलियुग – चारों युगों में आपका प्रताप विख्यात है। आपकी महिमा जगत में प्रकाश की तरह सर्वत्र फैली हुई है।

चौपाई 30

साधु-संत के तुम रखवारे।
असुर निकंदन राम दुलारे॥

अर्थ: आप साधु-संतों के रक्षक हैं। असुरों का नाश करने वाले हैं और श्रीराम के परम प्रिय (दुलारे) हैं।

चौपाई 31 से 40 – भक्तों को वरदान और समर्पण

चौपाई 31

अष्टसिद्धि नौ निधि के दाता।
अस बर दीन जानकी माता॥

अर्थ: माता जानकी (सीता जी) ने आपको आठों सिद्धियाँ और नौ निधियाँ – दोनों देने का वरदान दिया है। आप इन्हें अपने भक्तों को दे सकते हैं।

चौपाई 32

राम रसायन तुम्हरे पासा।
सदा रहो रघुपति के दासा॥

अर्थ: राम-नाम रूपी रसायन (अमृत) आपके पास है। आप सदा रघुपति (राम जी) के दास बने रहते हैं – यही आपकी सबसे बड़ी शक्ति और भूषण है।

चौपाई 33

तुम्हरे भजन राम को पावै।
जनम जनम के दुख बिसरावै॥

अर्थ: आपका भजन करने से राम जी की प्राप्ति होती है और जन्म-जन्म के दुख भुला दिए जाते हैं।

चौपाई 34

अंतकाल रघुबर पुर जाई।
जहाँ जनम हरि-भक्त कहाई॥

अर्थ: (आपके भजन का प्रभाव यह है कि भक्त) अंतकाल में रघुबर के धाम को जाता है। जहाँ भी जन्म ले, वह हरि-भक्त (भगवान का भक्त) कहलाता है।

चौपाई 35

और देवता चित्त न धरई।
हनुमत सेई सर्ब सुख करई॥

अर्थ: जो अन्य देवताओं को मन में न रखे और केवल हनुमान जी की सेवा करे, तो भी उसे सर्व सुख प्राप्त होता है – क्योंकि हनुमान जी के माध्यम से सभी देवताओं की कृपा प्राप्त होती है।

चौपाई 36

संकट कटै मिटै सब पीरा।
जो सुमिरै हनुमत बलबीरा॥

अर्थ: जो हनुमान बलबीर का स्मरण करता है, उसके सभी संकट कट जाते हैं और सभी पीड़ाएँ मिट जाती हैं।

चौपाई 37

जय जय जय हनुमान गोसाईं।
कृपा करहु गुरुदेव की नाईं॥

अर्थ: हे हनुमान गोसाईं! आपकी जय हो, जय हो, जय हो! कृपया गुरुदेव की तरह मुझ पर कृपा कीजिए और मेरी रक्षा कीजिए।

चौपाई 38

जो सत बार पाठ कर कोई।
छूटहि बंदि महा सुख होई॥

अर्थ: जो इस हनुमान चालीसा का सौ (100) बार पाठ करेगा, वह सभी बंधनों से मुक्त हो जाएगा और महान सुख को प्राप्त होगा।

चौपाई 39

जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा।
होय सिद्धि साखी गौरीसा॥

अर्थ: जो यह हनुमान चालीसा पढ़ेगा, उसे सिद्धि प्राप्त होगी – इसके साक्षी स्वयं गौरीश (भगवान शंकर) हैं।

चौपाई 40

तुलसीदास सदा हरि चेरा।
कीजै नाथ हृदय मह डेरा॥

अर्थ: तुलसीदास सदा हरि (भगवान) के सेवक हैं। हे नाथ (हनुमान जी)! मेरे हृदय में अपना वास (डेरा) कीजिए।

समापन दोहा

पवन तनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप।
राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप॥

अर्थ: हे पवन पुत्र! हे संकट को हरने वाले, मंगल के मूर्त रूप हनुमान जी! हे देवराज (देवों के राजा)! आप राम, लक्ष्मण और माता सीता सहित मेरे हृदय में निवास कीजिए।

हनुमान चालीसा - hanuman chalisa path chaupai arth

हनुमान चालीसा का परिचय – रचना और महत्व

हनुमान चालीसा भारत के महाकवि गोस्वामी तुलसीदास (1532-1623 ईस्वी) की रचना है। तुलसीदास जी ने इसे अवधी भाषा में लिखा – वही भाषा जिसमें रामचरितमानस रचा गया है। “चालीसा” शब्द हिंदी के “चालीस” से आया है, जिसका अर्थ है 40 – चालीसा में 40 चौपाइयाँ होती हैं। इसके साथ दो आरंभिक दोहे और एक समापन दोहा मिलाकर कुल 43 छंद हैं।

यह पाठ केवल स्तुति नहीं है – इसमें हनुमान जी के जीवन की पूरी झाँकी है। उनके सुनहरे रूप का वर्णन, माता अञ्जनी के पुत्र के रूप में परिचय, सूर्य को निगलने की बाल-लीला, सीता जी की खोज, लंका-दहन, संजीवनी की कथा – सब कुछ इन 40 चौपाइयों में समेट दिया गया है। तुलसीदास जी का मानना था कि हनुमान जी शंकर जी के अवतार हैं और राम के परम भक्त – उनके माध्यम से राम तक पहुँचना सबसे सरल मार्ग है।

रामचरितमानस में तुलसीदास जी लिखते हैं – “महामंत्र जोइ जपत महेसू। कासीं मुकुति हेतु उपदेसू॥” – अर्थात काशी में शिव जी स्वयं राम-नाम का उपदेश देते हैं। हनुमान जी इसी राम-नाम के सबसे बड़े साधक हैं – उनकी चालीसा उसी परंपरा का विस्तार है।

हनुमान चालीसा पाठ विधि – कब, कैसे और कितनी बार

हनुमान जी की उपासना के लिए कोई कठिन नियम नहीं हैं – उनके द्वार सबके लिए खुले हैं। परंपरा में जो विधि प्रचलित है, वह इस प्रकार है:

  • दिन: मंगलवार और शनिवार को हनुमान जी की उपासना विशेष फलदायी मानी जाती है। रोज़ाना पाठ भी उतना ही पुण्यकारी है।
  • समय: सुबह स्नान के बाद, ब्रह्म मुहूर्त (सूर्योदय से पहले) में पाठ सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। संध्या-काल भी उपयुक्त है। स्वामी शिवानंद के अनुसार दिन के तीन सन्धि-काल (सुबह, दोपहर, शाम) जप के लिए विशेष हैं।
  • संख्या: एक, तीन, सात या ग्यारह बार पाठ करने की परंपरा है। चालीसा की 38वीं चौपाई में स्वयं कहा गया है कि जो 100 बार पाठ करे, वह बंधनों से मुक्त हो जाता है।
  • आसन: पवित्र आसन पर बैठकर, मन एकाग्र करके पाठ करें। पाठ करते समय राम और हनुमान जी का स्मरण रखें।
  • भाव: यदि उच्चारण में भूल हो जाए तो घबराएँ नहीं – भाव और श्रद्धा ही असली नींव है। मन ही मन (मानसिक) पाठ भी पूरी तरह मान्य है।

एक महत्वपूर्ण बात – चालीसा को समझकर पढ़ने से भक्ति और गहरी होती है। इसीलिए ऊपर हर चौपाई के नीचे अर्थ दिया गया है।

हनुमान चालीसा के लाभ – परंपरा क्या कहती है

हनुमान चालीसा के लाभ परंपरा और करोड़ों श्रद्धालुओं के अनुभव से जाने जाते हैं। स्वयं चालीसा में इन फलों का उल्लेख है:

  • सभी संकटों से मुक्ति: “संकट तें हनुमान छुड़ावै।” – जो मन, कर्म, वचन से ध्यान करे, हनुमान जी उसे संकट से मुक्त करते हैं।
  • भय और नकारात्मकता से रक्षा: “भूत पिशाच निकट नहिं आवै।” – हनुमान जी का नाम सुनते ही सभी प्रकार के भय और नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है।
  • मन की एकाग्रता: निरंतर पाठ से मन शांत होता है और एकाग्रता बढ़ती है।
  • राम-कृपा का मार्ग: “तुम्हरे भजन राम को पावै।” – हनुमान जी के माध्यम से राम जी की कृपा सहज मिलती है।
  • बंधनों से मुक्ति: “जो सत बार पाठ कर कोई। छूटहि बंदि महा सुख होई।” – 100 बार पाठ से मन के बंधन छूटते हैं।

ध्यान देने की बात यह है कि चालीसा की ये पंक्तियाँ भक्ति-वचन हैं, आध्यात्मिक आश्वासन हैं – इन्हें किसी बीमारी के चिकित्सीय उपचार के विकल्प के रूप में नहीं देखना चाहिए। यदि कोई शारीरिक या मानसिक समस्या हो तो डॉक्टर से अवश्य मिलें।

रोज़ाना पाठ को अपनी दिनचर्या में कैसे जोड़ें

हनुमान चालीसा पढ़ने में लगभग 7-10 मिनट लगते हैं। रोज़ाना पाठ करने की सबसे बड़ी चुनौती है – निरंतरता। यहाँ एक व्यावहारिक सुझाव है: अगर आप हर दिन का पाठ गिनना और उसे एक आदत (habit) बनाना चाहते हैं, तो Devta App इसमें मदद कर सकता है। इसमें जप काउंटर के साथ-साथ रोज़ के दर्शन की सुविधा है – तो सुबह उठते ही हनुमान जी के दर्शन करें और फिर पाठ शुरू करें। माला छुए बिना, बस स्क्रीन पर – कहीं भी, किसी भी समय।

जो लोग लंबे समय से चालीसा पढ़ रहे हैं, वे कहते हैं कि पाठ तभी फलदायी होता है जब मन भटके नहीं। अर्थ जानने से यह आसान हो जाता है – हर चौपाई एक दृश्य, एक कहानी, एक प्रार्थना है। इसीलिए इस पूरे पाठ पर ऊपर विस्तृत अर्थ दिया गया है।

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हनुमान चालीसा किसने लिखी और यह कितनी पुरानी है?

हनुमान चालीसा गोस्वामी तुलसीदास जी ने 16वीं शताब्दी (लगभग 1574-1623 ईस्वी) में अवधी भाषा में लिखी। यह रामचरितमानस के रचयिता तुलसीदास की सबसे प्रिय और सर्वाधिक पठित रचनाओं में से एक है।

हनुमान चालीसा कितनी बार और किस दिन पढ़नी चाहिए?

परंपरा के अनुसार मंगलवार और शनिवार को हनुमान चालीसा पढ़ना विशेष फलदायी माना जाता है। सुबह स्नान के बाद एक, तीन या सात बार पाठ करना श्रेयस्कर है। स्वयं चालीसा में कहा गया है कि जो सौ बार पाठ करे, वह सभी बंधनों से मुक्त हो जाता है।

क्या महिलाएं हनुमान चालीसा पढ़ सकती हैं?

हाँ, महिलाएं हनुमान चालीसा अवश्य पढ़ सकती हैं। इस पर कोई शास्त्रीय रोक नहीं है। भक्ति के मार्ग में कोई भेद नहीं – हनुमान चालीसा का पाठ सभी के लिए समान रूप से खुला है।

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