खुली हनुमान चालीसा की पुस्तक के पास जलता दीया, सिंदूर और ताज़े फूल - महिला भक्ति का प्रतीक

क्या लड़कियाँ-महिलाएँ हनुमान जी की पूजा कर सकती हैं?

एक छोटी लड़की हनुमान जी को अपना बड़ा भाई मानती है। संकट में सबसे पहले उन्हीं का नाम लेती है, मंगलवार को चालीसा पढ़ती है, उनकी तस्वीर के सामने बैठकर अपनी छोटी-छोटी बातें कह आती है। और फिर एक दिन कोई कह देता है – “अरे, हनुमान जी तो ब्रह्मचारी हैं, लड़कियों को उनकी पूजा नहीं करनी चाहिए।” वह बच्ची ठिठक जाती है। जिस भाई से इतना प्यार था, क्या सच में उससे दूरी रखनी पड़ेगी?

अगर आपके मन में भी कभी यह सवाल आया है, तो सबसे पहले सबसे बड़ी बात साफ़ सुन लीजिए – यह बात कि स्त्रियाँ या लड़कियाँ हनुमान जी की पूजा नहीं कर सकतीं, काफ़ी हद तक एक लोकप्रिय भ्रम है। किसी शास्त्र में स्त्री के हनुमान-भक्त होने पर, चालीसा पढ़ने पर, या उनका नाम जपने पर कोई रोक नहीं है। आइए, इस भ्रम को जड़ से समझ लेते हैं।

पहले यह भ्रम कहाँ से आया, यह समझ लें

हनुमान जी को परंपरा में आजीवन ब्रह्मचारी माना जाता है – संयम और तपस्या के सबसे ऊँचे प्रतीक। इसी सम्मान-भाव से कुछ रीति-रिवाज़ निकले। पर ध्यान दीजिए कि ये रिवाज़ किस चीज़ के बारे में हैं और किस चीज़ के बारे में नहीं।

परंपरा में जहाँ कोई सावधानी कही भी गई है, वह एक बहुत ही विशेष, शारीरिक कर्मकांड तक सीमित है – जैसे स्त्री द्वारा मूर्ति को सीधे सिंदूर लगाना या उसे स्पर्श करना। यह संयम के सम्मान में बरती गई एक रिवाज़ी मर्यादा है, कोई शास्त्रीय आदेश नहीं। और इतना समझ लेना ज़रूरी है – यह नियम कहीं भी यह नहीं कहता कि स्त्री हनुमान जी से प्रेम न करे, उनकी भक्त न बने, चालीसा न पढ़े या उनका नाम न जपे।

यानी जो छोटी-सी मर्यादा है, वह “मूर्ति को छूना/सिंदूर लगाना” जैसे एक काम तक है। बाकी पूरी भक्ति – प्रेम, प्रार्थना, पाठ, स्मरण – सबके लिए हमेशा खुली रही है। लोगों ने इस छोटे-से नियम को खींचकर “पूजा ही मत करो” बना दिया, और वहीं से डर फैल गया।

दो अलग चीज़ों को अलग कर लीजिए

उलझन का असली कारण यही है कि हम दो बिलकुल अलग बातों को एक मान बैठते हैं:

  • एक विशेष कर्मकांड: मूर्ति को छूना, उस पर सिंदूर या चोला चढ़ाना – इसी एक हिस्से को लेकर कुछ परंपराएँ ब्रह्मचर्य के सम्मान में स्त्री के लिए सावधानी कहती हैं।
  • पूरी भक्ति: हनुमान चालीसा पढ़ना, “जय श्रीराम” या “हनुमान” नाम जपना, व्रत रखना, मन से प्रार्थना करना, दूर से दर्शन करना – इस पर किसी ने, कभी, कोई रोक नहीं लगाई।

यह फ़र्क समझते ही आधा डर वहीं ख़त्म हो जाता है। मर्यादा एक छोटे-से शारीरिक स्पर्श तक है; आपका भगवान से रिश्ता उससे कोसों आगे और पूरी तरह आपका अपना है।

भक्ति का असली सच – नाम पर किसी का पहरा नहीं

अब वह बात जो हर बेटी, हर बहन, हर माँ को सुकून दे – भक्ति दिल की होती है, लिंग की नहीं। और भगवान का नाम तो किसी भी अवस्था या शर्त का मोहताज ही नहीं।

कलि-संतरण उपनिषद कहता है – भगवान का नाम शुद्ध हो या अशुद्ध, हर अवस्था में लिया जा सकता है। इस पर समय, स्थान या किसी भी बंधन का पहरा नहीं।

गीता (10.25) में स्वयं श्रीकृष्ण कहते हैं – “यज्ञों में मैं जप-यज्ञ हूँ।” आचार्य बताते हैं कि जप सबसे सरल साधना है, जिसे कोई भी, कहीं भी, बिना किसी विधि-विधान के कर सकता है। और हनुमान जी तो स्वयं राम-नाम के सबसे बड़े जपकर्ता हैं – जिस नाम को रामायण में सबसे ऊँचा कहा गया, उसे जपने का अधिकार भला किसी एक वर्ग तक कैसे सिमट सकता है?

इतिहास और घर-घर का अनुभव भी यही कहता है। अनगिनत स्त्रियाँ जीवन भर हनुमान जी की भक्त रही हैं – मंगलवार-शनिवार चालीसा का पाठ करती हैं, संकट में “बजरंगबली” पुकारती हैं, और उन्हें रक्षक भाई की तरह मानती हैं। यह कोई नई छूट नहीं, यह हमेशा से चली आई सहज भक्ति है। हनुमान जी का बल और रक्षा सबके लिए है – बेटियों के लिए भी उतना ही जितना बेटों के लिए।

तो फिर लड़कियाँ-महिलाएँ क्या-क्या कर सकती हैं?

असली सवाल यही है – “ठीक है, अगर मूर्ति-स्पर्श वाली एक मर्यादा है भी, तो मैं हनुमान जी से जुड़ी कैसे रहूँ?” जवाब बहुत खुला और सरल है। जो भक्ति मन और वाणी से होती है, वह पूरी तरह आपकी है:

  • हनुमान चालीसा का पाठ: रोज़, या मंगलवार-शनिवार – कोई रोक नहीं। चाहें तो ज़ोर से, चाहें मन ही मन।
  • नाम जप: “श्री राम जय राम” या “हनुमान” नाम भीतर-भीतर दोहराइए। मानसिक जप को सबसे शक्तिशाली माना गया है, और इसके लिए न कुछ छूना पड़ता है, न कोई विधि।
  • व्रत और प्रार्थना: मंगलवार का व्रत, मन से माँगी गई रक्षा – भाव ही पूजा है।
  • दूर से दर्शन: मूर्ति या चित्र की ओर देखकर, बिना छुए, मन से प्रणाम कर लीजिए। भक्ति को स्पर्श चाहिए ही नहीं।

और यहीं एक आसान सहारा काम आता है। अगर मूर्ति-माला छूने को लेकर मन में कोई संकोच रहता है, या मंदिर रोज़ जाना मुमकिन नहीं, तो Devta App में आप घर बैठे हनुमान जी के रोज़ दर्शन कर सकती हैं, उन्हें फूल, धूप और दीप अर्पित कर सकती हैं, और मन ही मन नाम जप काउंटर से गिन सकती हैं – बिना कुछ छुए, बिना किसी रोक के, किसी भी अवस्था में। यह वह भक्ति है जिसे कोई रोक नहीं सकता, और जिसका रोज़ का क्रम भी अपने-आप बना रहता है।

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ये गलतफहमियाँ आज ही छोड़ दें

  • “लड़कियाँ हनुमान जी की पूजा नहीं कर सकतीं” – यह एक भ्रम है। चालीसा, नाम जप और भक्ति सबके लिए खुली है।
  • “ब्रह्मचारी हैं इसलिए स्त्री दूर रहे” – ब्रह्मचर्य का सम्मान सिर्फ़ एक छोटे-से कर्मकांड (मूर्ति-स्पर्श/सिंदूर) की मर्यादा तक है, भक्ति पर रोक नहीं।
  • “पीरियड्स में चालीसा नहीं पढ़ सकते” – मन का पाठ और नाम स्मरण हर अवस्था में खुला है; सिर्फ़ मूर्ति-स्पर्श वाली औपचारिक पूजा इन दिनों टाली जाती है।
  • “हनुमान जी नाराज़ हो जाएँगे” – जो रक्षक भाई हर भक्त की पुकार सुनता है, वह नाराज़ नहीं होता। वह भाव देखता है, लिंग नहीं गिनता।

तो उस बच्ची से, और हर उस स्त्री से जिसे कभी रोका गया – बेझिझक चालीसा पढ़िए, बजरंगबली का नाम जपिए, उन्हें अपना रक्षक मानिए। भक्ति शरीर से नहीं, हृदय से होती है। और हृदय पर किसी का पहरा नहीं चलता। हनुमान जी उतने ही आपके हैं, जितने किसी और के।

क्या महिलाएं हनुमान चालीसा पढ़ सकती हैं?

हाँ, बिलकुल। हनुमान चालीसा पढ़ने या हनुमान जी का नाम जपने पर किसी भी स्त्री के लिए कोई शास्त्रीय रोक नहीं है। यह सबके लिए खुली है।

क्या महिलाएं पीरियड्स में हनुमान चालीसा पढ़ सकती हैं?

मन ही मन नाम जप और हनुमान चालीसा का स्मरण हर अवस्था में किया जा सकता है। पारंपरिक रूप से सिर्फ़ मूर्ति को छूना और औपचारिक पूजा इन दिनों टाली जाती है – पाठ और स्मरण नहीं।

क्या लड़कियाँ हनुमान जी को सिंदूर चढ़ा सकती हैं?

कुछ परंपराएँ ब्रह्मचर्य के सम्मान में स्त्री द्वारा मूर्ति को सिंदूर लगाने या स्पर्श करने से बचने को कहती हैं। यह एक विशेष कर्मकांड तक सीमित है, भक्ति, प्रार्थना या चालीसा पर रोक नहीं।

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