ॐ कृष्णाय वासुदेवाय: वह मंत्र जो 20,800 राजाओं ने बंदीगृह से छूटते ही गाया
गिरिव्रज के किले में 20,800 राजा बंदी थे। वर्षों से जरासंध की कैद में – राज्य छिना, वैभव छिना, स्वतंत्रता छिनी। फिर एक दिन भीम ने मल्ल-युद्ध में जरासंध का वध किया, और श्रीकृष्ण ने बंदीगृह के द्वार खुलवा दिए। सोचिए – वर्षों बाद खुले आसमान के नीचे खड़े उन राजाओं के मुँह से पहला वाक्य क्या निकला होगा? कोई शिकायत नहीं, कोई प्रतिशोध की माँग नहीं। श्रीमद्भागवत कहता है, वे सब हाथ जोड़कर एक स्वर में बोले:
ॐ कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने ।
प्रणतः क्लेशनाशाय गोविन्दाय नमो नमः ॥
आज लाखों लोग इस मंत्र को जपते हैं, पर बहुत कम जानते हैं कि यह किसी ऋषि की कुटिया में नहीं, एक बंदीगृह के बाहर जन्मा – उन लोगों के हृदय से जो सब कुछ खोकर मुक्त हुए थे। यही इस मंत्र की पहचान है: यह टूटे हुओं का, शरणागतों का मंत्र है। स्रोत है श्रीमद्भागवत महापुराण, दशम स्कंध, अध्याय 73, श्लोक 16।
शब्द-शब्द अर्थ: छह संबोधन, एक शरणागति
यह श्लोक कृष्ण को छह रूपों में पुकारता है, और हर संबोधन चतुर्थी विभक्ति में है – “के लिए, को नमन” के भाव में:
- कृष्णाय: “कृष्” धातु से – जो सबको अपनी ओर खींच ले। मन जहाँ स्वयं खिंचा चला जाए, वह कृष्ण।
- वासुदेवाय: वसुदेव के पुत्र, और गहरे अर्थ में – जो सब प्राणियों में वास करे। गीता का “वासुदेवः सर्वम्” यहीं से जुड़ता है।
- हरये: हरि को – जो हर ले। पाप, दुःख, भय और अज्ञान को हरने वाले।
- परमात्मने: उस परम आत्मा को, जो हर हृदय के भीतर साक्षी रूप में विराजमान है। मंत्र कहता है – जिसे तुम बाहर पुकार रहे हो, वह भीतर भी बैठा है।
- प्रणतः क्लेशनाशाय: श्लोक का हृदय। प्रणत = जो झुक गया, शरण में आ गया; क्लेशनाशाय = उसके क्लेशों का नाश करने वाले को। शर्त एक ही है – झुकना।
- गोविन्दाय नमो नमः: गौओं, इंद्रियों और सम्पूर्ण जगत का पालन करने वाले गोविंद को बार-बार नमन। “नमो नमः” की पुनरावृत्ति का अर्थ – एक बार नहीं, फिर-फिर, हर साँस में नमन।
पूरा अर्थ हुआ: “सबको आकर्षित करने वाले श्रीकृष्ण को, सर्वव्यापी वासुदेव को, दुःख हरने वाले हरि को, अन्तर्यामी परमात्मा को, शरणागत के क्लेश नष्ट करने वाले गोविंद को हम बार-बार नमस्कार करते हैं।”
भागवत की वह कथा जो इस मंत्र की आत्मा है
श्रीमद्भागवत के दशम स्कंध का 73वाँ अध्याय ही “मुक्त राजाओं पर श्रीकृष्ण की कृपा” का अध्याय है। मगध-नरेश जरासंध ने दिग्विजय में हराए हुए हज़ारों राजाओं को गिरिव्रज के पर्वतीय दुर्ग में बंदी बना रखा था। जब श्रीकृष्ण, भीम और अर्जुन ब्राह्मण वेश में मगध पहुँचे और भीम के हाथों जरासंध का अंत हुआ, तब कृष्ण ने सबसे पहले यही किया – बंदीगृह खुलवाया।
पर कथा का सबसे मार्मिक हिस्सा आगे है। मुक्त राजाओं ने कृष्ण से अपना राज्य वापस नहीं माँगा, धन नहीं माँगा, जरासंध से बदला नहीं माँगा। भागवत कहता है – उन्होंने अपनी कैद को भी प्रभु की कृपा माना, जिसने उनका राज-मद तोड़ दिया था। उन्होंने बस एक वरदान माँगा: “हमें आपके चरणों का स्मरण सदा बना रहे।” जिस मंत्र से यह प्रार्थना शुरू हुई, वही आज हमारे पास “ॐ कृष्णाय वासुदेवाय” के रूप में है।
एक पाठ-भेद भी जान लें: भागवत के मूल श्लोक में “प्रणतक्लेशनाशाय” एक समस्त पद है, और आरंभ में ॐ नहीं है। जनमानस और कीर्तन-परंपरा में यह “ॐ” के साथ और “प्रणतः क्लेशनाशाय” के रूप में प्रचलित हो गया। दोनों का अर्थ एक ही है – शरणागत के क्लेश का नाश करने वाले। आप जिस रूप में जपते आए हैं, निश्चिंत होकर वही जपें।
यह मंत्र किसके लिए है?
इस मंत्र की जन्म-कथा ही इसका उत्तर है। यह उनका मंत्र है जो किसी न किसी बंदीगृह में हैं – कोई चिंता में बंदी है, कोई रोग में, कोई ऋण में, कोई संबंधों की उलझन में। जरासंध हर युग में नया रूप लेकर आता है। मंत्र का वचन स्पष्ट है: जो प्रणत होकर – झुककर, शरण में आकर – पुकारता है, उसके क्लेश का नाश गोविंद करते हैं।
इसीलिए परंपरा में इसे संकट के समय का आश्रय-मंत्र भी कहा जाता है, और नित्य-जप का मंत्र भी। सुख के दिनों में जपा गया यही नाम संकट के दिन सबसे पहले याद आता है – जैसे रोज़ मिलने वाला मित्र मुसीबत में सबसे पहले पहुँचता है।
जप विधि: सरल रखें, नियमित रखें
- समय: प्रातःकाल स्नान के बाद का शांत समय सर्वोत्तम है, पर यह नाम-स्मरण का श्लोक है – दिन के किसी भी पहर, किसी भी अवस्था में जपा जा सकता है।
- संख्या: 108 बार (एक माला) प्रतिदिन का संकल्प लें। समय कम हो तो 11 या 21 बार से शुरू करें – छोटा नियम जो रोज़ निभे, बड़े अनियमित जप से श्रेष्ठ है।
- माला: कृष्ण-जप के लिए तुलसी की माला परंपरागत रूप से सर्वोत्तम मानी जाती है। माला न हो, या चलते-फिरते जप करना हो, तो Devta App का जप काउंटर उपयोग करें – गिनती ऐप सँभालता है, आपका ध्यान नाम पर टिका रहता है।
- स्वर: धीमे स्वर में, होंठों में (उपांशु), या पूर्ण मौन मानसिक जप – तीनों मान्य हैं। भीड़ में, यात्रा में मानसिक जप सबसे सहज है।
- भाव: जपते समय “प्रणतः” शब्द को याद रखें – हर आवृत्ति एक छोटा सा झुकना है। यही इस मंत्र की कुंजी है।
आम भूलें जो इस जप का फल रोक देती हैं
पहली भूल – इसे सौदे की तरह जपना। “इतनी माला करूँगा तो यह काम हो जाएगा” – यह भाव मंत्र की आत्मा के विपरीत है। मुक्त राजाओं ने राज्य नहीं माँगा था, स्मरण माँगा था; राज्य कृष्ण ने स्वयं लौटा दिया। शरणागति पहले है, क्लेशनाश उसका फल है – क्रम उलटा नहीं होता।
दूसरी भूल – “प्रणतः” को छोड़कर जपना। जीभ पर मंत्र और मन में अकड़ – तो वह जप नहीं, केवल उच्चारण है। मंत्र स्वयं कह रहा है कि क्लेशनाश किसका होता है: जो प्रणत है, झुका हुआ है।
तीसरी भूल – चार दिन में परिणाम न दिखे तो छोड़ देना। राजाओं ने भी वर्षों कारागार में बिताए थे। नाम-जप खेती है, जादू नहीं – बीज रोज़ सींचा जाता है। यहीं पर गिनती का दिखना बड़ा सहारा बनता है: जब Devta App पर रोज़ का जप-आँकड़ा और परिवार का साझा हिसाब आँखों के सामने रहता है, तो माला छूटने वाले दिन भी पकड़ में आ जाते हैं और नियम टूटने से बच जाता है।
कृष्ण के नामों में और गहरे उतरना चाहें तो हमारा कृष्ण के 108 नाम अर्थ सहित लेख पढ़ें – इस श्लोक के हर संबोधन का विस्तार वहाँ मिलेगा।
अंत में वही बात जो इस मंत्र की जन्म-कथा सिखाती है: कृष्ण से मुक्ति माँगने के लिए किसी योग्यता की आवश्यकता नहीं – बंदी होना ही पर्याप्त योग्यता है। बस झुककर पुकारना शेष है।
ॐ कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने मंत्र किस ग्रंथ से है?
यह श्लोक श्रीमद्भागवत महापुराण के दशम स्कंध, अध्याय 73, श्लोक 16 से है। जरासंध के बंदीगृह से मुक्त हुए 20,800 राजाओं ने श्रीकृष्ण के सामने हाथ जोड़कर यही श्लोक कहा था। मूल पाठ में ‘प्रणतक्लेशनाशाय’ समस्त पद है; जनमानस में ॐ के साथ ‘प्रणतः क्लेशनाशाय’ रूप प्रचलित है – भाव एक ही है।
इस मंत्र का जप कितनी बार करना चाहिए?
कोई बंधन नहीं है। परंपरागत रूप से 108 बार (एक माला) प्रतिदिन का अभ्यास सर्वोत्तम माना जाता है। संख्या से अधिक महत्वपूर्ण है नियमितता और शरणागति का भाव – रोज़ थोड़ा, पर बिना नागा।
क्या यह मंत्र कोई भी, कभी भी जप सकता है?
हाँ। यह नाम-स्मरण का श्लोक है, कोई तांत्रिक विधान नहीं – स्त्री-पुरुष, किसी भी आयु और अवस्था में इसका जप कर सकते हैं। स्नान के बाद शांत मन से करें तो उत्तम, पर चलते-फिरते मानसिक जप भी पूर्ण फलदायी माना गया है।
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