बजरंग बाण: संपूर्ण पाठ, अर्थ और लाभ
बजरंग बाण गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित एक शक्तिशाली रक्षा-पाठ है – हनुमान जी को सीधे पुकारने की आर्त विनती, जो संकट के क्षण में बाण की तरह काम करती है। नीचे इस बाण का संपूर्ण पाठ, हर दोहे और हर चौपाई के हिंदी अर्थ सहित दिया गया है – स्रोत: संस्कृत डॉक्यूमेंट्स (sanskritdocuments.org) पर स्वयंसेवकों द्वारा प्रमाणित पाठ।
बजरंग बाण – संपूर्ण पाठ अर्थ सहित
यह पाठ गोस्वामी तुलसीदास जी कृत परंपरागत अवधी रचना है – सार्वजनिक डोमेन। पाठ में कुछ क्षेत्रीय भिन्नताएं मिलती हैं; यहाँ मूल प्रामाणिक संस्करण दिया गया है।
आरंभिक दोहा
निश्चय प्रेम प्रतीति ते, बिनय करैं सनमान।
तेहि के कारज सकल शुभ, सिद्ध करैं हनुमान॥
अर्थ: जो निश्चल प्रेम, दृढ़ विश्वास और आदर के साथ विनती करता है – हनुमान जी उसके समस्त शुभ कार्य सिद्ध करते हैं।
चौपाइयाँ
जय हनुमंत संत हितकारी। सुन लीजै प्रभु अरज हमारी॥
जन के काज बिलंब न कीजै। आतुर दौरि महा सुख दीजै॥
अर्थ: हे संतों के हितकारी हनुमान जी, जय हो! मेरी विनती सुन लीजिए। भक्त के काम में देर न करें – आतुर होकर दौड़ें और महान सुख दें।
जैसे कूदि सिंधु महिपारा। सुरसा बदन पैठि बिस्तारा॥
आगे जाय लंकिनी रोका। मारेहु लात गई सुरलोका॥
अर्थ: जैसे आपने समुद्र कूदकर लंका पार किया, सुरसा के मुँह में घुसकर अपना आकार बढ़ाया; आगे लंकिनी ने रोका – उसे लात मारकर सुरलोक पहुँचा दिया।
जाय बिभीषन को सुख दीन्हा। सीता निरखि परमपद लीन्हा॥
बाग उजारि सिंधु महँ बोरा। अति आतुर जमकातर तोरा॥
अर्थ: विभीषण को जाकर सुख दिया, सीता माता के दर्शन कर परमपद प्राप्त किया। अशोक वाटिका उजाड़ी और जल में डुबोई। अति आतुर यम-किंकरों को छिन्न-भिन्न किया।
अक्षय कुमार मारि संहारा। लूम लपेटि लंक को जारा॥
लाह समान लंक जरि गई। जय जय धुनि सुरपुर नभ भई॥
अर्थ: अक्षय कुमार को मारकर संहार किया। पूँछ में आग लपेटकर लंका जला दी। लाख की तरह लंका जल गई और आकाश में जय-जय की ध्वनि गूँजी।
अब बिलंब केहि कारन स्वामी। कृपा करहु उर अंतरयामी॥
जय जय लखन प्रान के दाता। आतुर ह्वै दुख करहु निपाता॥
अर्थ: हे स्वामी, अब देरी किस कारण? हे अंतर्यामी, हृदय में कृपा करें। लक्ष्मण के प्राणदाता की जय हो – आतुर होकर आएं और दुःख को जड़ से नष्ट करें।
जै हनुमान जयति बलसागर। सुर समूह समरथ भटनागर॥
ॐ हनु हनु हनु हनुमंत हठीले। बैरिहि मारू बज्र की कीले॥
अर्थ: हे बलसागर हनुमान जी की जय! देव-समूह में सबसे समर्थ वीर की जय! ॐ हनु हनु – हे हठीले हनुमंत जी, शत्रु को वज्र की कीलों से मारें।
गदा बज्र लै बैरिहिं मारो। महाराज प्रभु दास उबारो॥
ॐकार हुंकार महाप्रभु धावो। बज्र गदा हनु विलम्ब न लावो॥
अर्थ: गदा और वज्र लेकर शत्रु को मारें, हे महाराज प्रभु, दास को उबारें। ॐकार की हुंकार के साथ दौड़ें – वज्र और गदा से मारें, देर न लाएं।
ॐ ह्रीं ह्रीं ह्रीं हनुमंत कपीशा। ॐ हुं हुं हुं हनु अरिउरसीशा॥
सत्य होहु हरि सपथ पाइ कै। राम दूत धरू मारू धाइ कै॥
अर्थ: ॐ ह्रीं ह्रीं – हे कपीश हनुमान! ॐ हुं हुं – शत्रु की छाती को चूर करें। हरि की शपथ लेकर सत्य करें – हे राम-दूत, तुरंत दौड़कर शत्रु को दें मार।
जय जय जय हनुमंत अगाधा। दुख पावत जन केहि अपराधा॥
पूजा जप तप नेम अचारा। नहिं जानत हौं दास तुम्हारा॥
अर्थ: जय जय जय – हे अगाध हनुमान! भक्त किस अपराध से दुःख पा रहा है? पूजा, जप, तप, नियम, आचार – मैं कुछ नहीं जानता, मैं तो बस आपका दास हूँ।
बन उपबन मग गिरि गृह माहीं। तुम्हरे बल हौं डरपत नाहीं॥
जय अंजनि कुमार बलवन्ता। शंकरसुवन बीर हनुमन्ता॥
अर्थ: वन, उपवन, मार्ग, पर्वत या घर – हर जगह तुम्हारे बल से डर नहीं लगता। जय हो, अंजनि के बलवंत पुत्र! जय शंकर-सुवन, वीर हनुमंत!
बदन कराल काल-कुल-घालक। राम सहाय सदा प्रतिपालक॥
भूत, प्रेत, पिसाच निसाचर। अगिन बेताल काल मारी मर॥
अर्थ: विकराल मुख वाले, काल-कुल के नाशक, राम के सहायक और सदा के पालक। भूत, प्रेत, पिशाच, निशाचर, अग्निवेताल, काल और महामारी – सब नष्ट हों।
इन्हें मारू, तोहि सपथ राम की। राखउ नाथ मरजाद नाम की॥
जनकसुता हरि दास कहावौ। ताकी सपथ बिलंब न लावौ॥
अर्थ: इन्हें मारें – आपको राम की शपथ है, हे नाथ! अपने नाम की मर्यादा रखें। जानकी-पति के दास कहलाते हैं – उनकी शपथ पर बिलंब न करें।
जै जै जै धुनि होत अकासा। सुमिरत होय दुसह दुख नासा॥
चरन पकरि, कर जोरि मनावौं। यहि औसर अब केहि गोहरावौं॥
अर्थ: आकाश में जय-जय-जय की ध्वनि हो रही है। स्मरण करते ही असह्य दुःख नष्ट होता है। आपके चरण पकड़कर, हाथ जोड़कर मनाता हूँ – इस अवसर पर और किसे पुकारूँ?
उठु, उठु, चलु, तोहि राम दुहाई। पायँ परौं, कर जोरि मनाई॥
ॐ चं चं चं चं चपल चलंता। ॐ हनु हनु हनु हनु हनुमंता॥
अर्थ: उठो, उठो, चलो – तुम्हें राम की दुहाई है! पाँव पड़ता हूँ, हाथ जोड़कर मनाता हूँ। ॐ चं चं – चपल-गतिशील! ॐ हनु हनु – हे हनुमंत!
ॐ हं हं हाँक देत कपि चंचल। ॐ सं सं सहमि पराने खलदल॥
अपने जन को तुरत उबारौ। सुमिरत होय आनंद हमारौ॥
अर्थ: ॐ हं हं – चपल कपि हाँक लगाते हैं! ॐ सं सं – दुष्टों के दल सहमकर भागते हैं। अपने जन को तुरंत उबारें – स्मरण करते ही हमें आनंद होगा।
राम रूप सर्वत्र समाना। देखत रहत सदा हर्षाना॥
विधि शारदा सहित दिनराती। गावत कपि के गुन बहु भांति॥
अर्थ: राम-रूप सर्वत्र एक-समान है, जिसे देखकर सदा प्रसन्न रहते हैं। ब्रह्मा और शारदा सहित दिन-रात अनेक प्रकार से कपि के गुण गाते हैं।
तुम सम नहीं जगत बलवाना। करि विचार देखौं विधि नाना॥
यह जिय जानि शरण तब आई। ताते विनय करौं चित लाई॥
अर्थ: अनेक उपाय विचार करके देखा – तुम्हारे समान जगत में बलवान कोई नहीं। यही जानकर शरण में आया, इसीलिए ध्यान लगाकर विनती करता हूँ।
सुनि कपि आरत वचन हमारे। मेटहु सकल दुःख भ्रम भारे॥
एहि प्रकार विनती कपि केरी। जो जन करैं लहै सुख ढेरी॥
अर्थ: हे कपि, हमारे आर्त वचन सुनकर सभी दुःख और भ्रम का बोझ मिटाएं। इस प्रकार जो जन कपि की यह विनती करते हैं, वे सुखों का ढेर पाते हैं।
याके पढ़त वीर हनुमाना। धावत बाण तुल्य बनवाना॥
मेटत आए दुःख क्षण माहिं। दै दर्शन रघुपति ढिग जाहीं॥
अर्थ: जब वीर हनुमान इसे पढ़ते हैं, वे बाण की तरह वन में दौड़ते हैं। क्षण में ही दुःख मिटाकर, राघव का दर्शन कराकर लौट जाते हैं।
पाठ-फल (समापन की चौपाइयाँ)
यह बजरंग-बाण जेहि मारै। ताहि कहौ फिरि कवन उबारै॥
पाठ करै बजरंग-बाण की। हनुमत रक्षा करै प्रान की॥
यह बजरंग बाण जो जापैं। तासों भूत-प्रेत सब कापंऐ॥
धूप देय जो जपै हमेसा। ताके तन नहिं रहै कलेसा॥
अर्थ: जिसे यह बजरंग-बाण लगे, उसे कौन बचा सकता है? इसका पाठ करने से हनुमान जी प्राणों की रक्षा करते हैं। जो इसका जप करते हैं, उनसे भूत-प्रेत काँपते हैं। जो धूप जलाकर नित्य जपते हैं, उनके तन का कलेश दूर होता है।
समापन दोहा
उर प्रतीति दृढ़, सरन ह्वै, पाठ करै धरि ध्यान।
बाधा सब हर, करैं सब काम सफल हनुमान॥
अर्थ: हृदय में दृढ़ विश्वास रखकर, शरण होकर, ध्यान से पाठ करे – हनुमान जी सभी बाधाएं हरकर सभी कार्य सफल करते हैं।
बजरंग बाण का महत्व – यह सामान्य स्तोत्र नहीं है
हनुमान चालीसा जहाँ हनुमान जी की महिमा का शांत गान है, वहीं बजरंग बाण एक आर्त पुकार है – वह आवाज़ जो तब निकलती है जब सब उपाय चुक जाएं। इसी लिए इसकी भाषा में एक अनूठी तत्परता है: “उठु, उठु, चलु”, “आतुर दौरि”, “बिलंब न कीजै”। भक्त यहाँ प्रार्थना नहीं कर रहा – वह गुहार लगा रहा है।
इस पाठ की एक और विशेषता है इसके बीज-मंत्र (“ॐ हनु हनु हनु”, “ॐ ह्रीं ह्रीं ह्रीं”, “ॐ चं चं चं”)। परंपरा में इन्हें हनुमान जी के स्वरूप से जोड़ा गया है – ये शब्द केवल काव्य नहीं, प्रभु को बुलाने की ध्वनि हैं। इसीलिए इस पाठ को हनुमान चालीसा से भी अधिक “तत्काल असर” वाला माना जाता है।
तुलसीदास जी स्वयं लिखते हैं – “याके पढ़त वीर हनुमाना, धावत बाण तुल्य बनवाना” – अर्थात् जब इसका पाठ होता है, हनुमान जी बाण की गति से दौड़ते हैं। यह विश्वास ही इस पाठ की नींव है।
पाठ कैसे करें – सरल विधि
बजरंग बाण की कोई जटिल विधि नहीं है। परंपरागत रूप से इन बातों का ध्यान रखा जाता है:
- समय: मंगलवार और शनिवार सर्वोत्तम हैं। सुबह स्नान के बाद या संध्या में पाठ करें।
- आवृत्ति: 11 बार का पाठ सबसे प्रभावशाली माना जाता है। नित्य के लिए एक बार भी पर्याप्त है।
- धूप-दीप: गुग्गुल या हनुमान जी की पसंद की धूप जलाएं – पाठ में स्वयं यह निर्देश है (“धूप देय जो जपै”)।
- एकाग्रता: पाठ केवल होठों से नहीं, ध्यान से होना चाहिए। “उर प्रतीति दृढ़” – हृदय में विश्वास पहला नियम है।
- माला या काउंटर: 11 बार गिनने के लिए माला लें या Devta App का जप-काउंटर इस्तेमाल करें – ध्यान पाठ पर रहता है, गिनती पर नहीं।
एक सामान्य भ्रांति – जो लोग नहीं जानते
बहुत लोग सोचते हैं कि बजरंग बाण केवल “भूत-प्रेत” या “नकारात्मक ऊर्जा” के लिए है। यह अधूरी समझ है। इस पाठ में भक्त ने हर प्रकार के दुःख का उल्लेख किया है – “दुख पावत जन केहि अपराधा” – यानी किसी भी कारण से आई बाधा, रोग, भय, शत्रु-पीड़ा या मानसिक कष्ट। यह एक सर्वांगीण रक्षा-कवच है।
दूसरी भ्रांति यह है कि इसे केवल “बड़े संकट” में पढ़ें। तुलसीदास जी ने समापन दोहे में लिखा है – “पाठ करैं धरि ध्यान” – नित्य पाठ को श्रेष्ठ कहा है। जिस तरह हनुमान चालीसा रोज़ाना पढ़ी जाती है, उसी तरह बजरंग बाण का नित्य पाठ भी एक सुरक्षा-कवच की तरह काम करता है।
Devta App पर हनुमान जी के दैनिक दर्शन करें, जप-काउंटर से पाठ की आवृत्ति गिनें और भक्ति की निरंतरता बनाए रखें – बिना माला को हाथ में लिए, बिना किसी झंझट के।
बजरंग बाण का पाठ कितनी बार करें?
परंपरागत रूप से 11 बार (ग्यारह आवृत्ति) सबसे प्रभावशाली माना जाता है। नित्य पाठ के लिए एक बार भी पर्याप्त है। Devta App पर जप-काउंटर से आवृत्ति गिनना सरल हो जाता है।
बजरंग बाण किसने लिखा?
बजरंग बाण गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित माना जाता है। अवधी भाषा में लिखा यह रक्षा-कवच हनुमान जी को पुकारने का सबसे प्रत्यक्ष मार्ग माना जाता है।
बजरंग बाण और हनुमान चालीसा में क्या अंतर है?
हनुमान चालीसा 40 चौपाइयों में हनुमान जी की स्तुति और महिमा का गान है, जबकि बजरंग बाण एक आर्त पुकार है – विशेष संकट में हनुमान जी से तत्काल सहायता की याचना।
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