ब्रह्मा के पास जब नारद एक प्रश्न लेकर आए – “इस कलियुग में कौन सा एक उपाय है जिससे मनुष्य संसार के बंधन से मुक्त हो सके?” – तो ब्रह्मा ने जवाब में एक मंत्र दिया। सोलह शब्दों का। बिना किसी नियम के। बिना किसी पात्रता-शर्त के। यह संवाद कलि-संतरण उपनिषद में है – वैष्णव…
एक सवाल सोचिए: भगवान राम ने अपने पूरे जीवनकाल में कितने लोगों को सीधे तारा? ऋषि-पत्नी अहिल्या का उद्धार – यही सबसे प्रसिद्ध उदाहरण है। लेकिन तुलसीदास रामचरितमानस में एक चौंकाने वाली तुलना करते हैं। राम एक तापस तिय तारी। नाम कोटि खल कुमति सुधारी॥ अर्थ: राम ने एक तपस्विनी (अहिल्या) का उद्धार किया –…
जप शुरू किया, माला उठाई, पहले तीन मनके घुमाए – और मन पहुँच गया कल की उस मीटिंग पर जो अधूरी रह गई थी। यह आपके साथ ही नहीं होता। अर्जुन ने भगवान कृष्ण से ठीक यही बात कही थी: मन बड़ा चंचल है, प्रमाथन करने वाला, बलवान और दृढ़ (भगवद गीता 6.34)। कृष्ण ने…
आज तक आपने नाम जपा है – पर कभी लिखा है? तुलसीदास के काल से चली आ रही एक परंपरा है जिसमें भक्त अपने जीवनकाल में लाखों, यहाँ तक कि करोड़ों बार “राम” लिखते हैं। इन नोटबुक्स को “राम नाम बही” कहते हैं, और वृंदावन में ऐसी हजारों बहियों का संग्रह आज भी सुरक्षित है।…
कभी आधी रात नींद टूटे और होंठों पर नाम हो – जपने की कोशिश नहीं की थी, फिर भी नाम था। या दिनभर काम करते हुए मन के किसी कोने में राम, राम, राम चलता रहे। यह अनुभव जिन्हें हुआ है, वे जानते हैं कि यह सामान्य जप से बिल्कुल अलग है। इसे संत परंपरा…
“नाम जप के नियम” खोजते हुए आपने अब तक बहुत कुछ पढ़ा होगा – कोई कहता है पहले नहाओ, कोई कहता है माला चाहिए, कोई कहता है संध्याकाल ही सही है, कोई कहता है प्याज मत खाओ। इतनी शर्तें सुनकर लगता है – नाम जप एक जटिल अनुष्ठान है जिसे “सही तरीके से” करना मुश्किल…
आपकी थाली में प्याज-लहसुन है और मन में भगवान का नाम – क्या दोनों एक साथ नहीं हो सकते? यह सवाल उन करोड़ों भक्तों के मन में उठता है जो अपने रोज़ के खाने में प्याज-लहसुन का इस्तेमाल करते हैं लेकिन जप करना भी चाहते हैं। इसका जवाब उतना कठोर नहीं है जितना अक्सर बताया…
यह प्रश्न पिछले कई दशकों में लाखों घरों में उठा है। एक तरफ शास्त्र की परंपरा है, दूसरी तरफ भक्ति की उदार धारा। दोनों को ध्यान से सुनना ज़रूरी है – क्योंकि दोनों में सच्चाई का एक-एक हिस्सा है। शास्त्रीय दृष्टिकोण: परंपरागत मत क्या कहता है कुछ शास्त्रीय ग्रंथों और परंपराओं में गायत्री उपासना को…
संत कबीर ने गलियों में कपड़ा बुना और नाम जपते रहे। संत तुकाराम खेत में काम करते हुए विट्ठल-नाम में डूबे रहते थे। संत नरसी मेहता बाज़ार में, चौपाल में, हर जगह नाम लेते थे – और उन्होंने कभी नहीं पूछा: “क्या यहाँ नाम लेना ठीक है?” यह प्रश्न उनके मन में आया ही नहीं।…
हाँ, खाना खाने के बाद भी नाम जप किया जा सकता है। जूठे मुँह की शुचिता का नियम माला और औपचारिक पूजा के लिए है, नाम के मानसिक स्मरण के लिए नहीं। भोजन के बाद कुल्ला या आचमन करके माला से जप करें; पर मन ही मन भगवान का नाम हर पल, हर स्थिति में…