गणेश चालीसा - ganesh-chalisa-poora-path-arth-sahit

गणेश चालीसा: संपूर्ण पाठ, हर चौपाई का अर्थ

श्री गणेश चालीसा भगवान गणेश को समर्पित एक पारंपरिक भक्ति स्तोत्र है – इसमें उनका स्वरूप-वर्णन, जन्म-कथा और महिमा का गान है। नीचे गणेश चालीसा का संपूर्ण पाठ देवनागरी में दिया गया है और हर चौपाई के तुरंत बाद उसका सरल हिंदी अर्थ भी है। यह पाठ परंपरागत लोक-भक्ति परंपरा पर आधारित है जो सदियों से सार्वजनिक रूप से प्रचलित है; कुछ पाठों में ‘राम सुन्दर’ नामक भक्त कवि का उल्लेख है जो प्रयाग के ककरा-दुर्वासा से थे।

श्री गणेश चालीसा – संपूर्ण पाठ और अर्थ

दोहा (आरंभ)

जय गणपति सदगुण सदन, कवि वर बदन कृपाल।
विघ्न हरण मंगल करण, जय जय गिरिजालाल॥

अर्थ: जय हो गणपति! आप सद्गुणों के धाम हैं, कविता और वाणी का वरदान देने वाले कृपालु हैं। आप विघ्नों को हरने वाले और मंगल करने वाले हैं। हे गिरिजा-नंदन (पार्वती के पुत्र), आपकी जय हो।

चौपाई

जय जय जय गणपति गणराजू। मंगल भरण करण शुभ काजू॥

अर्थ: गणों के राजा गणपति की तीनों लोकों में जय हो! आप मंगल से भरे हुए हैं और सभी शुभ कार्यों को सम्पन्न कराते हैं।

जय गजबदन सदन सुखदाता। विश्व विनायक बुद्धि विधाता॥

अर्थ: हे गज-मुख (हाथी के मुख वाले), आप सुख के धाम हैं और भक्तों को सुख देने वाले हैं। आप समस्त विश्व के विनायक (नायक) और बुद्धि प्रदान करने वाले हैं।

वक्र तुण्ड शुची शुण्ड सुहावन। तिलक त्रिपुण्ड भाल मन भावन॥

अर्थ: आपकी सूँड टेढ़ी और पवित्र-सुंदर है। आपके ललाट (माथे) पर त्रिपुण्ड का तिलक शोभायमान है जो मन को बहुत अच्छा लगता है।

राजत मणि मुक्तन उर माला। स्वर्ण मुकुट शिर नयन विशाला॥

अर्थ: आपके वक्षस्थल पर मणियों और मोतियों की माला राजती है। सिर पर स्वर्ण-मुकुट है और आपके नेत्र विशाल एवं करुणामय हैं।

पुस्तक पाणि कुठार त्रिशूलं। मोदक भोग सुगन्धित फूलं॥

अर्थ: आपके हाथों में पुस्तक (ज्ञान का प्रतीक), कुठार (परशु) और त्रिशूल हैं। आपको मोदक का भोग और सुगंधित फूल अर्पित किए जाते हैं।

सुन्दर पीताम्बर तन साजित। चरण पादुका मुनि मन राजित॥

अर्थ: आपका शरीर सुंदर पीले वस्त्रों (पीताम्बर) से सुसज्जित है। आपकी चरण-पादुका (खड़ाऊँ) मुनियों के मन को भी आनंदित करती है।

धनि शिव सुवन षडानन भ्राता। गौरी ललन विश्व-विख्याता॥

अर्थ: आप भाग्यशाली हैं – शिव के पुत्र और षडानन (कार्तिकेय) के भ्राता हैं। आप गौरी (पार्वती) के लाडले पुत्र हैं और समस्त विश्व में विख्यात हैं।

ऋद्धि-सिद्धि तव चंवर सुधारे। मूषक वाहन सोहत द्वारे॥

अर्थ: आपकी दोनों शक्तियाँ ऋद्धि और सिद्धि आपकी सेवा में चंवर डुलाती हैं। द्वार पर आपका मूषक (चूहा) वाहन भी शोभायमान है।

जन्म-कथा की चौपाइयाँ

कहौ जन्म शुभ कथा तुम्हारी। अति शुची पावन मंगलकारी॥

अर्थ: अब आपकी शुभ जन्म-कथा कहता हूँ जो अत्यंत पवित्र, शुद्ध और मंगलकारी है।

एक समय गिरिराज कुमारी। पुत्र हेतु तप कीन्हों भारी॥

अर्थ: एक समय हिमालय-पुत्री पार्वती ने पुत्र की प्राप्ति के लिए अत्यंत कठोर तपस्या की।

भयो यज्ञ जब पूर्ण अनूपा। तब पहुँच्यो तुम धरी द्विज रूपा॥

अर्थ: जब उनका अनुपम यज्ञ पूर्ण हुआ, तब आप (गणेश) ब्राह्मण का रूप धारण करके वहाँ पहुँचे।

अतिथि जानी के गौरी सुखारी। बहु विधि सेवा करी तुम्हारी॥

अर्थ: गौरी ने आपको अतिथि जानकर प्रसन्नतापूर्वक अनेक प्रकार से आपकी सेवा की।

अति प्रसन्न हवै तुम वर दीन्हा। मातु पुत्र हित जो तप कीन्हा॥

अर्थ: आप (ब्राह्मण रूप में) अत्यंत प्रसन्न होकर बोले – माता ने पुत्र के लिए जो तप किया है, उसका फल मिलेगा।

मिलहिं पुत्र तुहि, बुद्धि विशाला। बिना गर्भ धारण यहि काला॥

अर्थ: तुम्हें एक पुत्र मिलेगा जो महान बुद्धिमान होगा, और वह इस समय बिना गर्भ धारण किए ही प्रकट होगा।

गणनायक गुण ज्ञान निधाना। पूजित प्रथम रूप भगवाना॥

अर्थ: वे ब्राह्मण-रूपी गणेश स्वयं गुण और ज्ञान के भंडार, गणों के नायक और प्रथम पूज्य भगवान थे।

अस कही अन्तर्धान रूप हवै। पालना पर बालक स्वरूप हवै॥

अर्थ: यह कहकर वे अंतर्धान हो गए और पालने में बालक के रूप में प्रकट हो गए।

बनि शिशु रुदन जबहिं तुम ठाना। लखि मुख सुख नहिं गौरी समाना॥

अर्थ: जब आपने शिशु बनकर रोने का निश्चय किया, तब पार्वती ने आपका मुख देखकर असीम सुख का अनुभव किया – उनके आनंद की कोई सीमा नहीं रही।

सकल मगन सुख मंगल गावहिं। नभ ते सुरन सुमन वर्षावहिं॥

अर्थ: सभी लोग मंगल-गीत गाने लगे। आकाश से देवताओं ने पुष्पों की वर्षा की।

शम्भु उमा बहुदान लुटावहिं। सुर मुनिजन सुत देखन आवहिं॥

अर्थ: शंभु (शिव) और उमा (पार्वती) ने खूब दान-उपहार बाँटे। देवता और मुनिजन बालक गणेश को देखने आए।

लखि अति आनन्द मंगल साजा। देखन भी आये शनि राजा॥

अर्थ: अत्यंत आनंद और मंगल का यह उत्सव देखकर शनि राजा भी देखने आए।

शनि-दृष्टि की घटना और गज-शिर की कथा

निज अवगुण गुनि शनि मन माहीं। बालक देखन चाहत नाहीं॥

अर्थ: शनि ने मन ही मन अपनी वक्र दृष्टि के दोष को सोचकर बालक को देखना उचित नहीं समझा।

गिरिजा कछु मन भेद बढायो। उत्सव मोर न शनि तुही भायो॥

अर्थ: पार्वती (गिरिजा) ने मन में कुछ सोचकर कहा – शनि! क्या मेरा यह उत्सव तुम्हें अच्छा नहीं लगा?

कहत लगे शनि मन सकुचाई। का करिहौ शिशु मोहि दिखाई॥

अर्थ: शनि ने संकुचाते हुए कहा – शिशु को मुझे क्या दिखाइए, मेरी दृष्टि में दोष है, नुकसान हो सकता है।

नहिं विश्वास उमा उर भयऊ। शनि सों बालक देखन कहयऊ॥

अर्थ: परंतु उमा (पार्वती) को विश्वास नहीं हुआ। उन्होंने शनि से बालक को देखने के लिए कहा।

पड़तहिं शनि दृग कोण प्रकाशा। बालक सिर उड़ि गयो आकाशा॥

अर्थ: जैसे ही शनि की दृष्टि-किरण कोण से बालक पर पड़ी, बालक का सिर आकाश में उड़ गया।

गिरिजा गिरी विकल हवै धरणी। सो दुःख दशा गयो नहीं वरणी॥

अर्थ: पार्वती व्याकुल होकर धरती पर गिर पड़ीं। उस दुख की दशा का वर्णन शब्दों में नहीं हो सकता।

हाहाकार मच्यौ कैलाशा। शनि कीन्हों लखि सुत का नाशा॥

अर्थ: कैलाश पर हाहाकार मच गया। शनि ने पुत्र का नाश देखकर गहरा पछतावा किया।

तुरत गरुड़ चढ़ि विष्णु सिधाये। काटी चक्र सो गजशिर लाये॥

अर्थ: तुरंत भगवान विष्णु गरुड़ पर चढ़कर गए और अपने सुदर्शन चक्र से हाथी का सिर काटकर ले आए।

बालक के धड़ ऊपर धारयो। प्राण मन्त्र पढ़ि शंकर डारयो॥

अर्थ: वह हाथी का सिर बालक के धड़ पर रखा गया। भगवान शंकर ने प्राण-मंत्र पढ़कर उसमें प्राण संचार किया।

नाम ‘गणेश’ शम्भु तब कीन्हें। प्रथम पूज्य बुद्धि निधि वर दीन्हें॥

अर्थ: तब शंभु (शिव) ने उनका नाम ‘गणेश’ रखा और उन्हें वरदान दिया – सभी देवताओं में प्रथम पूज्य रहेंगे और बुद्धि के निधान होंगे।

बुद्धि-परीक्षा की चौपाइयाँ

बुद्धि परीक्षा जब शिव कीन्हा। पृथ्वी कर प्रदक्षिणा लीन्हा॥

अर्थ: जब शिव ने बुद्धि की परीक्षा ली और पृथ्वी की परिक्रमा करने को कहा, दोनों पुत्रों में प्रतिस्पर्धा हुई।

चले षडानन, भरमि भुलाई। रचे बैठि तुम बुद्धि उपाई॥

अर्थ: षडानन (कार्तिकेय) पृथ्वी की परिक्रमा करने दौड़ पड़े। आपने बैठकर ही बुद्धि से एक उपाय सोचा।

चरण मातु-पितु के धर लीन्हें। तिनके सात प्रदक्षिण कीन्हें॥

अर्थ: आपने माता-पिता (शिव-पार्वती) के चरण स्पर्श किए और उनकी सात परिक्रमाएँ कीं – क्योंकि माता-पिता ही समस्त विश्व हैं।

धनि गणेश कहि शिव हिये हर्ष्यो। नभ ते सुरन सुमन बहु वर्ष्यो॥

अर्थ: “धन्य हो गणेश!” कहकर शिव का हृदय हर्षित हो उठा। आकाश से देवताओं ने पुष्पों की वर्षा की।

भक्त-निवेदन की चौपाइयाँ

तुम्हरी महिमा बुद्धि बड़ाई। शेष सहसमुख सके न गाई॥

अर्थ: हे गणेश! आपकी महिमा और बुद्धि की बड़ाई सहस्र मुख वाले शेषनाग भी नहीं गा सके। यह वर्णन से परे है।

मैं मतिहीन मलीन दुखारी। करहुँ कौन विधि विनय तुम्हारी॥

अर्थ: मैं तो बुद्धि-रहित, दोषी और दुखी हूँ। किस प्रकार आपसे विनती करूँ, यह भी नहीं जानता।

भजत ‘राम सुन्दर’ प्रभुदासा। जग प्रयाग ककरा दुर्वासा॥

अर्थ: प्रयाग के ककरा-दुर्वासा स्थान में निवास करने वाले ‘राम सुन्दर’ नामक प्रभु के दास आपका भजन करते हैं।

अब प्रभु दया दीना पर कीजै। अपनी शक्ति भक्ति कुछ दीजै॥

अर्थ: हे प्रभु! अब इस दीन भक्त पर दया कीजिए और अपनी शक्ति एवं भक्ति का थोड़ा-सा अंश प्रदान कीजिए।

दोहा (समापन)

श्री गणेश यह चालीसा, पाठ करै धर ध्यान।
नित नव मंगल गृह बसै, लहै जगत सनमान॥

अर्थ: जो भी ध्यान लगाकर श्री गणेश की इस चालीसा का पाठ करेगा, उसके घर में नित नए मंगल होंगे और उसे जगत में सम्मान प्राप्त होगा।

सम्बन्ध अपने सहस्र दश, ऋषि पंचमी दिनेश।
पूरण चालीसा भयो, मंगल मूर्ति गणेश॥

अर्थ: ऋषि पंचमी के शुभ दिन यह चालीसा पूर्ण हुई। हे मंगल-मूर्ति गणेश, आपसे हज़ारों संबंध हैं। चालीसा पूर्ण हुई।

गणेश चालीसा - ganesh chalisa poora path arth sahit

गणेश जी – प्रथम पूज्य क्यों हैं?

हिंदू परंपरा में किसी भी पूजा, यज्ञ, विवाह, यात्रा या नए काम की शुरुआत से पहले सबसे पहले गणेश जी का स्मरण किया जाता है। इसी को “प्रथम पूज्य” कहते हैं। चालीसा में भी स्पष्ट कहा गया है – “पूजित प्रथम रूप भगवाना” और “प्रथम पूज्य बुद्धि निधि वर दीन्हें।” यह वरदान स्वयं शिव जी ने दिया था जब गणेश ने बुद्धि की परीक्षा में माता-पिता की परिक्रमा को ही पृथ्वी-परिक्रमा माना।

गणेश जी “विघ्नहर्ता” हैं – यानी बाधाओं को हरने वाले। इसीलिए किसी भी काम के पहले “श्री गणेशाय नमः” लिखा जाता है। वे बुद्धि, विद्या और समृद्धि के देवता भी हैं। उनका गज-मुख (हाथी का मुख) ज्ञान और स्मृति का प्रतीक है। उनकी छोटी आँखें एकाग्रता की निशानी हैं। बड़े कान सुनने की क्षमता के – यानी शिक्षा ग्रहण करने की शक्ति के प्रतीक हैं।

गणेश जी के दो रूप विशेष महत्त्वपूर्ण हैं – एक जो विघ्न डालते हैं (जो उनकी कृपा से वंचित हैं उनके लिए) और एक जो विघ्न हरते हैं (जो उनकी भक्ति करते हैं उनके लिए)। चालीसा का पाठ उन्हें प्रसन्न करने का सबसे सरल और सुलभ मार्ग माना जाता है।

गणेश चालीसा के प्रमुख लाभ

परंपरागत मान्यताओं के अनुसार गणेश चालीसा का नियमित पाठ निम्नलिखित फल देता है। ये परंपरागत विश्वास हैं, किसी चिकित्सीय दावे के रूप में नहीं।

  • बुद्धि और स्मृति: गणेश जी बुद्धि के देवता हैं। विद्यार्थियों के लिए यह पाठ विशेष रूप से लाभकारी माना जाता है।
  • विघ्न-निवारण: नए काम, व्यवसाय, परीक्षा या यात्रा से पहले चालीसा पढ़ने से बाधाएँ दूर होती हैं – ऐसी परंपरागत मान्यता है।
  • मन की शांति: भक्ति-भाव से किया गया पाठ मन को एकाग्र और शांत करता है।
  • पारिवारिक सुख: समापन दोहे में कहा गया है – “नित नव मंगल गृह बसै” – यानी घर में निरंतर मंगल रहता है।
  • जगत-सम्मान: “लहै जगत सनमान” – समाज में सम्मान प्राप्त होता है।

गणेश चालीसा का पाठ कैसे करें?

पाठ की विधि

  • समय: प्रातःकाल स्नान के बाद पाठ सर्वोत्तम है। बुधवार (गणेश जी का विशेष दिन) को पाठ का विशेष महत्त्व है।
  • स्थान: घर के पूजा-स्थल पर या किसी स्वच्छ, शांत स्थान पर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें।
  • भोग: परंपरागत रूप से मोदक, दूर्वा (घास), लाल फूल और सिंदूर गणेश जी को अर्पित किए जाते हैं।
  • संख्या: एक बार का नित्य पाठ पर्याप्त है। विशेष कामना या संकल्प के लिए 11 या 21 बार पाठ करने की परंपरा है।
  • गणेश चतुर्थी: गणेश चतुर्थी (भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी) पर और हर माह की संकष्टी चतुर्थी पर पाठ का विशेष महत्त्व है।

गिनती रखें – जप काउंटर से

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गणेश चालीसा कब पढ़नी चाहिए?

गणेश चालीसा प्रतिदिन सुबह स्नान के बाद पढ़ना शुभ है। बुधवार को और गणेश चतुर्थी पर पाठ विशेष फलदायी माना जाता है। किसी भी नए काम, यात्रा या परीक्षा से पहले भी पाठ करना शुभ माना जाता है।

गणेश चालीसा के पाठ से क्या होता है?

परंपरा के अनुसार गणेश चालीसा का नियमित पाठ बुद्धि बढ़ाता है, विघ्न दूर होते हैं और कार्य सिद्धि होती है। चालीसा में स्वयं कहा गया है – नित नव मंगल गृह बसै, लहै जगत सनमान।

गणेश चालीसा किसने लिखी?

गणेश चालीसा एक पारंपरिक भक्ति रचना है। कुछ पाठों में ‘राम सुन्दर’ नामक भक्त कवि का नाम मिलता है जो प्रयाग के ककरा-दुर्वासा स्थान से थे। यह सदियों से भक्तों में प्रचलित है और पूर्णतः लोक-परंपरा की रचना है।

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