रुद्राक्ष की माला से ॐ नमः शिवाय का जप करते शिवभक्त

ॐ नमः शिवाय जप: रुद्राक्ष क्यों, तुलसी क्यों नहीं?

नाम जप शुरू करने वाले ज़्यादातर लोग एक ही गलती करते हैं: शिव जप के लिए तुलसी माला उठा लेते हैं। आखिर तुलसी तो पवित्र है – तो क्या गलत? गलत यह है कि तुलसी विष्णु और उनके परिवार की है: कृष्ण, राम, हनुमान। शिव का मन दूसरी माला में बसता है।

अगर आप ॐ नमः शिवाय का जप तुलसी माला से करते हैं, तो जप व्यर्थ नहीं होता – भगवान भाव देखते हैं। लेकिन शास्त्रोक्त विधि के अनुसार शिव जप के लिए रुद्राक्ष माला सर्वश्रेष्ठ है। इस लेख में हम देखेंगे कि पंचाक्षर मंत्र में क्या शक्ति है, रुद्राक्ष का शिव से क्या गहरा संबंध है, और 108 से 1008 बार तक जपने का सही नियम क्या है।

पंचाक्षर मंत्र – पाँच अक्षर, पंचभूत का सार

“नमः शिवाय” – ये पाँच अक्षर हैं: न, मः, शि, वा, य। इन्हें पंचाक्षर कहते हैं। इन पाँचों का सीधा संबंध पंचभूत से है – पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश।

  • न = पृथ्वी तत्व: नमः शिवाय का पहला अक्षर धरती से जुड़ा है – वह आधार जिस पर सब कुछ टिका है।
  • मः = जल तत्व: प्रवाह, शीतलता, और जीवन की धारा।
  • शि = अग्नि तत्व: शिव को महादेव कहते हैं – वह परम ऊर्जा जो सृष्टि और प्रलय दोनों हैं।
  • वा = वायु तत्व: प्राण, श्वास, और चेतना की गति।
  • य = आकाश तत्व: वह अनंत विस्तार जिसमें सब समाहित है।

यानी जब आप “नमः शिवाय” जपते हैं, तो आप पाँचों तत्वों के स्रोत को पुकारते हैं। शिव पंचभूतेश्वर हैं – पाँचों तत्वों के ईश्वर। ॐ के साथ “ॐ नमः शिवाय” षडाक्षर मंत्र बनता है जो आज सबसे प्रचलित रूप है। शुद्ध पंचाक्षर “नमः शिवाय” कई शैव आगम ग्रंथों में मूल मंत्र के रूप में वर्णित है। दोनों मान्य हैं – जो आपको स्वाभाविक लगे, वही करें।

रुद्राक्ष – शिव का अश्रु, शिव की माला

“रुद्राक्ष” शब्द दो भागों से बना है: रुद्र और अक्ष। रुद्र शिव का एक नाम है; अक्ष का अर्थ है आँख। शिव पुराण में कथा है कि एक बार शिव ने त्रिपुरासुर के संहार के लिए हजारों वर्षों तक ध्यान किया। जब उन्होंने नेत्र खोले, तो अश्रु की कुछ बूंदें पृथ्वी पर गिरीं – और उन्हीं बूंदों से रुद्राक्ष वृक्ष उगे।

यही कारण है कि रुद्राक्ष माला शैव साधना में सर्वोपरि मानी जाती है। स्वामी शिवानंद (Divine Life Society) ने अपने ग्रंथों में स्पष्ट कहा है कि रुद्राक्ष शिव जप के लिए अनुशंसित है – यह केवल परंपरा नहीं, यह शिव को समर्पण का प्रतीक है। रुद्राक्ष पहनने और जप में प्रयोग करने की परंपरा हजारों वर्षों से चली आ रही है।

तुलसी की बात करें तो: तुलसी विष्णु कुल की देवी हैं। कृष्ण, राम, हनुमान, विष्णु – इन सबके जप के लिए तुलसी माला अत्यंत उचित और पवित्र मानी जाती है। लेकिन परंपरागत शास्त्रोक्त मत के अनुसार तुलसी शिव जप में उचित नहीं मानी जाती। यह दोनों देवों का अपना-अपना दायरा है। अगर अभी केवल तुलसी माला है तो जप जारी रखें – भाव प्रमुख है। लेकिन जब नई माला लें तो रुद्राक्ष को प्राथमिकता दें।

कब और कितनी बार जपें – शिव जप के विशेष समय

स्वामी शिवानंद के अनुसार जप का सर्वश्रेष्ठ समय ब्रह्ममुहूर्त है – सूर्योदय से लगभग डेढ़ घंटे पहले, जो प्रायः सुबह चार से छह बजे के बीच होता है। इस समय वातावरण में सत्व गुण की प्रधानता होती है और मन की एकाग्रता सबसे अधिक होती है।

शिव जप के लिए कुछ विशेष समय और संख्या:

  • सोमवार (शिव का प्रिय दिन): 108 से 1008 जप। सोमवार व्रत के साथ जप करने की पुरानी परंपरा है।
  • प्रदोष काल (त्रयोदशी तिथि की संध्या): महीने में दो बार आता है – यह शिव जप के लिए अत्यंत शुभ समय है।
  • महाशिवरात्रि: चार प्रहर में जप – रात्रि जागरण की परंपरा जिसमें हर प्रहर अलग नाम जपने का नियम है।
  • प्रतिदिन: न्यूनतम 108 बार (एक माला)। उन्नत साधक 1080 (दस माला) तक करते हैं।

अगर माला साथ न हो तो Devta App का जप काउंटर 108 की गिनती पर संकेत देता है – ताकि ध्यान गिनती में नहीं, मंत्र में लगा रहे। काम पर जाते समय, बस में, या रात सोने से पहले – यह छोटी आदत रोज़ के जप को बनाए रखती है।

शिव जप की तीन आम गलतियाँ

ये गलतियाँ अक्सर बिना जाने होती हैं – लेकिन इन्हें एक बार समझ लें तो जप कहीं अधिक गहरा और विधिसम्मत हो जाता है।

  • गलती 1 – तुलसी माला का प्रयोग: जैसा ऊपर बताया – रुद्राक्ष को प्राथमिकता दें। यह विधि का सम्मान है।
  • गलती 2 – सुमेरु मनके को लांघना: माला में 108 मनकों के बाद एक बड़ा मनका होता है – सुमेरु। परंपरा है कि जप करते समय सुमेरु को लांघें नहीं। जब सुमेरु तक पहुँचें, माला पलटें और वापस उसी दिशा में जाएं।
  • गलती 3 – यांत्रिक जप, बिना ध्यान के: जप का अर्थ केवल संख्या पूरी करना नहीं। हर “शिवाय” में उस पंचभूतेश्वर का बोध रखें जिसे आप पुकार रहे हैं। अगर मन भटके तो फिर ध्यान लाएं – संतों ने कहा है कि बार-बार वापस लाना ही साधना है।

ठोस विधि – आज से ऐसे शुरू करें

शुरुआत के लिए यह सरल रूपरेखा काफी है:

  • स्थान और आसन: शांत स्थान में सीधे बैठें। जमीन पर आसन हो तो उत्तम; कुर्सी पर भी ठीक है। उत्तर या पूर्व दिशा की ओर मुँह करें।
  • माला: 108 मनके की रुद्राक्ष माला, दाहिने हाथ में, मध्यमा अंगुली पर रखें। अंगूठे से मनके आगे बढ़ाएं। तर्जनी का स्पर्श न करें।
  • जप: मन में या धीमी आवाज़ में “ॐ नमः शिवाय” उच्चारें। हर अक्षर स्पष्ट हो।
  • पहले सप्ताह: 108 बार (एक माला)। जब नियमित हो जाए तो धीरे-धीरे बढ़ाएं।
  • अंत में: एक मिनट मौन रहें। उस शांति को भीतर उतरने दें।

अगर सुबह समय न हो तो प्रदोष समय – संध्या के बाद – में करें। शिव को संध्या भी उतनी ही प्रिय है जितनी ब्रह्ममुहूर्त। कुछ सप्ताह के नियमित जप के बाद आप पाएंगे कि “नमः शिवाय” मन में अपने-आप चलने लगता है – काम पर, रास्ते में, सोने से पहले। उसी को अजपा-जप कहते हैं। और वही शिव जप की असली सिद्धि है।

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ॐ नमः शिवाय जप के लिए कौन सी माला सही है?

रुद्राक्ष माला सर्वश्रेष्ठ है – रुद्राक्ष शिव का प्रिय फल माना जाता है और शैव परंपरा में सर्वोपरि है। तुलसी माला शिव जप के लिए परंपरागत रूप से उचित नहीं मानी जाती क्योंकि तुलसी विष्णु कुल की है।

ॐ नमः शिवाय कितनी बार जपें?

108 बार (एक माला) प्रतिदिन शुभ है। सोमवार को 1008 जप का विशेष महत्व है। महाशिवरात्रि पर चार प्रहर में जप करने की परंपरा है।

पंचाक्षर मंत्र में ॐ जोड़ें या नहीं?

शुद्ध पंचाक्षर है ‘नमः शिवाय’ (5 अक्षर)। ॐ जोड़ने पर षडाक्षर मंत्र ‘ॐ नमः शिवाय’ बनता है। दोनों मान्य हैं – ॐ के साथ वाला अधिक प्रचलित है।

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