साईं बाबा की आरती अर्थ सहित – सम्पूर्ण पाठ (धूप आरती)
यह पृष्ठ साईं बाबा की सबसे पवित्र और सर्वाधिक गाई जाने वाली आरती – “आरती साईं बाबा सौख्यदातार जीवा” – का सम्पूर्ण पाठ हिंदी अर्थ सहित प्रस्तुत करता है। यह आरती शिरडी (महाराष्ट्र) के साईं बाबा समाधि मंदिर में प्रतिदिन धूप आरती के समय गाई जाती है और शिरडी सच्चरित्र परंपरा (Shri Sai Satcharita) की नींव है। नीचे सातों छंद क्रमशः उनके हिंदी अर्थ सहित दिए गए हैं।
आरती साईं बाबा – सम्पूर्ण पाठ अर्थ सहित
यह आरती मूलतः मराठी भाषा में रचित है और देवनागरी लिपि में लिखी जाती है। शिरडी सच्चरित्र परंपरा पर आधारित यह सार्वजनिक रूप से उपलब्ध पारंपरिक भक्ति रचना है जिसे भक्त 100 से अधिक वर्षों से अनवरत गाते आ रहे हैं। देवनागरी लिपि समान होने के कारण हिंदी भाषी भक्त भी इसे सरलता से पढ़ और गा सकते हैं। अर्थ नीचे सरल हिंदी में दिए गए हैं।
ध्रुपद (टेक)
आरती साईबाबा।
सौख्यदातार जीवा।
चरणरजातली।
द्यावा दासां विसावा, भक्तां विसावा॥
अर्थ: हे साईं बाबा, समस्त जीवों को सुख प्रदान करने वाले! आपकी आरती है। कृपया अपने पवित्र चरणों की धूल में अपने दासों और भक्तों को विश्राम और शरण दीजिए।
स्तुति १
जाळूनियां अनंग। स्वस्वरूपी राहे दंग।
मुमुक्षुजनां दावी। निज डोळां श्रीरंग।
डोळां श्रीरंग॥
अर्थ: आप काम-वासना (अनंग – कामदेव) को जला कर अपने ईश्वरीय स्वरूप में लीन और मस्त रहते हैं। मोक्ष के इच्छुक (मुमुक्षु) भक्तों को आप अपनी आँखों के माध्यम से साक्षात श्रीरंग – भगवान के दर्शन कराते हैं। साईं बाबा स्वयं ब्रह्मचर्य और वैराग्य के जीवित उदाहरण थे।
स्तुति २
जया मनी जैसा भाव। तया तैसा अनुभव।
दाविसी दयाघना। ऐसी तुझी ही माव॥
अर्थ: जिसके मन में जैसी श्रद्धा और भाव होते हैं, उसे साईं बाबा वैसा ही अनुभव देते हैं। हे दयासागर, यही आपकी अद्भुत माया और शक्ति है। यह साईं बाबा की सबसे प्रसिद्ध शिक्षा है – हिंदू हो, मुस्लिम हो, या किसी भी पंथ का हो, जो जैसे भाव से आए, वैसी ही कृपा पाए। भाव ही भक्ति है।
स्तुति ३
तुमचे नाम ध्याता। हरे संसृती व्यथा।
अगाध तव करणी। मार्ग दाविसी अनाथा॥
अर्थ: आपका नाम ध्यान में लेने मात्र से संसार की समस्त पीड़ाएं और कष्ट दूर हो जाते हैं। आपकी करनी (कृपा और लीला) अगाध – अथाह – है। आप अनाथ और बेसहारा लोगों को जीवन का मार्ग दिखाते हैं। “ॐ साईं राम” या केवल “साईं” नाम का जप इसी आश्वासन पर टिका है – नाम लो, कष्ट मिटो।
स्तुति ४
कलियुगीं अवतार। सगुणब्रह्म साचार।
अवतीर्ण झालासे। स्वामी दत्त दिगंबर॥
अर्थ: कलियुग में साक्षात सगुण ब्रह्म – ईश्वर का गुणों से परिपूर्ण साकार रूप – अवतरित हुए हैं, स्वामी दत्त दिगंबर के रूप में। यह छंद साईं बाबा को दत्तात्रेय (ब्रह्मा, विष्णु और महेश का सम्मिलित अवतार) का साक्षात प्रकटन मानता है। दत्तात्रेय का दर्शन किसी एक धर्म में नहीं बँधता – यही साईं भक्ति का मर्म है।
स्तुति ५
आठां दिवसां गुरूवारीं। भक्त करिती वारी।
प्रभुपद पहावया। भवभय निवारी॥
अर्थ: सातों दिन – और विशेष रूप से गुरुवार को – भक्त तीर्थयात्रा (वारी) करते हैं। वे उन प्रभु के चरणों के दर्शन के लिए आते हैं जो जन्म-मृत्यु के भव-भय को दूर करते हैं। यह छंद गुरुवार की शिरडी वारी की परंपरा का उल्लेख करता है – आज भी गुरुवार को शिरडी में लाखों भक्त आते हैं।
स्तुति ६
माझा निजद्रव्यठेवा। तव चरणरजसेवा।
मागणें हेंचि आतां। तुम्हां देवाधिदेवा॥
अर्थ: हे देवाधिदेव (देवों के देव), आपके चरणों की धूल की सेवा ही मेरी सबसे बड़ी संपत्ति और थाती है। अब बस यही एक माँग है मुझे – कोई भौतिक वस्तु नहीं, केवल आपके श्री चरणों की निरंतर सेवा। यह वैराग्य का उच्चतम भाव है – माँगना छोड़ कर सेवा माँगना।
स्तुति ७
इच्छित दीन चातक। निर्मल तोय निजसुख।
पाजावें माधवा या। सांभाळ आपुली भाक॥
अर्थ: जैसे दीन चातक पक्षी केवल स्वाति नक्षत्र की शुद्ध वर्षा-बूंदें ही पीना चाहता है और किसी अन्य जल से तृप्त नहीं होता – वैसे ही यह दीन भक्त आत्मिक सुख (निर्मल जल) की एकमात्र प्यास लेकर आपके द्वार पर खड़ा है। हे माधव, अपना वचन निभाइए और इसे तृप्त कीजिए।
पाठ के पश्चात ध्रुपद को पुनः गाएं: “आरती साईबाबा। सौख्यदातार जीवा…” – इस प्रकार सात छंदों की यह आरती पूर्ण होती है।
शिरडी की पाँच आरतियाँ – समय और महत्व
शिरडी साईं बाबा समाधि मंदिर में प्रतिदिन पाँच आरतियाँ होती हैं। शिरडी सच्चरित्र की परंपरा में इन आरतियों को उसी प्रकार किया जाता है जैसे किसी जीवित सद्गुरु की दिनचर्या हो – भोर में जगाना, दोपहर को भोग, सायं को मुख्य आरती, और रात को शयन। यह परंपरा साईं बाबा के जीवनकाल से ही चली आ रही है।
| आरती | अनुमानित समय | महत्व |
|---|---|---|
| काकड़ आरती | प्रातः ~5:15 बजे | बाबा को शयन से जगाना – पहला दर्शन (भूपाली राग में भजन) |
| शिरडी माझे पंढरपूर आरती | प्रातः ~6:20 बजे | प्रभातकालीन मंगल स्तुति |
| मध्याह्न आरती | दोपहर ~12:00 बजे | भोग अर्पण – दोपहर की पूजा |
| धूप आरती | सूर्यास्त (~शाम 6-7 बजे) | मुख्य और सबसे भव्य आरती – यहीं “आरती साईं बाबा सौख्यदातार जीवा” गाई जाती है |
| शेज आरती | रात्रि ~10:00 बजे | बाबा को शयन कराना – अंतिम आरती |
इनमें धूप आरती सबसे विस्तृत और भव्य होती है। इसी में “आरती साईं बाबा सौख्यदातार जीवा” के साथ नामस्मरण, नमस्कराष्टक और प्रार्थना भी होती है। काकड़ आरती भोर की पहली आरती है – उस समय मंदिर की घंटियाँ बजती हैं, भूपाली राग में भजन गाए जाते हैं और पूरे शिरडी में एक अलग ही भाव जागता है। शेज आरती बाबा को रात्रि विश्राम कराने की आरती है – इसके बाद मंदिर बंद हो जाता है।

इस आरती का महत्व और पृष्ठभूमि
“आरती साईं बाबा सौख्यदातार जीवा” एक सौ से अधिक वर्षों की जीवित परंपरा है। साईं बाबा ने 1918 में अपनी देह छोड़ी और तब से यह आरती शिरडी में अनवरत गाई जा रही है। यह आरती श्री साईं सच्चरित्र की परंपरा का अंग है जिसे हेमाडपंत (गोविंद रघुनाथ दाभोलकर) ने साईं बाबा के जीवनकाल में ही लिखना शुरू किया था। पूरी आरती पारंपरिक और सार्वजनिक है – इस पर किसी का कॉपीराइट नहीं है।
इस आरती की सबसे गहरी बात दूसरे छंद में है – “जया मनी जैसा भाव, तया तैसा अनुभव”। यह साईं बाबा की केंद्रीय शिक्षा है। शिरडी की मस्जिद में रहते हुए बाबा “अल्लाह मालिक” कहते थे, हिंदू त्योहार मनाते थे, मुस्लिम और हिंदू दोनों को समान दृष्टि से आशीर्वाद देते थे। उनके दरबार में जाति, पंथ, और धर्म का भेद कभी नहीं रहा – यही कारण है कि आज भी करोड़ों लोग उन्हें अपना सद्गुरु मानते हैं।
चौथे छंद में “स्वामी दत्त दिगंबर” का उल्लेख है – यानी साईं बाबा को दत्तात्रेय भगवान का अवतार माना गया है। दत्तात्रेय ब्रह्मा, विष्णु और महेश के सम्मिलित रूप हैं – निर्गुण और सगुण का मिलन बिंदु। यही वजह है कि साईं भक्ति में “ॐ साईं राम” का जप भी उतना ही प्रभावशाली माना जाता है जितना किसी अन्य देवी-देवता का नाम।
गुरुवार का विशेष महत्व – साईं का दिन
पाँचवाँ छंद विशेष रूप से “आठां दिवसां गुरूवारीं” कहता है – यानी गुरुवार का स्थान विशेष है। गुरुवार (बृहस्पतिवार) को “साईं का दिन” कहते हैं क्योंकि गुरु-तत्व का संबंध गुरुवार से है और साईं बाबा सर्वोच्च सद्गुरु हैं। शिरडी में गुरुवार को भक्तों की सबसे बड़ी भीड़ होती है – लाखों श्रद्धालु वारी करते हैं।
घर पर गुरुवार को साईं आरती का विशेष फल माना जाता है। परंपरा है कि गुरुवार को पीले वस्त्र पहनें, साईं बाबा की फोटो या मूर्ति के सामने दीप जलाएं, उदी (विभूति) और पीले फूल (गेंदा) अर्पित करें और यह आरती गाएं। उदी साईं बाबा का विशेष प्रसाद है – बाबा ने स्वयं धुनी (पवित्र अग्नि) की राख भक्तों को दी थी। शिरडी से मँगाई उदी सर्वोत्तम मानी जाती है।
साईं आरती घर पर कैसे करें – सरल विधि
शिरडी न जा पाएं तो भी घर पर ही साईं बाबा की उपस्थिति का अनुभव किया जा सकता है। बाबा ने खुद कहा था – “जो मुझे याद करता है, मैं उसके पास पहुँच जाता हूँ।” नीचे घर पर आरती की सरल विधि है।
- शुद्धि और स्नान: आरती से पहले स्नान करें या कम से कम हाथ-पैर धोएं। साईं बाबा ने कभी पवित्रता के कठोर नियम नहीं बताए – भाव ही सबसे बड़ी शुद्धि है।
- दीप प्रज्वलन: साईं बाबा की फोटो या मूर्ति के सामने शुद्ध घी या तेल का दीपक जलाएं। कपूर की आरती भी उत्तम है।
- पुष्प और भोग: पीले फूल (गेंदा), तुलसी, या जो भी उपलब्ध हो अर्पित करें। मिठाई, फल, या साधारण रोटी भी भोग के रूप में रख सकते हैं।
- आरती पाठ: थाल हाथ में लेकर ऊपर दी गई आरती – “आरती साईं बाबा सौख्यदातार जीवा” – गाएं या पढ़ें। मन में भाव और श्रद्धा रखें।
- नाम जप: आरती के बाद “ॐ साईं राम” या केवल “साईं” नाम का कम से कम 108 बार जप करें। माला की गिनती में ध्यान बँट जाए तो Devta App का जप काउंटर काम आता है – गिनती ऐप पर होती रहती है, ध्यान बाबा के नाम पर बना रहता है।
- उदी प्रसाद: यदि उदी उपलब्ध हो तो माथे पर लगाएं और थोड़ा जल के साथ लें।
- प्रार्थना: अंत में मन की बात कहें – जैसे किसी पुराने मित्र से बात करते हों। साईं बाबा औपचारिकता नहीं, भाव देखते हैं।
रोज़ की आरती और जप में निरंतरता सबसे बड़ी साधना है। सात दिन करें तो आदत बनती है, सात हफ्ते करें तो श्रद्धा गहरी होती है। अगर रोज़ाना बाबा के दर्शन का संकल्प लेना हो तो Devta App में साईं बाबा की Daily Darshan की सुविधा है – हर दिन देखें, गिनती रखें, और भक्ति की निरंतर धारा बनाए रखें।

साईं बाबा का एक ही संदेश था – “श्रद्धा और सबुरी।” श्रद्धा रखो और धैर्य रखो। इस आरती का हर छंद इसी सत्य की याद दिलाता है। जो भाव से गाए, वह जरूर पाए।
साईं बाबा की मुख्य आरती कौन सी है?
‘आरती साईं बाबा सौख्यदातार जीवा’ साईं बाबा की सबसे प्रसिद्ध और मुख्य आरती है। यह शिरडी साईं बाबा समाधि मंदिर में प्रतिदिन धूप आरती (सायंकाल) के समय गाई जाती है और शिरडी सच्चरित्र परंपरा का अभिन्न हिस्सा है।
साईं बाबा की आरती किस दिन करनी चाहिए?
साईं बाबा की आरती प्रतिदिन की जा सकती है, लेकिन गुरुवार (बृहस्पतिवार) का विशेष महत्व है। साईं बाबा को गुरुस्वरूप माना जाता है इसलिए गुरुवार को उनका दिन कहते हैं। शिरडी में गुरुवार को भक्तों की सबसे बड़ी भीड़ होती है।
साईं बाबा की आरती मराठी में क्यों है?
‘आरती साईं बाबा सौख्यदातार जीवा’ मूलतः मराठी भाषा में रचित है क्योंकि शिरडी महाराष्ट्र में है और साईं बाबा ने अपना अधिकांश जीवन वहीं बिताया। यह आरती देवनागरी लिपि में लिखी जाती है जो हिंदी की लिपि भी है, इसलिए हिंदी भाषी भक्त भी इसे सरलता से पढ़ और गा सकते हैं।