गणेश आरती ganesh aarti sukhkarta dukhharta arth sahit

सुखकर्ता दुखहर्ता: गणेश आरती पूरा पाठ, अर्थ और महत्व

यह पृष्ठ आपको सुखकर्ता दुखहर्ता गणेश आरती का पूरा पाठ देवनागरी में अर्थ सहित देता है – तीनों छंद और टेक, एक भी पंक्ति छोड़े बिना। यह आरती 17वीं सदी के मराठी संत समर्थ रामदास (1608-1681) की रचना है। यह मूलतः मराठी भाषा में है, पर पूरे भारत में हिंदी भक्तों द्वारा समान श्रद्धा से गाई जाती है। नीचे दिया गया पाठ पारंपरिक सार्वजनिक डोमेन स्रोतों पर आधारित है।

सुखकर्ता दुखहर्ता – संपूर्ण गणेश आरती (पाठ और अर्थ)

इस आरती की संरचना तीन छंदों (stanzas) और एक टेक (refrain) से बनी है। टेक तीनों छंदों के बाद दोहराई जाती है। नीचे पहले टेक दी गई है, फिर तीनों छंद क्रम से – हर छंद के बाद टेक अवश्य दोहराएं।

टेक (Refrain) – हर छंद के बाद दोहराएं

जय देव जय देव जय मंगलमूर्ती ।
दर्शनमात्रे मनकामना पुरती ॥

अर्थ: जय हो देव, जय हो देव, जय हो मंगलमूर्ति। आपके दर्शन मात्र से – केवल देखने भर से – मन की सभी कामनाएं पूरी हो जाती हैं।

प्रथम छंद

सुखकर्ता दुखहर्ता वार्ता विघ्नाची ।
नुरवी पुरवी प्रेम कृपा जयाची ।
सर्वांगी सुंदर उटी शेंदुराची ।
कंठी झळके माळ मुक्ताफळांची ॥

अर्थ: आप सुख देने वाले हैं, दुख हरने वाले हैं, विघ्नों (सभी बाधाओं) का नाश करने वाले हैं। जिनकी कृपा से भक्त का प्रेम कभी न घटे बल्कि पूर्ण और संतृप्त हो। आपके सारे अंग सुंदर हैं और सिंदूर का सुगंधित लेप किया हुआ है। कंठ में मोतियों की माला झिलमिलाती है।

जय देव जय देव जय मंगलमूर्ती ।
दर्शनमात्रे मनकामना पुरती ॥

द्वितीय छंद

रत्नखचित फरा तुज गौरीकुमरा ।
चंदनाची उटी कुंकुमकेशरा ।
हिरेजडित मुकुट शोभतो बरा ।
रुणझुणती नूपुरे चरणी घागरिया ॥

अर्थ: हे गौरीकुमार (माता पार्वती के पुत्र), आपके लिए रत्नजड़ित सिंहासन सजाया गया है। चंदन, कुंकुम और केसर का सुगंधित लेप अर्पित किया जाता है। हीरे जड़ित मुकुट आपके मस्तक पर सुंदर शोभता है। और चरणों में घुंघरू व पायल मधुर झनझनाती है।

जय देव जय देव जय मंगलमूर्ती ।
दर्शनमात्रे मनकामना पुरती ॥

तृतीय छंद

लंबोदर पीतांबर फणिवरवंदना ।
सरळ सोंड वक्रतुंड त्रिनयना ।
दास रामाचा वाट पाहे सदना ।
संकटी पावावे निर्वाणी रक्षावे सुरवरवंदना ॥

अर्थ: हे लंबोदर (बड़े उदर वाले), पीले वस्त्र धारण करने वाले, नागराज द्वारा वंदित प्रभु। सीधी सूंड वाले, वक्रतुंड (एक दांत वाले), तीन नेत्रों से सुशोभित। आपका दास रामदास आपके द्वार पर प्रतीक्षा करता है। संकट में आकर मेरी रक्षा करें – और अंतिम क्षण में भी बचाएं – हे देवों के देव, आप देवताओं द्वारा भी वंदित हैं।

जय देव जय देव जय मंगलमूर्ती ।
दर्शनमात्रे मनकामना पुरती ॥

प्रमुख मराठी-संस्कृत शब्दों का हिंदी अर्थ

यह आरती मूलतः मराठी में है, इसलिए कुछ शब्द हिंदी भक्तों को अपरिचित लग सकते हैं। नीचे उनके सरल अर्थ दिए गए हैं ताकि पाठ मन से किया जा सके, केवल रटा न जाए:

  • सुखकर्ता: सुख देने वाले
  • दुखहर्ता: दुख हरने वाले
  • विघ्नाची वार्ता नुरवी: विघ्नों (बाधाओं) का नामोनिशान मिटाने वाले
  • पुरवी: पूर्ण करने वाले
  • उटी शेंदुराची: सिंदूर का लेप
  • मुक्ताफळांची माळ: मोतियों की माला
  • मंगलमूर्ती: शुभ और मंगलकारी स्वरूप वाले – गणेशजी का सुप्रसिद्ध नाम
  • दर्शनमात्रे: दर्शन मात्र से, केवल देखने से
  • फरा: सिंहासन, आसन
  • गौरीकुमर: गौरी (माता पार्वती) के पुत्र
  • कुंकुमकेशरा: कुंकुम और केसर
  • नूपुरे / घागरिया: घुंघरू, पायल
  • लंबोदर: लंबे (बड़े) उदर वाले
  • पीतांबर: पीले वस्त्र धारण करने वाले
  • फणिवरवंदना: नागराज (शेषनाग) द्वारा वंदित
  • सरळ सोंड: सीधी सूंड
  • वक्रतुंड: एक टूटे दांत वाले – वक्र = टेढ़ा, तुंड = दांत/सूंड
  • त्रिनयना: तीन नेत्रों वाले
  • दास रामाचा: राम का दास – समर्थ रामदास (रचनाकार स्वयं)
  • वाट पाहे सदना: द्वार (घर) पर प्रतीक्षा करता है
  • संकटी पावावे: संकट में पधारें, रक्षा करें
  • निर्वाणी रक्षावे: अंतिम समय (मृत्यु के क्षण) में रक्षा करें
  • सुरवरवंदना: देवताओं (सुर) के श्रेष्ठ (वर) द्वारा वंदित
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रचनाकार: संत समर्थ रामदास और इस आरती का इतिहास

सुखकर्ता दुखहर्ता की रचना संत समर्थ रामदास (1608-1681) ने की थी। वे महाराष्ट्र के महान संत, कवि और समाज-सुधारक थे – और छत्रपति शिवाजी महाराज के आध्यात्मिक मार्गदर्शक। उन्होंने मराठी में सैकड़ों अभंग, स्तोत्र और आरतियां लिखीं। यह गणेश आरती उनकी सबसे प्रसिद्ध रचनाओं में से एक है।

इस आरती की मूल भाषा मराठी है, इसीलिए इसमें “माळ”, “फरा”, “नूपुरे”, “दास रामाचा वाट पाहे सदना” जैसी पंक्तियां आती हैं। तीसरे छंद में रामदासजी ने स्वयं लिखा – “दास रामाचा वाट पाहे सदना” – अर्थात “राम का दास (मैं, रामदास) आपके घर के द्वार पर प्रतीक्षा करता हूं।” यह एक संत की भावपूर्ण विनम्रता का प्रमाण है – इतने बड़े संत और फिर भी द्वार पर खड़े होकर प्रतीक्षा।

संगीत की दृष्टि से यह आरती राग जोगिया (Jogia) में निबद्ध है – एक भोर का राग जो भक्ति और विनम्र समर्पण की भावना जगाता है। आज यह आरती महाराष्ट्र के हर घर और मंदिर में, और पूरे भारत में, गणेशजी की सबसे पहचानी पहचान बन चुकी है।

यह आरती कब और किस अवसर पर गाएं?

सुखकर्ता दुखहर्ता केवल गणेश चतुर्थी की आरती नहीं है – यह प्रतिदिन की आरती है। इसे गाने के प्रमुख अवसर:

  • प्रतिदिन सुबह-शाम: घर में गणेशजी की मूर्ति या चित्र के सामने पूजा के अंत में यह आरती करें। नियमित पाठ से जीवन में विघ्नों का नाश और मंगल की स्थापना होती है।
  • बुधवार (विनायक वार): बुधवार गणेशजी का दिन माना जाता है। इस दिन विशेष रूप से यह आरती गाने का महत्व है – व्रत हो या न हो।
  • गणेश चतुर्थी और गणेशोत्सव: भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी से शुरू होने वाले दस दिनों में यह आरती दिन में कई बार – कभी-कभी पचास से सौ भक्त मिलकर – गाते हैं। महाराष्ट्र में इसे गाए बिना गणेशोत्सव की कल्पना ही नहीं की जाती।
  • शुभ अवसरों पर: विवाह, गृहप्रवेश, नया व्यापार शुरू करना, परीक्षा से पहले – किसी भी मंगलकार्य की शुरुआत गणेश पूजा और इस आरती से करना सर्वोत्तम माना जाता है। “आदि पूज्य” होने के कारण गणेशजी की आरती सबसे पहले होती है।
  • संकट और कठिन समय में: तीसरा छंद सीधे प्रार्थना करता है – “संकटी पावावे निर्वाणी रक्षावे।” कठिन समय में इस आरती को श्रद्धापूर्वक गाना भक्त को आंतरिक बल और शांति देता है।

गणेश आरती विधि – कैसे करें?

आरती की विधि सरल है और घर पर बिना किसी पंडित के भी की जा सकती है। गणेशजी की मूर्ति या चित्र के सामने एक साफ आसन पर बैठें। थाली में दीपक, अगरबत्ती और ताजे फूल रखें।

दीपक जलाकर थाली को दोनों हाथों से पकड़ें और गोलाकार तरीके से आरती करें – पहले तीन बार नीचे से ऊपर, फिर सात बार घड़ी की दिशा में। साथ ही मन में या मुंह से “जय देव जय देव जय मंगलमूर्ती” का उच्चारण करते जाएं। पूरी आरती के दौरान मन को गणेशजी के स्वरूप पर एकाग्र रखें।

आरती के बाद गणेशजी को दूर्वा (दूब घास के तीन-पांच तिनके) और मोदक का भोग अर्पित करें – ये उनकी विशेष प्रिय वस्तुएं हैं। अंत में प्रसाद वितरित करें और तीन बार “गणपति बाप्पा मोरया” का उद्घोष करें।

एक व्यावहारिक सुझाव: अगर आप रोज़ाना गणेशजी की पूजा के साथ जप भी करना चाहते हैं – जैसे “ॐ गं गणपतये नमः” या “ॐ गणेशाय नमः” – तो माला रखने और गिनती करने की उलझन अक्सर ध्यान भटकाती है। Devta App में एक सरल जप काउंटर है जो गिनती खुद रखता है, और Daily Darshan में हर दिन गणेशजी के दर्शन भी होते हैं – ताकि मन पूजा में लगा रहे और गिनती की चिंता न रहे।

इस आरती को प्रतिदिन गाना एक आदत है जो धीरे-धीरे जीवन को संवारती है। समर्थ रामदास ने यह आरती संकट-नाशक के रूप में लिखी थी – और आज 400 साल बाद भी लाखों भक्त इसे उतनी ही श्रद्धा से गाते हैं। यही इसकी शक्ति है।

ऑडियो / PDF: इस आरती का शुद्ध उच्चारण सहित ऑडियो संस्करण और प्रिंट करने योग्य PDF जल्द उपलब्ध होगा – इस पृष्ठ को बुकमार्क करें।

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सुखकर्ता दुखहर्ता गणेश आरती किसने लिखी?

यह आरती 17वीं सदी के मराठी संत समर्थ रामदास (1608-1681) ने लिखी। यह मूलतः मराठी भाषा में है और तीन छंद तथा एक टेक (refrain) से मिलकर बनी है। तीसरे छंद में स्वयं रचनाकार ने ‘दास रामाचा’ लिखकर अपनी पहचान दी है।

गणेश आरती किस अवसर पर गाई जाती है?

यह आरती प्रतिदिन सुबह-शाम गणेश पूजा में, बुधवार के व्रत में, विवाह-गृहप्रवेश जैसे शुभ अवसरों पर, और विशेष रूप से गणेश चतुर्थी के दस दिवसीय गणेशोत्सव में गाई जाती है।

‘दर्शनमात्रे मनकामना पुरती’ का क्या अर्थ है?

टेक की इस पंक्ति का अर्थ है – गणेशजी के दर्शन मात्र से (केवल देखने भर से) मन की सभी कामनाएं पूरी हो जाती हैं। यह पंक्ति गणेशजी की असीम करुणा और भक्त-वत्सलता को व्यक्त करती है।

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