श्री कृष्ण चालीसा: संपूर्ण पाठ अर्थ सहित
श्री कृष्ण चालीसा एक दोहा, 40 चौपाई और एक समापन दोहा में रचित पारंपरिक भक्ति रचना है, जो भगवान श्री कृष्ण के बाल रूप, लीलाओं और भक्तवत्सल स्वभाव का वर्णन करती है। नीचे संपूर्ण पाठ हर चौपाई के सरल हिंदी अर्थ के साथ दिया गया है, ताकि आप जो पढ़ें उसे समझ भी सकें।
यह चालीसा हनुमान चालीसा की तरह ही सुंदरदास द्वारा रचित मानी जाती है और सदियों से भक्तों के बीच मौखिक व लिखित परंपरा में प्रचलित है, इसलिए यह सार्वजनिक भक्ति साहित्य का हिस्सा है। नीचे दिया गया पाठ व्यापक रूप से प्रचलित संस्करण पर आधारित है।
कृष्ण चालीसा दोहा
बंशी शोभित कर मधुर, नील जलद तन श्याम।
अरुण अधर जनु बिम्बा फल, पिताम्बर शुभ साज॥
अर्थ: हाथों में सुंदर मधुर बांसुरी शोभा दे रही है, मेघ के समान श्याम वर्ण देह है, होंठ लाल बिम्बा फल जैसे हैं और पीले रंग का शुभ वस्त्र (पीताम्बर) धारण किए हुए हैं – यह श्री कृष्ण के इसी मनमोहक स्वरूप का ध्यान करते हुए चालीसा आरंभ होती है।
संपूर्ण चालीसा अर्थ सहित
1. जय यदुनन्दन जय जगवन्दन। जय वसुदेव देवकी नन्दन॥
2. जय यशुदा सुत नन्द दुलारे। जय प्रभु भक्तन के दृग तारे॥
3. जय नट-नागर नाग नथैया। कृष्ण कन्हैया धेनु चरैया॥
4. पुनि नख पर प्रभु गिरिवर धारो। आओ दीनन कष्ट निवारो॥
अर्थ (1-4): हे यदुवंश के आनंद, संसार के वंदनीय, वसुदेव-देवकी के पुत्र, आपकी जय हो। हे यशोदा के लाडले, नंद के दुलारे, भक्तों की आँखों के तारे, आपकी जय हो। हे नटवर नागर, कालिय नाग को नाथने वाले, गायों को चराने वाले कन्हैया, आपकी जय हो। जिन्होंने अपनी एक उँगली पर गोवर्धन पर्वत उठा लिया, हे प्रभु, अब आप दीनों के कष्ट भी दूर कीजिए।
5. वंशी मधुर अधर धरी तेरी। होवे पूर्ण मनोरथ मेरो॥
6. आओ हरि पुनि माखन चाखो। आज लाज भारत की राखो॥
7. गोल कपोल, चिबुक अरुणारे। मृदु मुस्कान मोहिनी डारे॥
8. रंजित राजिव नयन विशाला। मोर मुकुट वैजयंती माला॥
अर्थ (5-8): आपके होठों पर मधुर बांसुरी सजी है, मेरा मनोरथ भी पूर्ण कीजिए। हे हरि, फिर से आइए और माखन चखिए, आज भारत (भक्त) की लाज रखिए। आपके गोल कपोल और लालिमा लिए ठुड्डी पर कोमल मुस्कान मन मोह लेती है। आपके सुंदर बड़े कमल-नयन शोभित हैं, सिर पर मोर मुकुट और गले में वैजयंती माला है।
9. कुण्डल श्रवण पीतपट आछे। कटि किंकणी काछन काछे॥
10. नील जलज सुन्दर तनु सोहे। छवि लखि, सुर नर मुनिमन मोहे॥
11. मस्तक तिलक, अलक घुंघराले। आओ कृष्ण बाँसुरी वाले॥
12. करि पय पान, पुतनहि तारयो। अका बका कागासुर मारयो॥
अर्थ (9-12): कानों में कुंडल और सुंदर पीले वस्त्र धारण किए हैं, कमर में करधनी बांधे धोती पहनी है। नीले कमल जैसा सुंदर श्याम शरीर सुशोभित है, जिसकी छवि देखकर देवता, मनुष्य और मुनि सभी मोहित हो जाते हैं। माथे पर तिलक और घुंघराले बाल हैं – हे बांसुरी वाले कृष्ण, आइए। पूतना का दूध पीकर भी उसे मुक्ति दी और अघासुर, बकासुर जैसे राक्षसों का वध किया।
13. मधुवन जलत अग्नि जब ज्वाला। भै शीतल, लखितहिं नन्दलाला॥
14. सुरपति जब ब्रज चढ़यो रिसाई। मसूर धार वारि वर्षाई॥
15. लगत-लगत ब्रज चहन बहायो। गोवर्धन नखधारि बचायो॥
16. लखि यसुदा मन भ्रम अधिकाई। मुख महं चौदह भुवन दिखाई॥
अर्थ (13-16): जब मधुवन में भीषण अग्नि की ज्वाला जल रही थी, नंदलाला को देखते ही वह शीतल हो गई। जब देवराज इंद्र क्रोधित होकर ब्रज पर मूसलाधार वर्षा बरसाने लगे, तो ब्रज डूबने ही वाला था कि कृष्ण ने अपनी छोटी उँगली पर गोवर्धन पर्वत धारण कर सबकी रक्षा की। यशोदा माँ को जब भ्रम हुआ तो कृष्ण ने अपने मुख में उन्हें चौदह भुवनों के दर्शन कराए।
17. दुष्ट कंस अति उधम मचायो। कोटि कमल जब फूल मंगायो॥
18. नाथि कालियहिं तब तुम लीन्हें। चरणचिन्ह दै निर्भय किन्हें॥
19. करि गोपिन संग रास विलासा। सबकी पूरण करी अभिलाषा॥
20. केतिक महा असुर संहारयो। कंसहि केस पकड़ि दै मारयो॥
अर्थ (17-20): दुष्ट कंस ने बहुत उपद्रव मचाया, फिर भी कृष्ण ने उसकी हर चुनौती पार की। विषैले कालिय नाग को नाथकर उसके फन पर चरणचिह्न देकर उसे निर्भय किया। गोपियों के संग रासलीला करके सबकी मनोकामना पूर्ण की। अनेक महाबली असुरों का संहार किया और अंत में कंस के केश पकड़कर उसका वध किया।
21. मात-पिता की बन्दि छुड़ाई। उग्रसेन कहं राज दिलाई॥
22. महि से मृतक छहों सुत लायो। मातु देवकी शोक मिटायो॥
23. भौमासुर मुर दैत्य संहारी। लाये षट दश सहसकुमारी॥
24. दै भिन्हीं तृण चीर सहारा। जरासिंधु राक्षस कहं मारा॥
अर्थ (21-24): माता-पिता (वसुदेव-देवकी) को कारागार से मुक्त कराया और उग्रसेन को पुनः राजगद्दी दिलाई। पाताल से देवकी के छह मृत पुत्रों को वापस लाकर माँ का शोक मिटाया। भौमासुर और मुर दैत्य का वध कर सोलह हज़ार कन्याओं को बंधन से मुक्त कराया। एक तिनके के सहारे भी संकट टाला और अंततः जरासंध जैसे राक्षस का अंत किया।
25. असुर बकासुर आदिक मारयो। भक्तन के तब कष्ट निवारियो॥
26. दीन सुदामा के दुःख टारयो। तंदुल तीन मूंठ मुख डारयो॥
27. प्रेम के साग विदुर घर मांगे। दुर्योधन के मेवा त्यागे॥
28. लखि प्रेम की महिमा भारी। ऐसे श्याम दीन हितकारी॥
अर्थ (25-28): बकासुर आदि दैत्यों का वध कर भक्तों के कष्ट दूर किए। दीन मित्र सुदामा के दुख को उनके तीन मुट्ठी चावल स्वयं ग्रहण करके टाला। विदुर के घर प्रेम से दिया गया साधारण साग खाया, पर दुर्योधन के राजसी भोग को त्याग दिया – इसी से पता चलता है कि श्याम सच्चे प्रेम की कद्र करने वाले, दीनों के हितैषी हैं।
29. भारत के पारथ रथ हांके। लिए चक्र कर नहिं बल ताके॥
30. निज गीता के ज्ञान सुनाये। भक्तन ह्रदय सुधा वर्षाये॥
31. मीरा थी ऐसी मतवाली। विष पी गई बजाकर ताली॥
32. राना भेजा सांप पिटारी। शालिग्राम बने बनवारी॥
अर्थ (29-32): महाभारत युद्ध में अर्जुन (पार्थ) का रथ स्वयं हांका और प्रतिज्ञा के बावजूद बिना शस्त्र उठाए, हाथ में सुदर्शन चक्र लेकर भी संयम रखा। अपनी ही गीता का ज्ञान सुनाकर भक्तों के हृदय में अमृत वर्षा की। मीराबाई ऐसी दीवानी भक्त थीं कि विष का प्याला भी हंसते-हंसते, ताली बजाकर पी गईं। राणा ने छल से सांप भेजा, पर वह शालिग्राम बनकर प्रकट हुआ।
33. निज माया तुम विधिहिं दिखायो। उर ते संशय सकल मिटायो॥
34. तब शत निन्दा करी तत्काला। जीवन मुक्त भयो शिशुपाला॥
35. जबहिं द्रौपदी टेर लगाई। दीनानाथ लाज अब जाई॥
36. तुरतहिं वसन बने नन्दलाला। बढ़े चीर भै अरि मुँह काला॥
अर्थ (33-36): अपनी दिव्य माया ब्रह्मा को भी दिखाकर उनके मन का संशय मिटाया। शिशुपाल ने सौ बार निंदा की, फिर भी अंत में उसे जीवन-मुक्ति ही मिली। जब द्रौपदी ने चीरहरण के समय पुकार लगाई “हे दीनानाथ, अब लाज जाती है”, तो नंदलाला तुरंत वस्त्र बनकर उनकी साड़ी बढ़ाते गए और शत्रुओं का मुँह काला हुआ।
37. अस नाथ के नाथ कन्हैया। डूबत भंवर बचावत नैया॥
38. सुन्दरदास आस उर धारी। दयादृष्टि कीजै बनवारी॥
39. नाथ सकल मम कुमति निवारो। क्षमहु बेगि अपराध हमारो॥
40. खोलो पट अब दर्शन दीजै। बोलो कृष्ण कन्हैया की जै॥
अर्थ (37-40): ऐसे अनाथों के नाथ कन्हैया, डूबती नैया को भी बचा लेते हैं। सुंदरदास हृदय में यही आस लेकर कहते हैं – हे बनवारी, अब दया दृष्टि कीजिए। हे नाथ, मेरी सारी कुमति दूर कीजिए और मेरे अपराध शीघ्र क्षमा कीजिए। अब कपाट खोलिए, दर्शन दीजिए – कृष्ण कन्हैया की जय बोलिए।
समापन दोहा
यह चालीसा कृष्ण का, पाठ करै उर धारि।
अष्ट सिद्धि नवनिधि फल, लहै पदारथ चारि॥
अर्थ: जो कोई इस कृष्ण चालीसा का हृदय में धारण कर श्रद्धा से पाठ करता है, परंपरा के अनुसार उसे आठों सिद्धियों, नवों निधियों और धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष चारों पदार्थों का फल प्राप्त होता है। यह चालीसा की पारंपरिक फलश्रुति है।
यह पाठ लोक-प्रचलित पारंपरिक संस्करण पर आधारित है, जो सुंदरदास रचित मानी जाती है और सदियों से मौखिक व मुद्रित रूप में भक्तों के बीच प्रवाहित है।
चालीसा पाठ की विधि
परंपरागत रूप से सुबह स्नान के बाद स्वच्छ आसन पर बैठकर, दीपक और अगरबत्ती जलाकर श्री कृष्ण की मूर्ति या चित्र के सामने चालीसा का पाठ किया जाता है। बुधवार, जन्माष्टमी और एकादशी के दिन इसे विशेष रूप से शुभ माना जाता है, पर श्रद्धा-भाव से किसी भी दिन पाठ किया जा सकता है। पाठ से पहले “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” या “हरे कृष्ण” मंत्र का कुछ देर जप करना और फिर चालीसा पढ़ना कई भक्तों की परंपरा है।
कुछ भक्त चालीसा को दिन में एक बार, कुछ रोज़ 3 या 11 बार पढ़ते हैं – यह पूरी तरह व्यक्तिगत श्रद्धा पर निर्भर है, कोई कठोर नियम नहीं है। यदि आप चालीसा के साथ-साथ श्री कृष्ण के 108 नामों का जप भी करना चाहते हैं, तो हमारा श्री कृष्ण के 108 नाम और उनके अर्थ वाला लेख भी पढ़ सकते हैं।
चालीसा पढ़ने के बाद अगर आप कृष्ण नाम या “हरे कृष्ण” मंत्र की माला भी जपना चाहें तो गिनती भूल जाना आम बात है – खासकर जब मन भाव में डूबा हो। ऐसे में Devta App जैसा जप काउंटर काम आता है, जो हर जप अपने आप गिन लेता है, ताकि आपका ध्यान गिनती में उलझने की बजाय भगवान के नाम में ही लगा रहे।
चालीसा पाठ के लाभ
- मन की शांति: श्रद्धा से पाठ करने पर मन को स्थिरता और शांति मिलती है, ऐसा भक्त परंपरागत रूप से अनुभव करते आए हैं।
- कृष्ण-लीला का स्मरण: हर चौपाई में कृष्ण की कोई न कोई लीला या गुण है, इसलिए पाठ करते हुए आप उनके पूरे जीवन का स्मरण कर लेते हैं।
- दैनिक भक्ति अभ्यास: रोज़ पाठ करने से एक सहज दिनचर्या बनती है, जिसे Devta App पर अपनी जप-गिनती और रोज़ दर्शन के साथ जोड़कर निरंतरता बनाए रखी जा सकती है।
- पारंपरिक फलश्रुति: समापन दोहे के अनुसार श्रद्धापूर्वक पाठ से सिद्धि-निधि व चारों पदार्थों का फल मिलता है – यह परंपरा का कथन है, इसे उसी भाव से देखें।
श्री कृष्ण चालीसा में उनकी बाल लीलाओं से लेकर महाभारत के गीता-उपदेश तक की पूरी यात्रा समाई है – माखनचोर कन्हैया से लेकर पार्थसारथी तक। यही कारण है कि यह चालीसा भक्तों के बीच इतनी प्रिय है। जब आप इसे श्रद्धा से पढ़ें, तो हर चौपाई के पीछे की लीला को भी मन में जीवंत होने दें – कृष्ण कन्हैया की जय।
कृष्ण चालीसा में कुल कितनी चौपाई हैं?
श्री कृष्ण चालीसा में एक आरंभिक दोहा, 40 चौपाई और एक समापन दोहा है – ठीक वैसे ही जैसे हनुमान चालीसा की संरचना होती है।
कृष्ण चालीसा का पाठ कब करना चाहिए?
परंपरागत रूप से सुबह स्नान के बाद या शाम को दीपक जलाकर, विशेष रूप से बुधवार और जन्माष्टमी के दिन इसका पाठ शुभ माना जाता है, पर श्रद्धा से किसी भी समय पाठ किया जा सकता है।
क्या कृष्ण चालीसा का पाठ रोज़ किया जा सकता है?
हाँ, नियमित रूप से इसे रोज़ पढ़ा जा सकता है। कई भक्त इसे कृष्ण नाम जप के साथ जोड़कर एक दैनिक भक्ति दिनचर्या बना लेते हैं।
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