संकटमोचन हनुमानाष्टक: आठों पद, अर्थ और पाठ का फल (तुलसीदास रचित)
यह पृष्ठ गोस्वामी तुलसीदास रचित संकटमोचन हनुमानाष्टक के आठों पद और अंतिम दोहा – अर्थ सहित – प्रस्तुत करता है। इस अष्टक के हर पद में हनुमान जी के एक संकट-निवारण प्रसंग का वर्णन है, और हर पद की अंतिम पंक्ति एक ही है: “को नहिं जानत है जग में कपि, संकटमोचन नाम तिहारो।”
संकटमोचन हनुमानाष्टक – संपूर्ण पाठ
यह स्तोत्र परम्परागत और सार्वजनिक रूप से प्रचलित है। तुलसीदास जी (1532-1623) की यह रचना सदियों से हनुमान भक्तों में गाई जाती है। नीचे आठों पद और अंतिम दोहा क्रम से दिए गए हैं।
पद १ – बाल समय (सूर्य-भक्षण प्रसंग)
बाल समय रवि भक्ष लियो तब, तीनहुं लोक भयो अँधियारो।
ताहि सों त्रास भयो जग को, यह संकट काहु सों जात न टारो।
देवन आनि करी विनती तब, छांड़ि दियो रवि कष्ट निवारो।
को नहिं जानत है जग में कपि, संकटमोचन नाम तिहारो॥ १॥
पद २ – बालि की त्रास (सुग्रीव-राम मिलन प्रसंग)
बालि की त्रास कपीस बसैं गिरि, जात महाप्रभु पंथ निहारो।
चौंकि महामुनि साप दियो तब, चाहिए कौन बिचार बिचारो।
कैद्विज रूप लिवाय महाप्रभु, सो तुम दास के सोक निवारो।
को नहिं जानत है जग में कपि, संकटमोचन नाम तिहारो॥ २॥
पद ३ – सीता की खोज (सागर तट प्रसंग)
अंगद के संग लेन गए सिय, खोज कपीस यह बैन उचारो।
जीवत ना बचिहौ हम सो जु, बिना सुधि लाये इहाँ पगु धारो।
हेरी थके तट सिन्धु सबै तब, लाए सिया-सुधि प्राण उबारो।
को नहिं जानत है जग में कपि, संकटमोचन नाम तिहारो॥ ३॥
पद ४ – रावण की त्रास (अशोक वाटिका प्रसंग)
रावण त्रास दई सिय को तब, राक्षसि सों कहि सोक निवारो।
ताहि समय हनुमान महाप्रभु, जाय महा रजनीचर मारो।
चाहत सीय अशोक सों आगि सु, दे प्रभु मुद्रिका सोक निवारो।
को नहिं जानत है जग में कपि, संकटमोचन नाम तिहारो॥ ४॥
पद ५ – लक्ष्मण मुर्छित (संजीवनी प्रसंग)
बाण लग्यो उर लक्ष्मण के तब, प्राण तजे सुत रावण मारो।
लै गृह वैद्य सुषेन समेत, तबै गिरि द्रोण सु-बीर उपारो।
आनि संजीवनी हाथ दई तब, लक्ष्मण के तुम प्राण उबारो।
को नहिं जानत है जग में कपि, संकटमोचन नाम तिहारो॥ ५॥
पद ६ – नागपाश (खगेश गरुड़ प्रसंग)
रावण युद्ध अजान कियो तब, नाग की फाँस सबै सिर डारो।
श्री रघुनाथ समेत सबै दल, मोह भयो यह संकट भारो।
आनि खगेस तबै हनुमान जु, बन्धन काटि सुत्रास निवारो।
को नहिं जानत है जग में कपि, संकटमोचन नाम तिहारो॥ ६॥
पद ७ – अहिरावण (पाताल प्रसंग)
बन्धु समेत जबै अहिरावण, लै रघुनाथ पाताल सिधारो।
देवहिं पूजि भली विधि सों बलि, देउ सबै मिलि मंत्र विचारो।
जाय सहाय भयो तब ही हनुमान, अहिरावण सैन्य समेत संहारो।
को नहिं जानत है जग में कपि, संकटमोचन नाम तिहारो॥ ७॥
पद ८ – प्रार्थना (भक्त की विनती)
काज किये बड़ देवन के तुम, वीर महाप्रभु देखि विचारो।
कौन सो संकट मोर गरीब को, जो तुमसो नहिं जात है टारो।
बेगि हरौ हनुमान महाप्रभु, जो कछु संकट होय हमारो।
को नहिं जानत है जग में कपि, संकटमोचन नाम तिहारो॥ ८॥
दोहा (समापन)
पवनतनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप।
राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप॥

हर पद का सरल अर्थ
पद १ – जब बालक हनुमान ने सूर्य को निगल लिया
बाल्यकाल में हनुमान जी ने सूर्य को फल समझकर खा लिया – तीनों लोकों में अँधेरा छा गया। यह संकट कोई भी नहीं टाल पा रहा था। तब देवता प्रार्थना करने आए और हनुमान जी ने सूर्य को छोड़ दिया – संकट का निवारण हुआ। “को नहिं जानत…” – ऐसे कपि को कौन नहीं जानता जिनका नाम ही संकट को मोचन (मुक्त) करने वाला है।
पद २ – सुग्रीव की रक्षा और राम-सुग्रीव मिलन
बालि के डर से सुग्रीव पर्वत पर छिपकर रहते थे। महामुनि के शाप ने स्थिति और जटिल बना दी थी। तब हनुमान जी ने ब्राह्मण रूप धारण कर राम-लक्ष्मण को सुग्रीव के पास लाया और भक्त सुग्रीव का सोक (दुख) दूर किया। यह पद हनुमान जी की कूटनीतिक बुद्धि का प्रमाण है।
पद ३ – सीता की खोज और सागर-लाँघना
अंगद के साथ वानरों की सेना सीता की खोज में गई। कपिश्रेष्ठ ने कहा – बिना सुध लाए वापस नहीं जाएंगे। सब सागर के किनारे हारकर बैठ गए, तब हनुमान जी ने छलाँग लगाई, सीता माता की सुध लाए और सभी वानरों के प्राण बचाए। यह पद हनुमान जी के असाधारण साहस और समर्पण का वर्णन करता है।
पद ४ – सीता माता का संकट और अंगूठी
रावण के डर से सीता माता अत्यंत दुखी थीं, राक्षसियाँ उन्हें कष्ट देती थीं। जब सीता माता ने अशोक वृक्ष से आग माँगी (प्राण देने के लिए), उसी समय हनुमान जी वहाँ प्रकट हुए, राक्षसों का नाश किया और श्री राम की मुद्रिका (अंगूठी) देकर सीता माता का सोक दूर किया। यह पद हनुमान जी की समय पर आने वाली कृपा का वर्णन करता है।
पद ५ – संजीवनी और लक्ष्मण की रक्षा
इंद्रजीत के बाण से लक्ष्मण जी मूर्छित हो गए। वैद्य सुषेन ने संजीवनी बूटी की आवश्यकता बताई। हनुमान जी ने पूरा द्रोण पर्वत ही उठा लाए और संजीवनी हाथ में देकर लक्ष्मण जी के प्राण बचाए। इस प्रसंग को रामचरितमानस में तुलसीदास जी ने विस्तार से वर्णित किया है।
पद ६ – नागपाश और गरुड़
रावण ने अजान (छल से) युद्ध करते हुए नाग की फाँस (नागपाश) का प्रयोग किया और श्री रघुनाथ सहित पूरी सेना उसमें बँध गई। यह बड़ा भारी संकट था। तब हनुमान जी ने खगेश यानी गरुड़ जी को लाया, जिन्होंने नागपाश काटा और सबका भय दूर हुआ।
पद ७ – पाताल में अहिरावण का वध
अहिरावण ने श्री राम और लक्ष्मण को बंधु (भाई) समेत पाताल ले जाकर देवी को बलि देने का मंत्र विचार किया। सब देवता मिलकर भी कोई उपाय न सूझा। तब हनुमान जी पाताल में गए और अहिरावण को उसकी पूरी सेना समेत नष्ट कर दिया। यह पद हनुमान जी की सर्वत्र पहुँच और अजेयता का प्रमाण है।
पद ८ और समापन दोहा – भक्त की प्रार्थना
आठवाँ पद भक्त की प्रार्थना है – “हे वीर महाप्रभु, जब आपने देवताओं के इतने बड़े-बड़े संकट दूर किए, तो मेरे जैसे गरीब का कौन सा संकट है जो आपसे न टले? शीघ्र आइए और मेरे सभी संकट हरिए।” यह पद हनुमान भक्ति का सबसे सुंदर भाव व्यक्त करता है – विनम्रता के साथ पूर्ण विश्वास।
समापन दोहे का अर्थ: “हे पवनपुत्र, संकट हरने वाले, मंगलमय मूर्ति! राम, लक्ष्मण और सीता के साथ मेरे हृदय में विराजिए, हे सुरों के भूप (भगवान)।” यह दोहा स्तोत्र की पूर्णाहुति है जिसमें भक्त हनुमान जी को परिवार के साथ हृदय में बसाने की प्रार्थना करता है।
यह अष्टक क्यों पढ़ें – पाठ का फल और महत्व
तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में लिखा है: “राम एक तापस तिय तारी। नाम कोटि खल कुमति सुधारी॥” – राम ने एक अहिल्या को तारा, पर राम-नाम ने करोड़ों को। इसी भाव में यह अष्टक है – हनुमान जी के नाम की महिमा ऐसी है कि उनका संकटमोचन नाम सुनते ही भय दूर होने लगता है।
परम्परा में इस अष्टक के बारे में कहा जाता है कि जो इसे मंगलवार या शनिवार को भक्तिभाव से पढ़ता है, उसके जीवन के संकट हनुमान जी की कृपा से दूर होते हैं। सावन में, जब शिव और हनुमान दोनों की उपासना एक साथ चलती है, इस अष्टक का पाठ विशेष रूप से लाभकारी माना जाता है।
पाठ कैसे करें – सरल विधि
मंगलवार या शनिवार की सुबह स्नान के बाद, स्वच्छ आसन पर बैठें। हनुमान जी के सामने दीप जलाएं। पहले “श्री हनुमते नमः” तीन बार बोलें, फिर शांत मन से आठों पद और दोहा पढ़ें। पाठ के बाद थोड़ी देर मौन में बैठकर हनुमान जी का ध्यान करें।
यदि जप भी जोड़ना हो तो पाठ के बाद “ॐ श्री हनुमते नमः” या “जय हनुमान” का जप करें। जप की गिनती रखना कठिन लगे तो Devta App का जप काउंटर इस काम को सहज बना देता है – हनुमान जी का संकल्प बनाएं और स्क्रीन छूते हुए जप करते रहें, गिनती अपने-आप होती रहती है। हनुमान नाम जप की पूरी विधि यहाँ पढ़ें।
संकट के किसी भी क्षण में – रात हो या दिन, पवित्र हों या न हों – मन में “को नहिं जानत है जग में कपि, संकटमोचन नाम तिहारो” का स्मरण करना ही हनुमान जी का सुमिरन है। कालीसंतरण उपनिषद कहता है – नाम जप सदा और हर अवस्था में खुला है। Devta App में रोज़ हनुमान दर्शन के साथ यह आदत सुंदर रूप से बन सकती है।
संकटमोचन हनुमानाष्टक किसने लिखा?
इस अष्टक की रचना गोस्वामी तुलसीदास जी (1532-1623) ने की है, जो रामचरितमानस और हनुमान चालीसा के भी रचयिता हैं। यह उनकी प्रमुख हनुमान-स्तुतियों में से एक है।
हनुमानाष्टक में कितने पद हैं?
इस अष्टक में आठ पद (पदs) और एक अंतिम दोहा है। हर पद में हनुमान जी के किसी एक महान संकट-निवारण प्रसंग का वर्णन है, और हर पद की अंतिम पंक्ति एक समान है: ‘को नहिं जानत है जग में कपि, संकटमोचन नाम तिहारो।’
हनुमानाष्टक का पाठ कब करना चाहिए?
मंगलवार और शनिवार को, संकट के समय, सावन मास में, और किसी भी विपत्ति में इस अष्टक का पाठ विशेष फलदायी माना जाता है। इसे सुबह स्नान के बाद शांत मन से पढ़ना चाहिए।
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