रामचंद्र कृपालु भजमन - ramchandra-kripalu-bhajman-path-arth-sahit

श्री रामचंद्र कृपालु भजमन: बोल और भावार्थ

कौन सी स्तुति एक ही साँस में राम के सौंदर्य, करुणा, वीरता और अपनी भक्ति-विनती सब समेट ले? उत्तर है – रामचंद्र कृपालु भजमन। गोस्वामी तुलसीदास ने इसे विनय पत्रिका (श्लोक 45) में हरिगीतिका छंद में रचा था – और चार सौ से अधिक वर्षों बाद भी यह स्तुति उतनी ही ताज़ी और प्रभावशाली है।

विनय पत्रिका तुलसीदास जी की वह रचना है जिसमें उन्होंने एक असाधारण भक्त की तरह राम के सामने अपनी कमज़ोरियाँ रखीं और उनकी शरण माँगी। “रामचंद्र कृपालु भजमन” उसी संग्रह का हृदय है – पहले चार छंदों में राम का ऐसा चित्र जो आँखें बंद करते ही मन में बन जाए, और पाँचवें छंद में सीधे हृदय से निकली प्रार्थना।

रामचंद्र कृपालु भजमन – संपूर्ण पाठ और भावार्थ

स्रोत: गोस्वामी तुलसीदास, विनय पत्रिका, श्लोक 45 – BhaktiBharat.com पर उपलब्ध प्रामाणिक पाठ के आधार पर।

प्रथम छंद – राम का दिव्य स्वरूप

श्री रामचन्द्र कृपालु भजुमन, हरण भवभय दारुणं।
नव कंज लोचन कंज मुख, कर कंज पद कंजारुणं॥

भावार्थ: हे मन! करुणामय श्री रामचंद्र का भजन कर – वे इस संसार के जन्म-मरण के दारुण भय को हरने वाले हैं। उनके नेत्र नवविकसित कमल जैसे कोमल और सुंदर हैं, मुख भी कमल सदृश, और उनके हाथ-पाँव लाल कमल की कान्ति लिए हुए हैं।

“भवभय दारुणं” – संसार का भय, जन्म-मृत्यु का चक्र – यही वह जड़ है जिससे तुलसीदास मुक्ति माँग रहे हैं। और पाँच बार “कंज” (कमल) शब्द का प्रयोग अनुप्रास अलंकार का अनुपम उदाहरण है जो छंद को संगीतमय बना देता है।

द्वितीय छंद – अनुपम सौंदर्य का चित्रण

कन्दर्प अगणित अमित छवि, नव नील नीरद सुन्दरं।
पटपीत मानहुँ तड़ित रुचि शुचि, नोमि जनक सुतावरं॥

भावार्थ: उनकी छवि असंख्य कामदेवों की सुंदरता से भी बढ़कर है। नवीन नीले मेघ जैसी श्यामल देह पर पीत वस्त्र मानो बिजली की कान्ति से चमक रहे हैं – इस प्रकार जनकनंदिनी सीता के वर राम को मैं नमन करता हूँ।

नव नील नीरद सुन्दरं” में वह बिम्ब है जो भारतीय काव्य में राम-कृष्ण के श्यामवर्ण का सबसे अर्थपूर्ण प्रयोग है – नया उठता काला बादल, जिसमें वर्षा की वादा है, जो तपती धरती को शीतल करने आता है। राम वैसे ही भक्त की तपती आत्मा पर शीतल छाया हैं।

तृतीय छंद – दीनबंधु और दैत्य-निकंदन

भजु दीनबन्धु दिनेश दानव, दैत्य वंश निकन्दनं।
रघुनन्द आनन्द कन्द कोशल, चन्द दशरथ नन्दनं॥

भावार्थ: दीनों के बंधु, तेज के स्वामी, दानव-दैत्य कुल का समूल नाश करने वाले, रघुकुल के आनंदकंद, कोशल के चंद्रमा और दशरथ के प्रिय पुत्र का भजन कर।

इस छंद में तुलसीदास जी राम के दो परस्पर विपरीत गुणों को एक साथ रखते हैं – “दीनबंधु” (दीनों के मित्र) और “दानव-दैत्य-वंश-निकंदन” (दानवों का विनाशक)। यही राम का वह रूप है जो रामचरितमानस में भी बार-बार आता है – जो कमज़ोर के लिए मित्र है, वही शक्तिशाली अत्याचारी के लिए काल।

चतुर्थ छंद – वीर योद्धा का भव्य चित्र

शिर मुकुट कुंडल तिलक, चारु उदारु अङ्ग विभूषणं।
आजानु भुज शर चाप धर, संग्राम जित खरदूषणं॥

भावार्थ: मस्तक पर रत्न-जड़ित मुकुट, कानों में कुंडल, ललाट पर तिलक – उनके उदार सुंदर अंग दिव्य आभूषणों से सुशोभित हैं। घुटने तक लंबी भुजाओं में धनुष-बाण धारण किए, वे संग्राम में खर और दूषण को परास्त करने वाले वीर हैं।

“आजानु भुज” – घुटने तक लंबी भुजाएं – यह राम की एक विशिष्ट पहचान है जो उन्हें महान शासक और धनुर्धर के रूप में चिह्नित करती है। तुलसीदास यहाँ खर-दूषण-वध का उल्लेख इसलिए करते हैं क्योंकि अरण्यकाण्ड का यह प्रसंग राम की उस शक्ति को दर्शाता है जो एकाकी भी चौदह हज़ार राक्षसों को पराजित कर सकती है।

पंचम छंद – तुलसीदास की हृदय-प्रार्थना

इति वदति तुलसीदास शंकर, शेष मुनि मन रंजनं।
मम् हृदय कंज निवास कुरु, कामादि खलदल गंजनं॥

भावार्थ: इस प्रकार तुलसीदास कहते हैं – जो शिव, शेषनाग और मुनियों के मन को आनंदित करते हैं, वे काम-क्रोध-लोभ आदि दुष्ट शत्रुओं को नष्ट करते हुए मेरे हृदय-कमल में निवास करें।

यही पाँचवाँ छंद इस पूरी स्तुति की आत्मा है। तुलसीदास ने पाँचवें स्थान पर “इति वदति” (इस प्रकार कहता हूँ) लिखकर अपना नाम डाला – यह परंपरागत भक्ति-काव्य की “मुद्रा” है। फिर “कामादि खलदल गंजनं” – काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार, ईर्ष्या के उस पूरे दल से मुक्ति माँगी जो मनुष्य को ईश्वर से दूर रखते हैं। और माँगा क्या? यही कि राम हृदय में बस जाएं।

षष्ठ एवं सप्तम छंद – सीता-गौरी संवाद (बालकाण्ड)

मन जाहि राच्यो मिलहि सो, वर सहज सुन्दर सांवरो।
करुणा निधान सुजान शील, स्नेह जानत रावरो॥

भावार्थ: मन जिसमें रम गया है, वही सहज सुंदर सांवला वर मिलेगा – माता गौरी ने सीता जी को आशीर्वाद दिया। वे करुणा के सागर, सुजान, शील से परिपूर्ण और प्रेम का रहस्य जानने वाले हैं।

एहि भांति गौरी असीस सुन सिय, सहित हिय हरषित अली।
तुलसी भवानिहि पूजी पुनि-पुनि, मुदित मन मन्दिर चली॥

भावार्थ: इस प्रकार गौरी माता का यह आशीर्वाद सुनकर सीता जी सखियों सहित हृदय में हर्षित हो गईं। तुलसीदास जी कहते हैं – भवानी माँ को बारम्बार पूजकर, मुदित मन से सीता मंदिर को लौट चलीं।

ये दो छंद रामचरितमानस के बालकाण्ड से हैं। इन्हें आरती के अंत में गाने की परंपरा यह बताती है कि राम और सीता का मिलन केवल मानवीय प्रेम नहीं, यह दैवी संयोग है जिसे माता गौरी ने स्वयं आशीर्वाद दिया। “मन जाहि राच्यो मिलहि सो वर” – जो मन में पहले से बस गया हो, वही मिलता है। भक्त के लिए यह संदेश है: राम को पहले मन में बसाओ।

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यह स्तुति क्यों इतनी प्रिय है – एक अनोखी बात

भारतीय भक्ति-काव्य में सैकड़ों राम-स्तुतियाँ हैं, पर “रामचंद्र कृपालु भजमन” तीन कारणों से सबसे अलग है।

पहला – भाषा का अनुप्रास-सौंदर्य। “नव कंज लोचन कंज मुख कर कंज पद कंजारुणं” – एक छंद में पाँच बार कंज (कमल)। “कन्दर्प अगणित अमित छवि” में क, अ, अ, म, छ का संगीत। “दीनबंधु दिनेश दानव दैत्य वंश निकंदनं” में द-ध-ध-द-ध-ध। यह छंद पढ़ा नहीं, गाया जाता है – और गाने से ही उसकी पूरी शक्ति निकलती है।

दूसरा – राम के चार रूपों का एकीकरण। पाँच छंदों में राम चार रूपों में आते हैं – करुणामय भयहर्ता (छंद 1), अनुपम सुंदर (छंद 2), दीनों के मित्र और दुष्टों के काल (छंद 3), वीर धनुर्धर (छंद 4)। पाँचवाँ छंद भक्त का हृदय है। कोई और इतनी छोटी रचना में इतने पहलू नहीं समेटता।

तीसरा – गोस्वामी तुलसीदास की व्यक्तिगत आर्तता। जब तुलसीदास ने “मम् हृदय कंज निवास कुरु” लिखा, वे सिर्फ परंपरागत स्तुति नहीं कर रहे थे। वे माँग रहे थे। यह वही व्यक्ति हैं जिन्होंने रामचरितमानस में घोषित किया: “सोई सेवक प्रिय प्रभु हि, सदा रहत सन्मान” – वही सेवक प्रिय है जो सदा सम्मान में रहे। और स्वयं विनय पत्रिका में अपनी कमज़ोरियाँ राम के सामने रखीं। उस आर्तता का स्पर्श इस स्तुति में आज भी है।

रामचंद्र कृपालु भजमन का नित्य पाठ – व्यावहारिक सलाह

इस स्तुति का पूरा लाभ तब होता है जब इसे समझकर पढ़ें – जल्दी-जल्दी रटने से नहीं। प्रतिदिन सुबह स्नान के बाद एक बार धीरे-धीरे, प्रत्येक शब्द के अर्थ को मन में स्थिर करते हुए पढ़ें। आरती के समय इसे गाएं – संगीत इसे और गहरा करता है।

जो राम नाम का जप भी करते हों, उनके लिए यह स्तुति एक सुंदर “भूमिका” है – पाँच मिनट इसे पढ़ने के बाद माला पर राम नाम जप करें, मन तैयार और एकाग्र मिलेगा। जप की गिनती के लिए Devta App का जप काउंटर आसान है – माला न हो, समय कम हो, चलते-फिरते हों – राम नाम का जप कभी नहीं रुकता।

तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में लिखा: “राम एक तापस तिय तारी। नाम कोटि खल कुमति सुधारी॥” – राम ने व्यक्तिगत रूप से एक तपस्विनी (अहिल्या) का उद्धार किया, पर उनके नाम ने करोड़ों लोगों की कुमति को सुधारा। यही राम नाम की अपरंपार शक्ति है जिसका अनुभव “रामचंद्र कृपालु भजमन” की शुरुआत से ही होता है।

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रामचंद्र कृपालु भजमन किसने लिखा?

यह स्तुति गोस्वामी तुलसीदास जी ने सोलहवीं शताब्दी में विनय पत्रिका (श्लोक 45) में रची थी। यह हरिगीतिका छंद में संस्कृत-अवधी मिश्रण में लिखी गई है।

इस भजन में कितने छंद हैं और वे किस बारे में हैं?

पाँच मुख्य छंद हैं – पहले दो राम के अनुपम सौंदर्य का वर्णन करते हैं, तीसरा उनकी करुणा और शक्ति का, चौथा वीर रूप का, और पाँचवाँ तुलसीदास जी की हृदय-प्रार्थना है। दो अतिरिक्त छंद बालकाण्ड से लिए गए हैं।

रामचंद्र कृपालु भजमन रोज़ कैसे जपें?

प्रतिदिन सुबह-शाम एक बार पूरे मन से पाठ करें। Devta App के जप काउंटर से राम नाम जप करते हुए इसे अपनी भक्ति-दिनचर्या में जोड़ सकते हैं।

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