श्री राम आरती - shri-ram-aarti-path-arth-sahit

श्री राम आरती अर्थ सहित (आरती श्रीरामचन्द्रजी की)

हर सुबह और हर शाम, लाखों राम मंदिरों में एक ही आवाज़ गूँजती है – “श्री रामचन्द्र कृपालु भजुमन…” यही है श्री राम आरती, जिसे गोस्वामी तुलसीदास जी ने विनय पत्रिका में रचा था। सात छंदों में तुलसीदास ने राम के सौंदर्य, करुणा, शक्ति और अपनी भक्ति-विनती को इस तरह पिरोया है कि यह आरती सुनते ही मन स्वतः श्रद्धा में डूब जाता है।

यह पृष्ठ श्री राम आरती का संपूर्ण पाठ देता है – BhaktiBharat.com पर उपलब्ध तुलसीदास-रचित पाठ के आधार पर – हर छंद के हिंदी अर्थ सहित, ताकि प्रत्येक शब्द का भाव समझकर आरती की जा सके।

श्री राम आरती – संपूर्ण पाठ अर्थ सहित

ये छंद तुलसीदास जी की विनय पत्रिका (श्लोक 45) पर आधारित हैं – सनातन परंपरा का सर्वाधिक प्रिय राम-स्तुति संग्रह।

श्री रामचन्द्र कृपालु भजुमन, हरण भवभय दारुणं।
नव कंज लोचन कंज मुख, कर कंज पद कंजारुणं॥

अर्थ: हे मन! करुणामय श्री रामचंद्र का भजन कर जो इस संसार के जन्म-मरण के दारुण भय को हरने वाले हैं। उनके नेत्र नवविकसित कमल जैसे, मुख भी कमल सदृश, और हस्त-चरण लाल कमल के समान सुंदर हैं।

कन्दर्प अगणित अमित छवि, नव नील नीरद सुन्दरं।
पटपीत मानहुँ तड़ित रुचि शुचि, नोमि जनक सुतावरं॥

अर्थ: उनकी छवि असंख्य कामदेवों से बढ़कर है। नवीन नीले मेघ जैसी श्यामल देह पर पीत वस्त्र मानो बिजली की तरह चमक रहे हैं। ऐसे जनकनंदिनी सीता के वर श्री राम को मैं नमन करता हूँ।

भजु दीनबन्धु दिनेश दानव, दैत्य वंश निकन्दनं।
रघुनन्द आनन्द कन्द कोशल, चन्द दशरथ नन्दनं॥

अर्थ: दीनों के बंधु, तेज के स्रोत, दानव-दैत्य कुल का विनाश करने वाले, रघुकुल के आनंदकंद, कोशल के चंद्रमा, दशरथ पुत्र का भजन कर।

शिर मुकुट कुंडल तिलक, चारु उदारु अङ्ग विभूषणं।
आजानु भुज शर चाप धर, संग्राम जित खरदूषणं॥

अर्थ: मस्तक पर मुकुट, कानों में कुंडल, ललाट पर तिलक – उनके उदार सुंदर अंग दिव्य आभूषणों से सजे हैं। घुटने तक लंबी भुजाओं में धनुष-बाण धारण किए, वे संग्राम में खर-दूषण को जीतने वाले वीर हैं।

इति वदति तुलसीदास शंकर, शेष मुनि मन रंजनं।
मम् हृदय कंज निवास कुरु, कामादि खलदल गंजनं॥

अर्थ: इति तुलसीदास कहते हैं – जो शंकर, शेषनाग और मुनियों के मन को आनंदित करते हैं, वे काम आदि दुष्ट शत्रुओं का नाश करते हुए मेरे हृदय-कमल में निवास करें।

मन जाहि राच्यो मिलहि सो, वर सहज सुन्दर सांवरो।
करुणा निधान सुजान शील, स्नेह जानत रावरो॥

अर्थ: जिसमें मन रम गया है वही स्वाभाविक सुंदर सांवला वर मिले। वे करुणा के सागर, सुजान, शील से परिपूर्ण और प्रेम के रहस्य को जानने वाले हैं।

एहि भांति गौरी असीस सुन सिय, सहित हिय हरषित अली।
तुलसी भवानिहि पूजी पुनि-पुनि, मुदित मन मन्दिर चली॥

अर्थ: इस प्रकार गौरी माता का आशीर्वाद सुनकर सीता जी सखियों सहित हृदय में हर्षित हो उठीं। तुलसीदास जी कहते हैं कि भवानी माँ को बारम्बार पूजकर सीता जी मुदित मन से मंदिर को लौट चलीं।

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राम आरती किस तरह करें

राम आरती की विधि सरल है और इसे घर के छोटे से पूजाघर में भी पूरी श्रद्धा से किया जा सकता है। पाँच लौ वाली आरती थाल सबसे उत्तम मानी जाती है – पाँच तत्वों का प्रतीक।

  • समय: प्रातःकाल स्नान के बाद और संध्याकाल – दोनों समय श्रेष्ठ। रामनवमी, मंगलवार और एकादशी विशेष रूप से फलदायी।
  • तैयारी: राम जी के चित्र या मूर्ति के सामने दीप जलाएं, अगरबत्ती, फूल और तुलसीदल अर्पित करें।
  • आरती की विधि: थाल को दोनों हाथों से घड़ी की दिशा में धीरे-धीरे घुमाते हुए “रामचंद्र कृपालु भजमन” गाएं – एक बार या तीन बार।
  • भाव सबसे महत्वपूर्ण: थाल, दीप या मूर्ति न हो तो भी मन से आरती हो सकती है – “मनसा पूजा” (मानसिक पूजा) उतनी ही स्वीकार्य है।

अगर परिवार के सदस्य अलग-अलग जगह हैं और एकत्र होकर आरती संभव नहीं, तो Devta App पर रोज़ दर्शन करें और राम जी को मन ही मन फूल अर्पित करें – भक्ति के लिए एक ही छत की ज़रूरत नहीं।

इस आरती की खास बात

अधिकांश आरतियाँ एक ही भाव में टिकी होती हैं, पर “रामचंद्र कृपालु भजमन” पाँच ही छंदों में राम के चार रूपों का पूरा दर्शन कराती है। पहले दो छंद उनके अनुपम सौंदर्य का चित्रण करते हैं – कमलनयन, श्यामवर्ण, पीत वस्त्र। तीसरा छंद उनकी करुणा और शक्ति दोनों को एक साथ दिखाता है – वे दीनबंधु भी हैं और दैत्य-निकंदन भी। चौथा छंद उनके वीर योद्धा रूप की महिमा गाता है। और पाँचवाँ छंद तुलसीदास जी की निजी प्रार्थना है – “मम् हृदय कंज निवास कुरु” (मेरे हृदय में वास करो)।

छठा और सातवाँ छंद रामचरितमानस (बालकाण्ड) से लिए गए हैं – वे दृश्य जब माता गौरी ने सीता जी को आशीर्वाद दिया। इन्हें आरती में जोड़ने की परंपरा यह बताती है कि राम केवल योद्धा या राजा नहीं, वे प्रेम के भी सर्वोच्च स्वामी हैं जिन्हें सीता जी के रूप में जगदंबा ने स्वयं चुना।

प्रतिदिन यह आरती करने से मन में राम का चित्र गहरा होता है। रामचरितमानस में वर्णित “नाम कोटि खल कुमति सुधारी” का अनुभव उन्हें होता है जो नियम से नाम लेते हैं। आरती के बाद Devta App पर राम काउंटर से जप गिनें – माला न हो तो भी जप का हिसाब रहे।

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श्री राम आरती में कितने छंद हैं?

श्री राम आरती (रामचंद्र कृपालु भजमन) में 7 छंद हैं जिन्हें गोस्वामी तुलसीदास जी ने विनय पत्रिका में रचा था।

श्री राम आरती कब और कैसे करें?

प्रतिदिन सुबह और शाम राम पूजा के समय आरती करें। दीप जलाएं, धूप अर्पित करें और रामचंद्र कृपालु भजमन गाते हुए थाल को घड़ी की दिशा में घुमाएं।

क्या रामचंद्र कृपालु भजमन और राम आरती एक ही है?

हाँ, रामचंद्र कृपालु भजमन ही सर्वाधिक प्रचलित राम आरती है जिसे तुलसीदास जी ने विनय पत्रिका में रचा था और जो आज समस्त राम मंदिरों में नित्य गाई जाती है।

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