घर में कोई बड़ा जन्मा हो या कोई अपना चला गया हो – सूतक की उस चुप्पी में एक सवाल अक्सर दिल में उठता है: क्या अभी भगवान का नाम ले सकते हैं? क्या मन ही मन प्रार्थना कर सकते हैं? कुछ लोग डरते हैं कि नाम लेना भी वर्जित है। कुछ मान बैठते हैं…
घर में अचानक सब शांत हो जाता है। जो आवाज़ रोज़ सुनाई देती थी, वह नहीं आती। जो पग की आहट हम पहचानते थे, वह बंद है। और उस चुप्पी में, मन में एक सवाल उठता है – “अब पूजा-पाठ का क्या? मंदिर जाएँ? माला फेरें? या रुक जाएँ?” किसी अपने के जाने के बाद…