संत कबीर ने गलियों में कपड़ा बुना और नाम जपते रहे। संत तुकाराम खेत में काम करते हुए विट्ठल-नाम में डूबे रहते थे। संत नरसी मेहता बाज़ार में, चौपाल में, हर जगह नाम लेते थे – और उन्होंने कभी नहीं पूछा: “क्या यहाँ नाम लेना ठीक है?” यह प्रश्न उनके मन में आया ही नहीं।…
हाँ, खाना खाने के बाद भी नाम जप किया जा सकता है। जूठे मुँह की शुचिता का नियम माला और औपचारिक पूजा के लिए है, नाम के मानसिक स्मरण के लिए नहीं। भोजन के बाद कुल्ला या आचमन करके माला से जप करें; पर मन ही मन भगवान का नाम हर पल, हर स्थिति में…