हर साल लाखों लोग नाम जप शुरू करना चाहते हैं – राम का, कृष्ण का, शिव का। लेकिन एक सवाल उन्हें रोक देता है: “क्या बिना गुरु-दीक्षा के जप कर सकते हैं? कहीं यह गलत तो नहीं होगा?” अगर आप भी इस दुविधा में हैं, तो उत्तर है – हाँ, नाम जप के लिए गुरु-दीक्षा…
नवरात्रि के पहले दिन, जब घर में घट-स्थापना होती है और धूप की सुगंध हर कमरे में फैल जाती है, तब एक सवाल मन में उठता है: माता दुर्गा का जप कैसे करूँ? कौन सी माला? कौन सा मंत्र? दिन में कितनी बार? यह सवाल नवरात्रि में ही नहीं, बारहों महीने उन लोगों के मन…
आपके पूजा-घर में एक तुलसी माला रखी है। आज सुबह उसी माला पर आपने माता दुर्गा का मंत्र जपा – या शायद ‘ओम नमः शिवाय’। अगर ऐसा हुआ है, तो यह लेख आपके लिए है। गलती छोटी-सी लगती है, लेकिन इसके पीछे एक बहुत पुरानी कथा है जो तुलसी माला को बाकी सब मालाओं से…
“नाम जप के नियम” खोजते हुए आपने अब तक बहुत कुछ पढ़ा होगा – कोई कहता है पहले नहाओ, कोई कहता है माला चाहिए, कोई कहता है संध्याकाल ही सही है, कोई कहता है प्याज मत खाओ। इतनी शर्तें सुनकर लगता है – नाम जप एक जटिल अनुष्ठान है जिसे “सही तरीके से” करना मुश्किल…
आपकी थाली में प्याज-लहसुन है और मन में भगवान का नाम – क्या दोनों एक साथ नहीं हो सकते? यह सवाल उन करोड़ों भक्तों के मन में उठता है जो अपने रोज़ के खाने में प्याज-लहसुन का इस्तेमाल करते हैं लेकिन जप करना भी चाहते हैं। इसका जवाब उतना कठोर नहीं है जितना अक्सर बताया…
यह प्रश्न पिछले कई दशकों में लाखों घरों में उठा है। एक तरफ शास्त्र की परंपरा है, दूसरी तरफ भक्ति की उदार धारा। दोनों को ध्यान से सुनना ज़रूरी है – क्योंकि दोनों में सच्चाई का एक-एक हिस्सा है। शास्त्रीय दृष्टिकोण: परंपरागत मत क्या कहता है कुछ शास्त्रीय ग्रंथों और परंपराओं में गायत्री उपासना को…
संत कबीर ने गलियों में कपड़ा बुना और नाम जपते रहे। संत तुकाराम खेत में काम करते हुए विट्ठल-नाम में डूबे रहते थे। संत नरसी मेहता बाज़ार में, चौपाल में, हर जगह नाम लेते थे – और उन्होंने कभी नहीं पूछा: “क्या यहाँ नाम लेना ठीक है?” यह प्रश्न उनके मन में आया ही नहीं।…
हाँ, खाना खाने के बाद भी नाम जप किया जा सकता है। जूठे मुँह की शुचिता का नियम माला और औपचारिक पूजा के लिए है, नाम के मानसिक स्मरण के लिए नहीं। भोजन के बाद कुल्ला या आचमन करके माला से जप करें; पर मन ही मन भगवान का नाम हर पल, हर स्थिति में…
यह लेख आध्यात्मिक और सांस्कृतिक जानकारी है – चिकित्सकीय सलाह नहीं। किसी भी शारीरिक प्रश्न के लिए अपने चिकित्सक से परामर्श अवश्य लें। भारतीय परंपरा में गर्भावस्था के नौ महीने गर्भ संस्कार का सबसे पवित्र समय माने गए हैं। यह वह समय है जब माँ की भावनाएं, विचार और साधना सीधे नए जीवन को प्रभावित…
घर में किसी प्रिय का निधन हो जाए। शोक है, आँसू हैं, और घर में सूतक चल रहा है। पूजा बंद है। पर मन बार-बार भगवान की तरफ जाता है – उस समय जब उनकी सबसे ज़्यादा जरूरत है। क्या ऐसे में भगवान का नाम लेना बंद कर देना चाहिए? यह सवाल गहरा है –…