मंदिर न जा सकें तो भक्ति कहाँ जाए? बुज़ुर्गों के लिए घर बैठे पूजा का पूरा रास्ता
वे सत्तर साल से ऊपर हैं। बीस साल से रोज़ सुबह पाँच बजे उठकर पैदल मंदिर जाते थे। पर पिछले कुछ महीनों से घुटनों ने जवाब दे दिया है। मंदिर की सीढ़ियाँ चढ़ना मुश्किल हो गया है। बेटा दूर रहता है। और मन में एक दर्द है – “क्या मेरी और भगवान की वह रोज़…