प्रह्लाद को उनके पिता हिरण्यकश्यप ने बार-बार मारने की कोशिश की। जहर दिया, पहाड़ से फेंका, हाथियों से रौंदवाया, जलाने की कोशिश की। फिर भी वह बालक हर बार बिना एक खरोंच के उठ खड़ा होता था। क्यों? उसके होठों पर एक नाम था और उस नाम की शरण में उसे डर का नाम भी…