मनुस्मृति की वह पंक्ति जो जप को हजार यज्ञों से ऊँचा ठहराती है
सोचिए एक पल – यदि कोई ऐसा यज्ञ हो जिसके लिए न वेदी चाहिए, न घी और हवन-सामग्री, न पंडित की ज़रूरत – और जिसे आप बस में, ऑफिस में, या रसोई में खड़े-खड़े भी कर सकें। और यदि स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने इसी यज्ञ को अपना स्वरूप बताया हो, और प्राचीन शास्त्रों में इसे…