जन्माष्टमी का व्रत किसी ने आप पर थोपा नहीं है। आपने खुद चुना। और यही भेद है जो इस व्रत को खास बनाता है: यह भूख का व्रत नहीं, प्रेम का संकल्प है। एक दिन कह देना कि “आज मैं कृष्ण के साथ हूं” – यही है इस व्रत की आत्मा। बाकी सब – क्या…
रात के ग्यारह बज रहे हैं। घर में बाकी सब सो चुके हैं। एक दीपक टिमटिमा रहा है। झूला सजा है, मूर्ति नहाई हुई है, और आप एक पल का इंतज़ार कर रहे हैं – रात 11 बजकर 57 मिनट का। यही है जन्माष्टमी का निशीथ काल। 45 मिनट का वह दरवाज़ा जब – परंपरा…