संत कबीर ने गलियों में कपड़ा बुना और नाम जपते रहे। संत तुकाराम खेत में काम करते हुए विट्ठल-नाम में डूबे रहते थे। संत नरसी मेहता बाज़ार में, चौपाल में, हर जगह नाम लेते थे – और उन्होंने कभी नहीं पूछा: “क्या यहाँ नाम लेना ठीक है?” यह प्रश्न उनके मन में आया ही नहीं।…