शिव चालीसा - shiv chalisa sampurn path arth sahit

शिव चालीसा: संपूर्ण पाठ अर्थ सहित

यहाँ मिलेगा शिव चालीसा का संपूर्ण पाठ – उद्घाटन दोहा, 40 चौपाइयाँ और समापन दोहे, हर पंक्ति का सरल हिंदी अर्थ सहित। यह पारंपरिक भक्ति रचना लोक-भक्ति साहित्य की धरोहर है और सार्वजनिक क्षेत्र (public domain) में उपलब्ध है। पाठ को प्रामाणिक मुद्रित प्रतियों से मिलान कर लेने की सलाह दी जाती है, क्योंकि क्षेत्रीय परंपराओं में कुछ पंक्तियों में मामूली अंतर मिल सकता है।

शिव चालीसा – परिचय और स्रोत

“चालीसा” का अर्थ है चालीस – यानी 40 चौपाइयों की काव्य-रचना। शिव चालीसा के उद्घाटन दोहे में रचनाकार का नाम स्पष्ट है – “कहत अयोध्यादास तुम” – इसलिए परंपरागत रूप से इसे अयोध्यादास जी की रचना माना जाता है। यह रचना अवधी-मिश्रित ब्रजभाषा में है और हनुमान चालीसा की तरह ही चौपाई छंद में रची गई है।

शिव चालीसा में भगवान शिव के स्वरूप का सुंदर वर्णन है – भस्म, बाघम्बर, नीलकण्ठ, त्रिशूलधारी, जटाधारी गंगा – साथ ही उनके पराक्रम की पौराणिक कथाएं भी हैं: तारकासुर-वध, जलंधर-संहार, त्रिपुरासुर-विजय, हलाहल-पान, और श्रीराम की कमल-पूजा की कथा। चालीसा के अंतिम भाग में भक्त की विनती और नियमित पाठ के फल का वर्णन है।

दोहा – श्री गणेश वंदना

जय गणेश गिरिजा सुवन, मंगल मूल सुजान।

कहत अयोध्यादास तुम, देहु अभय वरदान॥

अर्थ: गिरिजा (पार्वती) के पुत्र, मंगल के मूल और ज्ञानी गणेश जी की जय हो। रचनाकार अयोध्यादास कहते हैं – हे गणेश, मुझे अभय (निर्भयता) का वरदान दीजिए।

संपूर्ण शिव चालीसा – 40 चौपाइयाँ अर्थ सहित

शिव-स्वरूप वर्णन (चौपाई १ से ८)

चौपाई १-२

जय गिरिजा पति दीन दयाला। सदा करत सन्तन प्रतिपाला॥

भाल चन्द्रमा सोहत नीके। कानन कुण्डल नागफनी के॥

अर्थ: हे गिरिजापति (पार्वती के पति), दीन-दयालु प्रभु की जय हो। आप सदा संतों की रक्षा और पालन-पोषण करते हैं। आपके मस्तक पर चन्द्रमा अत्यंत सुंदर लगता है और कानों में नागफनी के कुण्डल (साँप के कुण्डल) धारण किए हैं।

चौपाई ३-४

अंग गौर शिर गंग बहाये। मुण्डमाल तन क्षार लगाए॥

वस्त्र खाल बाघम्बर सोहे। छवि को देखि नाग मन मोहे॥

अर्थ: आपका शरीर गौर-वर्ण (श्वेत) है, सिर पर माँ गंगा बह रही हैं। शरीर पर मुण्डों की माला और भस्म लगी है। वस्त्र के रूप में बाघम्बर (बाघ की खाल) सुशोभित है – इस अद्भुत छवि को देखकर स्वयं साँप भी मोहित हो जाते हैं।

चौपाई ५-६

मैना मातु की हवे दुलारी। बाम अंग सोहत छवि न्यारी॥

कर त्रिशूल सोहत छवि भारी। करत सदा शत्रुन क्षयकारी॥

अर्थ: मैना माता की प्रिय पुत्री माँ पार्वती आपके बाईं ओर विराजमान हैं, जो अनुपम शोभा देती हैं। हाथ में त्रिशूल अत्यंत भव्य और प्रभावशाली दिखता है – आप सदा शत्रुओं का नाश करते हैं।

चौपाई ७-८

नन्दि गणेश सोहै तहँ कैसे। सागर मध्य कमल हैं जैसे॥

कार्तिक श्याम और गणराऊ। या छवि को कहि जात न काऊ॥

अर्थ: वहाँ नंदी और गणेश उसी तरह सुशोभित हैं जैसे सागर के मध्य कमल होते हैं। कार्तिकेय और श्याम-वर्ण गणेश (गणराऊ = गणों के राजा) की उस दिव्य छवि का वर्णन किसी से भी नहीं हो पाता।

पौराणिक कथाएं और प्रताप (चौपाई ९ से २२)

चौपाई ९-१०

देवन जबहीं जाय पुकारा। तब ही दुख प्रभु आप निवारा॥

किया उपद्रव तारक भारी। देवन सब मिलि तुमहिं जुहारी॥

अर्थ: जब भी देवताओं ने आपको पुकारा, आपने तत्काल उनका दुख दूर किया। तारकासुर ने भारी उत्पात मचाया था, तब सभी देवताओं ने मिलकर आपको प्रणाम किया और सहायता माँगी।

चौपाई ११-१२

तुरत षडानन आप पठायउ। लवनिमेष महँ मारि गिरायउ॥

आप जलंधर असुर संहारा। सुयश तुम्हार विदित संसारा॥

अर्थ: आपने तुरंत षड़ानन (छः मुख वाले कार्तिकेय) को भेजा, जिन्होंने पलक झपकते ही तारकासुर को मार गिराया। आपने स्वयं जलंधर असुर का संहार किया – आपका यश सारे संसार में प्रसिद्ध है।

चौपाई १३-१४

त्रिपुरासुर सन युद्ध मचाई। सबहिं कृपा कर लीन बचाई॥

किया तपहिं भागीरथ भारी। पुरब प्रतिज्ञा तासु पुरारी॥

अर्थ: त्रिपुरासुर से युद्ध करके और कृपा करके आपने सबको बचाया। भागीरथ ने माँ गंगा को पृथ्वी पर लाने के लिए कठोर तपस्या की – आपने उनकी पुरानी प्रतिज्ञा पूरी की और गंगा को अपनी जटाओं में धारण किया। (पुरारी = त्रिपुर के नाशक, शिव।)

चौपाई १५-१६

दानिन महँ तुम सम कोउ नाहीं। सेवक स्तुति करत सदाहीं॥

वेद नाम महिमा तव गाई। अकथ अनादि भेद नहिं पाई॥

अर्थ: दाताओं में आपके समान कोई नहीं है – सेवक सदा आपकी स्तुति करते रहते हैं। वेदों ने भी आपका नाम और महिमा गाई है, परंतु आपका अकथनीय और अनादि रहस्य आज तक किसी ने पूरी तरह नहीं जाना।

चौपाई १७-१८

प्रकटी उदधि मंथन में ज्वाला। जरत सुरासुर भए विहाला॥

कीन्ही दया तहं करी सहाई। नीलकण्ठ तब नाम कहाई॥

अर्थ: समुद्र मंथन में हलाहल विष की ज्वाला प्रकट हुई, जिससे देव और असुर दोनों जलने लगे और व्याकुल हो गए। आपने दया करके उस विष को स्वयं पी लिया और सबकी सहायता की – तभी से आपका नाम नीलकण्ठ पड़ा।

चौपाई १९-२०

पूजन रामचन्द्र जब कीन्हा। जीत के लंक विभीषण दीन्हा॥

सहस कमल में हो रहे धारी। कीन्ह परीक्षा तबहिं पुरारी॥

अर्थ: जब श्री रामचंद्र जी ने (लंका विजय से पूर्व) आपकी पूजा की और बाद में लंका जीतकर विभीषण को सौंप दी – उस पूजा में वे सहस्र (एक हजार) कमलों से आपकी अर्चना कर रहे थे। पुरारी (शिव) ने उसी समय राम की परीक्षा ली।

चौपाई २१-२२

एक कमल प्रभु राखेउ जोई। कमल नयन पूजन चहं सोई॥

कठिन भक्ति देखी प्रभु शंकर। भए प्रसन्न दिए इच्छित वर॥

अर्थ: प्रभु शिव ने एक कमल छिपा दिया। कमलनयन (कमल-नेत्र वाले) राम उसी की जगह अपनी आँख अर्पित करने को तैयार हो गए – क्योंकि वे कमल चाहते थे और पास नहीं था। यह कठिन भक्ति देखकर प्रभु शंकर अत्यंत प्रसन्न हुए और राम को इच्छित वरदान (रावण-विजय) दिया।

शिव चालीसा - shiv chalisa sampurn path arth sahit
शिव चालीसा – shiv chalisa sampurn path arth sahit

भक्त की विनती और प्रार्थना (चौपाई २३ से ३०)

चौपाई २३-२४

जय जय जय अनन्त अविनाशी। करत कृपा सब के घटवासी॥

दुष्ट सकल नित मोहि सतावै। भ्रमत रहौं मोहि चैन न आवै॥

अर्थ: हे अनंत और अविनाशी प्रभु – जय जय जय! आप सबके हृदय में निवास करते हैं (घटवासी) और कृपा करते हैं। परंतु दुष्ट लोग मुझे सदा सताते हैं; मैं भटकता रहता हूँ और मुझे कोई चैन नहीं मिलता।

चौपाई २५-२६

त्राहि त्राहि मैं नाथ पुकारो। येहि अवसर मोहि आन उबारो॥

लै त्रिशूल शत्रुन को मारो। संकट से मोहि आन उबारो॥

अर्थ: “त्राहि त्राहि” (बचाओ! बचाओ!) पुकारते हुए मैं आपसे प्रार्थना करता हूँ, हे नाथ! इस संकट के समय आकर मुझे उबारिए। त्रिशूल उठाकर शत्रुओं का नाश करिए और मुझे इस संकट से मुक्त करिए।

चौपाई २७-२८

मात-पिता भ्राता सब होई। संकट में पूछत नहिं कोई॥

स्वामी एक है आस तुम्हारी। आय हरहु मम संकट भारी॥

अर्थ: माता, पिता, भाई-बंधु – सब हैं, परंतु संकट में कोई नहीं पूछता। हे स्वामी! अब केवल आप पर ही आस है – आइए और मेरा यह भारी संकट हरिए।

चौपाई २९-३०

धन निर्धन को देत सदा हीं। जो कोई जांचे सो फल पाहीं॥

अस्तुति केहि विधि करैं तुम्हारी। क्षमहु नाथ अब चूक हमारी॥

अर्थ: आप निर्धन को धन देते हैं – जो कोई भी माँगता है, वह फल पाता है। आपकी स्तुति किस विधि से करूँ, यह मुझे नहीं पता। हे नाथ, अब मेरी सारी भूलें क्षमा करिए।

महिमा और पाठ-फल (चौपाई ३१ से ४०)

चौपाई ३१-३२

शंकर हो संकट के नाशन। मंगल कारण विघ्न विनाशन॥

योगी यति मुनि ध्यान लगावैं। शारद नारद शीश नवावैं॥

अर्थ: हे शंकर! आप संकट के नाशक, मंगल के कारण और विघ्नों के विनाशक हैं। योगी, यति और मुनिगण आपका ध्यान लगाते हैं; शारदा (सरस्वती) और देवर्षि नारद भी आपको शीश नवाते हैं।

चौपाई ३३-३४

नमो नमो जय नमः शिवाय। सुर ब्रह्मादिक पार न पाय॥

जो यह पाठ करे मन लाई। ता पर होत है शम्भु सहाई॥

अर्थ: नमो नमो – जय नमः शिवाय! ब्रह्मा सहित समस्त देवगण भी आपका पार नहीं पा सके। जो कोई मन लगाकर इस चालीसा का पाठ करे, उस भक्त पर शम्भु (शिव) की सहायता अवश्य होती है।

चौपाई ३५-३६

ॠनियां जो कोई हो अधिकारी। पाठ करे सो पावन हारी॥

पुत्र हीन कर इच्छा जोई। निश्चय शिव प्रसाद तेहि होई॥

अर्थ: जो व्यक्ति ऋण से दबा हो और इस चालीसा का पाठ करे, वह पवित्र होकर ऋण-मुक्त होने की राह पाता है। जो संतान की कामना रखते हैं, उन्हें निश्चय ही शिव-कृपा से फल प्राप्त होता है – यह परंपरागत मान्यता है।

चौपाई ३७-३८

पण्डित त्रयोदशी को लावे। ध्यान पूर्वक होम करावे॥

त्रयोदशी व्रत करै हमेशा। ताके तन नहीं रहै कलेशा॥

अर्थ: त्रयोदशी (तेरस) तिथि को पंडित को आमंत्रित करके ध्यानपूर्वक हवन करवाना चाहिए। जो नित्य त्रयोदशी का व्रत रखे (प्रदोष व्रत), उसके शरीर में किसी भी प्रकार का कलेश नहीं रहता – यह इस रचना का वचन है।

चौपाई ३९-४०

धूप दीप नैवेद्य चढ़ावे। शंकर सम्मुख पाठ सुनावे॥

जन्म जन्म के पाप नसावे। अन्त धाम शिवपुर में पावे॥

अर्थ: धूप, दीप और नैवेद्य (भोग) चढ़ाकर भगवान शंकर के सामने इस चालीसा का पाठ करना चाहिए। इससे जन्म-जन्म के पाप नष्ट होते हैं और अंत में शिवपुर (कैलाश धाम) में स्थान मिलता है – यह इस रचना की पारंपरिक मान्यता है।

समापन चौपाई

कहैं अयोध्यादास आस तुम्हारी।

जानि सकल दुःख हरहु हमारी॥

अर्थ: रचनाकार अयोध्यादास कहते हैं – हे प्रभु, मुझे केवल आपकी ही आस है। आप मेरे सारे दुख जानकर उन्हें हर लीजिए।

समापन दोहे

दोहा १

नित्त नेम कर प्रातः ही, पाठ करौं चालीसा।

तुम मेरी मनोकामना, पूर्ण करो जगदीश॥

अर्थ: रचनाकार कहते हैं – प्रतिदिन नियम से प्रातःकाल इस चालीसा का पाठ करता हूँ। हे जगदीश (समस्त जगत के ईश्वर)! मेरी सभी मनोकामनाएं पूर्ण करिए।

दोहा २

मगसर छठि हेमन्त ॠतु, संवत चौसठ जान।

अस्तुति चालीसा शिवहि, पूर्ण कीन कल्याण॥

अर्थ: मार्गशीर्ष (अगहन) मास की षष्ठी, हेमंत ऋतु, संवत चौंसठ में – इस शिव चालीसा की स्तुति को पूर्ण करके रचनाकार ने कल्याण का मार्ग प्रशस्त किया। यह रचना-काल का उल्लेख है।

शिव चालीसा पाठ की विधि – कब और कैसे पढ़ें

शिव चालीसा किसी भी समय पढ़ी जा सकती है, लेकिन कुछ विशेष अवसरों पर इसका पाठ अत्यंत फलदायी माना जाता है। नीचे एक त्वरित संदर्भ तालिका दी गई है:

विषयविवरण
सर्वश्रेष्ठ दिनसोमवार, प्रदोष व्रत (त्रयोदशी), श्रावण माह के प्रत्येक दिन, महाशिवरात्रि
सर्वश्रेष्ठ समयप्रातःकाल (ब्रह्म मुहूर्त ~4-6 बजे), प्रदोष काल (सूर्यास्त के 1.5 घंटे पहले-बाद), संध्याकाल
आसनकुश आसन, ऊनी आसन या साफ सूती वस्त्र पर पूर्व/उत्तर मुख बैठकर
पूजन सामग्रीधूप, दीप, बेलपत्र, जल, सफेद फूल, भस्म, नैवेद्य (सात्विक भोग)
मालारुद्राक्ष माला (108 मनके) – परंपरागत रूप से शिव-उपासना के लिए उत्तम
पाठ संख्यादैनिक एक बार; विशेष कामना के लिए 7, 11 या 21 बार (प्रदोष/शिवरात्रि पर)

पाठ के पूर्व स्नान करना उत्तम माना जाता है। यदि किसी कारणवश स्नान संभव न हो, तो हाथ-मुँह धोकर और शुद्ध मन से पाठ करना भी ग्रहणीय है – क्योंकि शिव-स्मरण में मन की शुद्धता शरीर की शुद्धता से अधिक महत्वपूर्ण है।

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शिव चालीसा पाठ की सबसे बड़ी चुनौती नित्य-नेम बनाए रखना है। रचनाकार स्वयं लिखते हैं – “नित्त नेम कर प्रातः ही, पाठ करौं चालीसा।” यानी नियम की ताकत। अगर आप शिव-जप के साथ-साथ एक जप काउंटर चाहते हैं – ताकि 108 का हिसाब माला गिने बिना हो जाए – तो Devta App इसी काम के लिए बना है: रोज़ दर्शन, नाम-जप काउंटर, और भक्ति की निरंतरता एक जगह।

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शिव चालीसा के नियमित पाठ के लाभ

परंपरागत शास्त्रों और भक्त-समाज की मान्यता के अनुसार शिव चालीसा के नित्य पाठ से ये लाभ बताए जाते हैं। इन्हें आस्था और भक्ति के दृष्टिकोण से पढ़ें – ये धार्मिक विश्वास हैं, चिकित्सीय दावे नहीं:

  • मानसिक शांति: लयबद्ध पाठ से मन एकाग्र होता है और नकारात्मक विचार कम होते हैं। नित्य पाठ एक शांत दिनचर्या का हिस्सा बन जाता है।
  • संकट-निवारण की भावना: भक्त का विश्वास है कि शिव चालीसा का पाठ करने से कठिन परिस्थितियों में शिव-कृपा प्राप्त होती है।
  • सोमवार व्रत में विशेष: सोमवार को व्रत रखकर शिव चालीसा का पाठ करना परंपरागत रूप से अत्यंत फलदायी माना जाता है।
  • प्रदोष व्रत का अनुष्ठान: त्रयोदशी को प्रदोष काल में शिव चालीसा पाठ को विशेष पुण्यकारी बताया गया है – रचना में स्वयं इसका उल्लेख है।
  • पापों का नाश: “जन्म जन्म के पाप नसावे” – चालीसा की 39-40वीं पंक्तियाँ स्पष्ट कहती हैं कि श्रद्धापूर्वक पाठ से पुराने पापों का क्षय होता है।
  • नित्य-नेम से भक्ति में दृढ़ता: प्रतिदिन का पाठ भक्त को अपनी साधना में टिकाए रखता है – यही “नित्त नेम” का सार है।
शिव चालीसा - shiv chalisa sampurn path arth sahit

शिव चालीसा किसने लिखी?

शिव चालीसा की रचना ‘अयोध्यादास’ जी ने की थी, जैसा कि उद्घाटन दोहे में उल्लेख है – ‘कहत अयोध्यादास तुम’। यह परंपरागत लोक-भक्ति साहित्य का अंग है।

शिव चालीसा कब पढ़नी चाहिए?

सोमवार, प्रदोष व्रत (त्रयोदशी), श्रावण माह और महाशिवरात्रि पर पाठ का विशेष फल मिलता है। प्रातःकाल या संध्याकाल का समय सर्वश्रेष्ठ माना जाता है।

क्या महिलाएं शिव चालीसा पढ़ सकती हैं?

हाँ, बिल्कुल। स्त्री हो या पुरुष, कोई भी भक्त शिव चालीसा का पाठ कर सकता है। भगवान शिव की भक्ति में किसी तरह का भेद नहीं है।

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