शिव जी के 108 नाम और उनके अर्थ – अष्टोत्तर शतनामावली
शिव जी के 108 नाम – जिन्हें अष्टोत्तर शतनामावली कहते हैं – यहाँ पूरी सूची दी गई है: देवनागरी, transliteration और हिंदी अर्थ के साथ। ये नाम शिव पुराण की प्राचीन परंपरा से लिए गए हैं और प्रत्येक नाम महादेव के एक दिव्य गुण या स्वरूप को प्रकट करता है। नीचे क्रम 1 से 108 तक पूरी सूची है – साथ में जप विधि, महत्व, और कौन-से नाम सुंदर बच्चों के नाम बन सकते हैं, यह भी बताया गया है।
अष्टोत्तर शतनामावली क्या है?
“अष्टोत्तर शत” का अर्थ है एक सौ आठ (108)। अष्टोत्तर शतनामावली वह स्तोत्र है जिसमें किसी देव के 108 नामों का संग्रह होता है। शिव जी की अष्टोत्तर शतनामावली में महादेव के वे 108 नाम हैं जो उनके विभिन्न स्वरूपों, गुणों और लीलाओं को दर्शाते हैं – जैसे पिनाकी (पिनाक धनुष वाले), गंगाधर (गंगा धारण करने वाले), मृत्युंजय (मृत्यु को जीतने वाले), और परमेश्वर (परम चेतना)।
108 की संख्या हिंदू परंपरा में विशेष पवित्र है। संस्कृत में 54 अक्षर हैं, और प्रत्येक का शिव (पुरुष) तथा शक्ति (स्त्री) रूप मिलाकर 108 बनते हैं। यही कारण है कि मालाओं में 108 मनके होते हैं और देवताओं के 108 नाम गाए जाते हैं। शिव की नामावली का एक चक्र पूरा करने का अर्थ है – उनके समस्त स्वरूपों को स्मरण करना।
शिव जी के 108 नाम – पूरी सूची अर्थ सहित
स्रोत: शिव अष्टोत्तर शतनामावली (शिव पुराण परंपरा, सार्वजनिक क्षेत्र)। सत्यापन: DrikPanchang.com और harekrsna.de से क्रॉस-चेक किए गए।
जप करते समय प्रत्येक नाम के आगे ॐ और पीछे नमः लगाएं – जैसे ॐ शिवाय नमः, ॐ महेश्वराय नमः।
| क्रम | नाम (देवनागरी) | Transliteration | अर्थ |
|---|---|---|---|
| 1 | शिव | Shiva | परम मंगलकारी, सर्वमंगल के स्रोत |
| 2 | महेश्वर | Maheshvara | देवों के भी ईश्वर, महान प्रभु |
| 3 | शम्भु | Shambhu | सुख और समृद्धि देने वाले |
| 4 | पिनाकी | Pinaki | पिनाक धनुष धारण करने वाले |
| 5 | शशिशेखर | Shashishekhar | मस्तक पर चंद्रमा धारण करने वाले |
| 6 | वामदेव | Vamadev | सर्वांग सुंदर और मनोहर |
| 7 | विरूपाक्ष | Virupaksha | विलक्षण नेत्रों वाले, तीसरे नेत्र के स्वामी |
| 8 | कपर्दी | Kapardi | जटाजूट (मुड़ी हुई जटाएं) धारण करने वाले |
| 9 | नीललोहित | Nilalohit | नीले और लोहित (लाल) रूपों वाले |
| 10 | शंकर | Shankar | सुख और मंगल प्रदान करने वाले |
| 11 | शूलपाणी | Shulapani | हाथ में त्रिशूल धारण करने वाले |
| 12 | खट्वाङ्गी | Khatvangí | खट्वांग अस्त्र धारण करने वाले |
| 13 | विष्णुवल्लभ | Vishnuvallabh | भगवान विष्णु के परम प्रिय |
| 14 | शिपिविष्ट | Shipivisht | दिव्य किरणों से प्रकाशित स्वरूप |
| 15 | अम्बिकानाथ | Ambikanath | माँ अम्बिका (पार्वती) के पति |
| 16 | श्रीकण्ठ | Shrikantha | सुंदर नीलकंठ वाले |
| 17 | भक्तवत्सल | Bhaktavatsala | भक्तों से अत्यंत प्रेम करने वाले |
| 18 | भव | Bhava | स्वयं अस्तित्व के स्वरूप, सृष्टि के आधार |
| 19 | शर्व | Sharva | पाप और कष्टों का नाश करने वाले |
| 20 | त्रिलोकेश | Trilokesh | तीनों लोकों के स्वामी |
| 21 | शितिकण्ठ | Shitikantha | नील कंठ वाले (विष-पान के बाद का स्वरूप) |
| 22 | शिवाप्रिय | Shivapriya | पार्वती (शक्ति) के परम प्रिय |
| 23 | उग्र | Ugra | अत्यंत प्रचंड और शक्तिशाली |
| 24 | कपाली | Kapali | कपाल (खोपड़ी) माला धारण करने वाले |
| 25 | कामारि | Kamari | काम (वासना) को नष्ट करने वाले |
| 26 | अन्धकासुरसूदन | Andhakasursudan | अन्धकासुर राक्षस का संहार करने वाले |
| 27 | गङ्गाधर | Gangadhar | जटाओं में गंगा को धारण करने वाले |
| 28 | ललाटाक्ष | Lalataksha | ललाट (माथे) पर तीसरा नेत्र रखने वाले |
| 29 | कालकाल | Kalakala | काल (मृत्यु) के भी काल, महाकाल |
| 30 | कृपानिधि | Kripanidhi | करुणा के अपार सागर |
| 31 | भीम | Bhima | भयंकर शक्तिशाली रूप वाले |
| 32 | परशुहस्त | Parashuhasta | हाथ में परशु (फरसा) धारण करने वाले |
| 33 | मृगपाणि | Mrigapani | हाथ में मृग (हिरण) धारण करने वाले |
| 34 | जटाधर | Jatadhar | जटाएं धारण करने वाले |
| 35 | कैलासवासी | Kailasavasi | कैलाश पर्वत पर निवास करने वाले |
| 36 | कवची | Kavachi | कवच धारण करने वाले |
| 37 | कठोर | Kathora | अत्यंत दृढ़ और प्रचंड रूप |
| 38 | त्रिपुरान्तक | Tripurantaka | त्रिपुर (तीन असुर नगरियों) का संहार करने वाले |
| 39 | वृषाङ्क | Vrishanka | जिनका चिह्न वृषभ (बैल – नंदी) है |
| 40 | वृषभारूढ | Vrishabharudha | नंदी (बैल) पर सवार |
| 41 | भस्मोद्धूलितविग्रह | Bhasmoddhulit-vigraha | भस्म (राख) से विभूषित शरीर वाले |
| 42 | सामप्रिय | Samapriya | साम वेद के गायन को प्रिय मानने वाले |
| 43 | स्वरमय | Svaramaya | स्वरों और संगीत के साक्षात् स्वरूप |
| 44 | त्रयीमूर्ति | Trayimurti | तीनों वेदों के मूर्त रूप |
| 45 | अनीश्वर | Anishvara | जिनका कोई ईश नहीं, सर्वोच्च प्रभु |
| 46 | सर्वज्ञ | Sarvagya | सब कुछ जानने वाले, सर्वज्ञाता |
| 47 | परमात्मा | Paramatma | परम आत्मा, सर्वोच्च सत्ता |
| 48 | सोमसूर्याग्निलोचन | Soma-Surya-Agni-Lochana | चंद्रमा, सूर्य और अग्नि जिनके तीन नेत्र हैं |
| 49 | हविस् | Havis | यज्ञ की आहुति के स्वरूप |
| 50 | यज्ञमय | Yajnamaya | यज्ञ के साक्षात् स्वरूप |
| 51 | सोम | Soma | चंद्रमा की तरह शीतल और शुद्ध |
| 52 | पञ्चवक्त्र | Panchavaktra | पाँच मुखों वाले (सद्योजात, वामदेव, अघोर, तत्पुरुष, ईशान) |
| 53 | सदाशिव | Sadashiva | सदा-सर्वदा मंगलकारी, नित्य शिव |
| 54 | विश्वेश्वर | Vishveshvara | समस्त विश्व के ईश्वर |
| 55 | वीरभद्र | Virabhadra | वीरों में श्रेष्ठ, दक्ष यज्ञ के विध्वंसक |
| 56 | गणनाथ | Gananatha | गणों के स्वामी |
| 57 | प्रजापति | Prajapati | प्रजा के रचयिता और पालक |
| 58 | हिरण्यरेता | Hiranyareta | स्वर्णिम तेज वाले |
| 59 | दुर्धर्ष | Durdharsha | जिन्हें कोई जीत नहीं सकता, अजेय |
| 60 | गिरीश | Girisha | पर्वतों के अधिपति, कैलाशपति |
| 61 | गिरिश | Girish | हिमालय के स्वामी (गिरि = पर्वत का स्वामी) |
| 62 | अनघ | Anagha | निष्पाप, पाप से सर्वथा परे |
| 63 | भुजङ्गभूषण | Bhujangabhushana | सर्पों से विभूषित |
| 64 | भर्ग | Bharga | समस्त पापों और दोषों का नाश करने वाले |
| 65 | गिरिधन्वा | Giridhanva | जिनका धनुष पर्वत (मेरु) है |
| 66 | गिरिप्रिय | Giripriya | पर्वतों से प्रेम करने वाले |
| 67 | कृत्तिवासा | Krittivasas | हाथी की खाल का वस्त्र धारण करने वाले |
| 68 | पुरारति | Purarati | तीन पुरों (असुर नगरियों) के शत्रु |
| 69 | भगवान् | Bhagavan | सर्वैश्वर्यसम्पन्न, परम प्रभु |
| 70 | प्रमथाधिप | Pramathadhipa | प्रमथ गणों के अधिपति |
| 71 | मृत्युञ्जय | Mrityunjaya | मृत्यु को जीतने वाले, महामृत्युंजय |
| 72 | सूक्ष्मतनु | Sukshmatanu | अत्यंत सूक्ष्म और निराकार शरीर वाले |
| 73 | जगद्व्यापी | Jagadvyapi | समस्त जगत में व्याप्त |
| 74 | जगद्गुरु | Jagadguru | संपूर्ण जगत के गुरु |
| 75 | व्योमकेश | Vyomakesha | जिनके केश आकाश में व्याप्त हैं |
| 76 | महासेनजनक | Mahasenajanaka | कार्तिकेय (महासेन) के पिता |
| 77 | चारुविक्रम | Charuvikrama | सुंदर और अद्भुत पराक्रम वाले |
| 78 | रुद्र | Rudra | भयंकर, रुलाने और रक्षा करने वाले |
| 79 | भूतपति | Bhutapati | समस्त भूत-प्राणियों के स्वामी |
| 80 | स्थाणु | Sthanu | अचल और स्थिर, कभी न बदलने वाले |
| 81 | अहिर्बुध्न्य | Ahirbudhnya | कुण्डलिनी शक्ति (सर्प) के आधार में स्थित |
| 82 | दिगम्बर | Digambara | दिशाएं ही जिनका वस्त्र है |
| 83 | अष्टमूर्ति | Ashtamurti | आठ रूपों वाले (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, सूर्य, चंद्र, यजमान) |
| 84 | अनेकात्मा | Anekatma | अनेक रूपों और आत्माओं के स्वरूप |
| 85 | सात्त्विक | Sattvika | सात्त्विक गुणों से युक्त, परम शुद्ध |
| 86 | शुद्धविग्रह | Shuddhavigraha | शुद्ध और निर्मल स्वरूप वाले |
| 87 | शाश्वत | Shashvata | सनातन, कभी न नष्ट होने वाले |
| 88 | खण्डपरशु | Khandaparasha | खंडित परशु (टूटा फरसा) धारण करने वाले |
| 89 | अज | Aja | अजन्मा, जिनका कोई जन्म नहीं |
| 90 | पाशविमोचक | Pashavimochaka | पाश (बंधनों) से मुक्त करने वाले |
| 91 | मृड | Mrida | आनंद और सुख देने वाले |
| 92 | पशुपति | Pashupati | समस्त जीव-जंतुओं के स्वामी |
| 93 | देव | Deva | दिव्य प्रकाश के स्वरूप |
| 94 | महादेव | Mahadeva | देवों के भी महान देव |
| 95 | अव्यय | Avyaya | अविनाशी, अक्षय, कभी न क्षीण होने वाले |
| 96 | हरि | Hari | समस्त बंधनों और संताप को हरने वाले |
| 97 | पूषदन्तभिद् | Pushadantabhid | पूषण के दाँत तोड़ने वाले (दक्ष यज्ञ प्रसंग) |
| 98 | अव्यग्र | Avyagra | सदा अडिग और अविचल |
| 99 | दक्षाध्वरहर | Dakshadhvarahara | दक्ष के अहंकारी यज्ञ का विनाश करने वाले |
| 100 | हर | Hara | पापों और दुखों को हरने वाले |
| 101 | भगनेत्रभित् | Bhaganetrabhid | भग देवता के नेत्र फोड़ने वाले (दक्ष यज्ञ प्रसंग) |
| 102 | अव्यक्त | Avyakta | अप्रकट, निराकार, रहस्यमय रूप |
| 103 | सहस्राक्ष | Sahasraksha | सहस्र (हजार) नेत्रों वाले, सर्वदर्शी |
| 104 | सहस्रपात् | Sahasrapada | सहस्र चरणों वाले, सर्वव्यापी |
| 105 | अपवर्गप्रद | Apavargaprada | मोक्ष (अपवर्ग) प्रदान करने वाले |
| 106 | अनन्त | Ananta | अनंत, जिनका कोई अंत नहीं |
| 107 | तारक | Taraka | सबको तारने वाले, परम मुक्तिदाता |
| 108 | परमेश्वर | Parameshvara | सर्वोच्च ईश्वर, परम चेतना |

ये 108 नाम किस ग्रंथ से हैं?
ये नाम शिव पुराण की परंपरा पर आधारित अष्टोत्तर शतनामावली से लिए गए हैं। शिव पुराण हिंदू धर्म के 18 महापुराणों में से एक है और इसमें महादेव के विभिन्न स्तोत्र, नामावलियां और उनके जप के फल का विस्तृत वर्णन मिलता है। यह नामावली सार्वजनिक क्षेत्र (public domain) में है और सदियों से मंदिरों तथा घरों में पाठ की जाती रही है।
एक महत्वपूर्ण बात: 60 और 61 क्रमांक पर दोनों नाम “गिरीश” और “गिरिश” हैं – देखने में एक जैसे, लेकिन पहले में दीर्घ “ई” है और दूसरे में ह्रस्व “इ”। यह परंपरागत नामावली की मूल संरचना है जो विभिन्न प्रामाणिक स्रोतों में इसी रूप में मिलती है। इसी तरह क्रमांक 90 पर कुछ पाठों में “पाशविमोचक” (बंधनमुक्त करने वाले) और कुछ में “पापविमोचक” (पापमुक्त करने वाले) का उल्लेख है – दोनों परंपरागत रूप मान्य हैं।
108 नामों का जप कैसे करें?
शिव जी के 108 नामों का जप करने की विधि सरल है। प्रत्येक नाम के पहले “ॐ” और अंत में “नमः” लगाएं – जैसे ॐ शिवाय नमः, ॐ महेश्वराय नमः, ॐ शम्भवे नमः। इस तरह एक चक्र में 108 बार भोलेनाथ के नाम का स्मरण पूरा होता है।
सबसे शुभ समय: सोमवार का दिन, महाशिवरात्रि, प्रदोष व्रत (त्रयोदशी तिथि को शाम को), और श्रावण माह। इन दिनों 108 नामों का पाठ विशेष फलदायी माना जाता है। सुबह स्नान के बाद या संध्याकाल में – जब मन शांत हो – जप करना सबसे उत्तम रहता है।
माला से जप: रुद्राक्ष की माला शिव जप के लिए सर्वोत्तम मानी जाती है। 108 मनकों की माला पर एक-एक नाम जपते हुए पूरा चक्र पूरा करें। माला को अनामिका (ring finger) और अंगूठे से पकड़ें, तर्जनी (index finger) का स्पर्श न करें।
बिना माला के जप: यदि माला पास नहीं है या रोज़ माला साथ रखना कठिन लगे, तो Devta App का जप काउंटर काम आता है – फोन पर एक टैप से गिनती होती रहती है और ध्यान पूरी तरह नाम पर बना रहता है। शिव नाम जप की पूरी विधि और महत्व पर हमारा विस्तृत लेख भी पढ़ें।
मानसिक जप: शिव पुराण की परंपरा में मानसिक जप (मन ही मन नाम लेना) को वाचिक जप (मुँह से बोलना) से भी श्रेष्ठ बताया गया है। यदि आप भीड़ में हैं, यात्रा में हैं, या सोने से पहले बिस्तर पर हैं – कहीं भी मन में इन 108 नामों का स्मरण कर सकते हैं। महादेव पर बंधन नहीं है – वे भक्त की भावना देखते हैं, परिस्थिति नहीं।
शिव के नामों पर आधारित बच्चों के नाम
शिव जी के 108 नाम केवल जप के लिए नहीं हैं – इनमें से कई नाम बेटों के लिए अत्यंत सुंदर और अर्थपूर्ण नाम भी हैं। ये नाम संस्कृत की शास्त्रीय परंपरा से आए हैं, आसानी से बोले जाते हैं, और हर नाम में एक गहरा आध्यात्मिक अर्थ छुपा है।
- शिव (Shiv): परम मंगलकारी – सबसे लोकप्रिय और सदाबहार नाम।
- शंकर (Shankar): सुख और मंगल देने वाले – उत्तर भारत में अत्यंत प्रचलित।
- महादेव (Mahadev): देवों के महादेव – भव्य और आत्मीय नाम।
- रुद्र (Rudra): भयंकर और रक्षक – आजकल नई पीढ़ी में बहुत पसंद किया जाने वाला नाम।
- गिरीश (Girish): पर्वतों के स्वामी – सुंदर, उच्चारण में सरल।
- भव (Bhav): अस्तित्व के स्वरूप – छोटा और सार्थक।
- तारक (Tarak): मुक्तिदाता – अर्थपूर्ण और आधुनिक दोनों।
- अनंत (Anant): अनंत, असीमित – सरल और सुंदर।
- सोम (Som): चंद्रमा जैसे शीतल – कम आम लेकिन बहुत सुंदर।
- व्योमकेश (Vyomkesh): आकाश जैसे केश वाले – साहित्यिक और अनूठा।
- अनघ (Anagh): निष्पाप – शुद्ध और दुर्लभ नाम।
- भर्ग (Bharg): पापनाशक – वेदों से लिया गया दुर्लभ नाम।
इन नामों की खासियत यह है कि ये न केवल धार्मिक दृष्टि से शुभ हैं, बल्कि आज के समय में भी सुंदर और प्रासंगिक लगते हैं। जो माता-पिता अपने बेटे को शिव का आशीर्वाद देना चाहते हैं, उनके लिए ये 108 नाम एक पूरा नाम-संग्रह हैं।

महत्व और आध्यात्मिक लाभ
शिव पुराण के अनुसार जो व्यक्ति प्रतिदिन भक्तिभाव से इन 108 नामों का पाठ करता है, उसके पाप नष्ट होते हैं, भय दूर होता है, और अंत में मोक्ष की प्राप्ति होती है। “मृत्युंजय” नाम (क्रम 71) विशेष रूप से मृत्यु के भय को दूर करने के लिए जपा जाता है – यह महामृत्युंजय मंत्र का सार है।
इन नामों में महादेव के जितने रूप हैं, वे उतने ही विरोधाभासी और अद्भुत हैं – एक ओर “कृपानिधि” (करुणा के सागर), दूसरी ओर “कालकाल” (मृत्यु के भी काल)। एक ओर “सदाशिव” (सदा मंगलकारी), दूसरी ओर “उग्र” (प्रचंड और भयावह)। यह विरोधाभास ही शिव की महिमा है – वे सृष्टि और संहार, शांति और क्रोध, गृहस्थ और वैरागी – सब कुछ एक साथ हैं। 108 नामों में यह पूरा ब्रह्मांड समाया है।
“पञ्चवक्त्र” (क्रम 52) नाम विशेष रूप से ध्यान देने योग्य है – शिव के पाँच मुख (सद्योजात, वामदेव, अघोर, तत्पुरुष और ईशान) पाँचों दिशाओं और पाँचों तत्वों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) को दर्शाते हैं। इसी तरह “अष्टमूर्ति” (क्रम 83) में बताया गया है कि शिव स्वयं ही इन आठ रूपों में जगत को धारण करते हैं।
इन 108 नामों को पढ़ते-जपते हुए धीरे-धीरे एक बात स्पष्ट होती है – महादेव केवल एक देव नहीं हैं, वे एक दर्शन हैं। “परमेश्वर” और “परमात्मा” से लेकर “तारक” और “अपवर्गप्रद” तक – ये नाम बताते हैं कि भोलेनाथ का स्मरण ही मुक्ति का सबसे सीधा पथ है। ॐ नमः शिवाय।
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शिव जी के 108 नाम किस ग्रंथ से हैं?
शिव जी के 108 नाम शिव पुराण की परंपरा के अष्टोत्तर शतनामावली से लिए गए हैं। यह प्राचीन संस्कृत स्तोत्र है जिसमें महादेव के 108 दिव्य नामों का संग्रह है।
शिव के 108 नाम जपने से क्या लाभ होता है?
शिव पुराण के अनुसार 108 नामों का जप प्रतिदिन करने से पाप नष्ट होते हैं, मनोकामनाएं पूरी होती हैं और मोक्ष का मार्ग खुलता है। महाशिवरात्रि और सोमवार को जप विशेष फलदायी माना जाता है।
क्या शिव के 108 नाम बच्चे के नाम के लिए सही हैं?
हाँ, शिव जी के 108 नामों में कई सुंदर बच्चों के नाम हैं जैसे शिव, शंकर, महादेव, रुद्र, गिरीश, अनंत, तारक आदि। ये नाम अर्थपूर्ण और शुभ माने जाते हैं।