ॐ जय जगदीश हरे: पूरी आरती, हर अंतरे का अर्थ
ॐ जय जगदीश हरे – भगवान विष्णु की स्तुति में पंडित श्रद्धाराम फिल्लौरी द्वारा 1870 में रची गई यह आरती आज हिंदू धर्म की सबसे सार्वभौमिक आरती बन चुकी है – शिव मंदिर हो, राधा-कृष्ण का दरबार हो, दुर्गा पूजा हो या घर की सन्ध्या-आरती, हर पूजा का समापन इसी से होता है। नीचे संपूर्ण आरती देवनागरी में दी गई है – सभी 8 अंतरे, हर पंक्ति के सरल हिंदी अर्थ के साथ। यह रचना सार्वजनिक डोमेन (Public Domain) में है।
रचयिता और इतिहास – यह कैसे “सबकी आरती” बनी
पंडित श्रद्धाराम फिल्लौरी (1837-1896) पंजाब के फिल्लौर के रहने वाले विद्वान, कवि और समाज-सुधारक थे। उन्होंने 1870 में यह आरती भगवान विष्णु को समर्पित करके रची। रचना का मूल भाव एकदम सरल और मर्मस्पर्शी है – ईश्वर सर्वव्यापी और अन्तर्यामी हैं, वे करुणा के सागर हैं, और हर भक्त के संकट क्षण भर में दूर करने में सक्षम हैं। उन्होंने भगवान को अपना माता-पिता, मित्र और स्वामी – सब कुछ – कहा।
शुरुआत में यह आरती उत्तर भारत के मंदिरों और पंजाबी परिवारों में गाई जाती थी। 1970 में मनोज कुमार की फिल्म “पूरब और पश्चिम” में इसे पर्दे पर प्रस्तुत किया गया, जिसके बाद यह पूरे देश के घर-घर में पहुँच गई। आज अनुराधा पौडवाल, लता मंगेशकर, और अनेक भक्ति-गायकों की रिकॉर्डिंग से यह आरती लाखों घरों में गूँजती है। इसे “राष्ट्रीय आरती” कहा जाता है क्योंकि यह किसी एक देवता तक सीमित नहीं – इसे विष्णु, शिव, दुर्गा, राम, कृष्ण, हनुमान – सबकी पूजा में गाया जाता है।
एक रोचक तथ्य: फिल्लौरी जी वही विद्वान हैं जिन्होंने प्रसिद्ध हिंदी उपन्यास “भाग्यवती” लिखा। उनकी यह आरती उनकी सबसे दीर्घजीवी और व्यापक रचना बन गई – 150 वर्षों बाद भी यह उतनी ही जीवंत है जितनी पहले थी।
ॐ जय जगदीश हरे – संपूर्ण आरती (देवनागरी पाठ और अर्थ)
इस आरती में एक टेक (मुखड़ा – बार-बार दोहराई जाने वाली प्रमुख पंक्ति) और 8 अंतरे (पद) हैं। प्रत्येक अंतरे के बाद टेक दोहराई जाती है। रचना पंडित श्रद्धाराम फिल्लौरी (1870) की है और सार्वजनिक डोमेन में है।
टेक (मुखड़ा)
ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे।
भक्त जनों के संकट, दास जनों के संकट,
क्षण में दूर करे॥
अर्थ: हे जगत के स्वामी, ईश्वर! आपकी जय हो। आप अपने भक्तों और दासों के सब संकट एक ही क्षण में दूर कर देते हैं।
अंतरा 1 – ध्यान का फल
जो ध्यावे फल पावे, दुःख बिनसे मन का।
स्वामी दुःख बिनसे मन का।
सुख सम्पत्ति घर आवे, सुख सम्पत्ति घर आवे,
कष्ट मिटे तन का॥
ॐ जय जगदीश हरे…
अर्थ: जो भी श्रद्धा से आपका ध्यान करता है, वह अपना मनचाहा फल पाता है और मन के सब दुःख मिट जाते हैं। उसके घर में सुख और सम्पत्ति आती है और शरीर के सब कष्ट दूर हो जाते हैं।
अंतरा 2 – परमात्मा ही माता-पिता
मात पिता तुम मेरे, शरण गहूँ किसकी।
स्वामी शरण गहूँ किसकी।
तुम बिन और न दूजा, तुम बिन और न दूजा,
आस करूँ मैं जिसकी॥
ॐ जय जगदीश हरे…
अर्थ: आप ही मेरे माता हैं, आप ही पिता हैं – आपके सिवा मैं किसकी शरण लूँ? आपके बिना कोई दूसरा नहीं जिससे मैं कुछ आशा रख सकूँ। आप ही एकमात्र आधार हैं।
अंतरा 3 – परमात्मा की महिमा
तुम पूरण परमात्मा, तुम अन्तर्यामी।
स्वामी तुम अन्तर्यामी।
पारब्रह्म परमेश्वर, पारब्रह्म परमेश्वर,
तुम सब के स्वामी॥
ॐ जय जगदीश हरे…
अर्थ: आप पूर्ण परमात्मा हैं और सबके हृदय के भीतर बसने वाले अन्तर्यामी हैं। आप ही परब्रह्म हैं, परमेश्वर हैं और समस्त सृष्टि के स्वामी हैं।
अंतरा 4 – करुणा के सागर
तुम करुणा के सागर, तुम पालनकर्ता।
स्वामी तुम पालनकर्ता।
मैं मूरख खल कामी, मैं सेवक तुम स्वामी,
कृपा करो भर्ता॥
ॐ जय जगदीश हरे…
अर्थ: आप करुणा के अथाह सागर हैं और सबका पालन-पोषण करते हैं। मैं मूर्ख, दुर्गुणी और विषयों में डूबा हुआ हूँ। मैं आपका सेवक हूँ, आप मेरे स्वामी हैं – हे पालनकर्ता! मुझ पर अपनी कृपा करें।

अंतरा 5 – अगोचर परमेश्वर से मिलन की जिज्ञासा
तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति।
स्वामी सबके प्राणपति।
किस विधि मिलूँ दयामय, किस विधि मिलूँ दयामय,
तुमको मैं कुमति॥
ॐ जय जगदीश हरे…
अर्थ: आप इन्द्रियों की पकड़ से परे (अगोचर) हैं और सबके प्राणों के स्वामी हैं। हे दयामय! मैं तो कुमति – अल्प बुद्धि – हूँ, किस विधि से आपसे मिल सकूँगा? यह पंक्ति उस भक्त की विनम्र पुकार है जो जानता है कि ईश्वर उसकी समझ से परे हैं, फिर भी मिलना चाहता है।
अंतरा 6 – दीनबन्धु के द्वार पर
दीनबन्धु दुखहर्ता, ठाकुर तुम मेरे।
स्वामी ठाकुर तुम मेरे।
अपने हाथ उठाओ, अपनी शरण लगाओ,
द्वार पड़ा तेरे॥
ॐ जय जगदीश हरे…
अर्थ: हे दीनों के बन्धु, दुःखों को हरने वाले ठाकुर! अपने हाथ उठाइए और मुझे अपनी शरण में लीजिए – मैं आपके ही द्वार पर पड़ा हूँ। यह अंतरा पूर्ण समर्पण का भाव है – भक्त कहता है, “अब मेरे पास और कोई रास्ता नहीं, बस आपके आगे हाथ फैलाए हूँ।”
अंतरा 7 – पाप और विकार मिटाने की प्रार्थना
विषय विकार मिटाओ, पाप हरो देवा।
स्वामी पाप हरो देवा।
श्रद्धा भक्ति बढ़ाओ, श्रद्धा भक्ति बढ़ाओ,
सन्तन की सेवा॥
ॐ जय जगदीश हरे…
अर्थ: हे देव! मेरे मन से विषय-विकार और पाप दूर कीजिए। मेरी श्रद्धा और भक्ति बढ़ाइए और मुझे संतों की सेवा करने का सौभाग्य दीजिए। यह आरती का सबसे महत्वपूर्ण अंतरा है – यहाँ भक्त भौतिक सुख नहीं, बल्कि भक्ति और निर्मलता माँगता है।
अतिरिक्त अंतरा – “तन मन धन” (अनेक प्रचलित संस्करणों में)
कई लोकप्रिय गायकों, मंदिरों और परिवारों में एक और अंतरा गाया जाता है जो अनेक प्रसिद्ध रिकॉर्डिंग में सुनने को मिलता है। यह मूल 1870 रचना में नहीं था, लेकिन भाव में बिल्कुल उसी परंपरा का है:
तन मन धन सब है तेरा, स्वामी सब कुछ है तेरा।
तेरा तुझको अर्पण, तेरा तुझको अर्पण,
क्या लागे मेरा॥
ॐ जय जगदीश हरे…
अर्थ: तन, मन और धन – सब कुछ आपका ही है। जो आपका है, वही आपको अर्पित करता हूँ – इसमें मेरा क्या है? यह भाव भगवद्गीता (9.27) के “यत् करोषि यद् अश्नासि…” के अनुरूप है – सब कुछ ईश्वर को समर्पित करने की भावना।

इस आरती का महत्व – क्यों यह सबकी आरती है
हिंदू धर्म में आरती का अर्थ है ईश्वर के सामने दीपक घुमाते हुए उनकी स्तुति करना – अंधकार को प्रकाश से दूर करना, मन के विकारों को ज्ञान के दीप से जलाना। “ॐ जय जगदीश हरे” विशेष इसलिए है क्योंकि इसमें ईश्वर को किसी एक रूप में नहीं बाँधा गया – उन्हें “जगदीश” (जगत के ईश्वर) कहा गया है। यही कारण है कि यह आरती विष्णु, शिव, दुर्गा, राम, कृष्ण – सभी की उपासना में समान रूप से गाई जाती है।
इस आरती के 8 अंतरों में एक पूरी आध्यात्मिक यात्रा है: पहले ईश्वर की महिमा (अंतरा 1-4), फिर अपनी सीमा और विनम्रता की स्वीकृति (अंतरा 5-6), और अंत में शुद्धि और भक्ति की प्रार्थना (अंतरा 7)। यह क्रम किसी भी पूजा के भाव को पूर्णता देता है। सन्त कहते हैं कि सच्ची आरती वह है जिसमें मन भी दीपक की तरह जलता है – बाहरी रोशनी के साथ भीतर का अंधेरा भी मिटता है।
प्रत्येक धर्म में एक ऐसी प्रार्थना होती है जो सब बोल सकें – “ॐ जय जगदीश हरे” हिंदू परिवारों की वह साझा भाषा है। दादी-नानी के समय से लेकर आज की पीढ़ी तक, यह आरती घर के मंदिर को जोड़ती आई है।
आरती विधि – घर पर कैसे करें
पूजा के समापन पर यह आरती गाना सरल और अत्यंत शुभ माना जाता है। यहाँ एक सरल विधि दी गई है जिसे घर में रोज़ाना अपनाएं:
- दीपक तैयार करें: घी या तेल का दीपक जलाएं। थाली में दीपक के साथ कुछ फूल और अगरबत्ती रखें।
- थाली घुमाएं: दीपक को घड़ी की दिशा में धीरे-धीरे देवता के सामने घुमाते हुए आरती गाएं या पढ़ें।
- मन लगाएं: आरती की एक-एक पंक्ति का अर्थ मन में रखते हुए गाएं – केवल शब्द नहीं, भाव से पढ़ें।
- परिवार के साथ: घर में सब मिलकर गाएं तो आरती का प्रभाव और गहरा होता है। बच्चों को भी साथ लें।
- नियमित बनाएं: रोज़ एक ही समय पर – सुबह या शाम – आरती करने से भक्ति का क्रम (Streak) बनता है।
अगर मंदिर जाना संभव न हो, या थाली और दीपक का इंतज़ाम न हो, तो Devta App में रोज़ दर्शन करें – आप घर बैठे फूल अर्पित कर सकते हैं, धूप-दीप जला सकते हैं (डिजिटल रूप में), और जप काउंटर से आरती के बाद नाम जप की गिनती भी रख सकते हैं। मन की भक्ति के लिए न मंदिर ज़रूरी है, न कोई विशेष सामग्री – बस एक सच्चा भाव।
ॐ जय जगदीश हरे आरती के रचयिता कौन हैं?
यह आरती पंडित श्रद्धाराम फिल्लौरी ने 1870 में रची थी। मूलतः भगवान विष्णु को समर्पित, आज यह लगभग सभी हिंदू देवताओं की पूजा के अंत में गाई जाती है।
इस आरती में कितने अंतरे हैं?
मूल रचना में 8 अंतरे हैं। कई लोकप्रिय रिकॉर्डिंग में ‘तन मन धन सब है तेरा’ वाला एक अतिरिक्त अंतरा भी जोड़ा जाता है, जो अनेक मंदिरों और घरों में प्रचलित है।
क्या घर पर रोज़ इस आरती को पढ़ सकते हैं?
हाँ, बिल्कुल। दीपक जलाकर पूजा के अंत में इसे पढ़ें या गाएं। Devta App में रोज़ दर्शन और जप काउंटर की मदद से इस भक्ति-आदत को हर दिन आसान बनाएं।