लक्ष्मी माता आरती - om jai lakshmi mata aarti arth sahit

ॐ जय लक्ष्मी माता: पूरी आरती अर्थ सहित

यह पृष्ठ माँ लक्ष्मी की सर्वाधिक प्रचलित आरती “ॐ जय लक्ष्मी माता” का संपूर्ण पाठ प्रस्तुत करता है – मुखड़ा और सातों पद, हर पंक्ति के अर्थ सहित। यह परंपरागत आरती सार्वजनिक भक्ति-विरासत (public domain) का हिस्सा है और सदियों से दीपावली, शुक्रवार की पूजा और प्रतिदिन की संध्या-आरती में गाई जाती है।

ॐ जय लक्ष्मी माता – संपूर्ण आरती (हर पद का अर्थ सहित)

स्रोत: यह आरती परंपरागत हिंदू पूजा-साहित्य की सार्वजनिक विरासत है, जो मौखिक परंपरा के माध्यम से पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही है। पाठ Drik Panchang और अन्य विश्वसनीय भक्ति-स्रोतों के आधार पर सत्यापित है।

मुखड़ा (Refrain – हर पद के बाद दोहराएं)

ॐ जय लक्ष्मी माता, मैया जय लक्ष्मी माता।
तुमको निशिदिन सेवत, हरि विष्णु विधाता॥
ॐ जय लक्ष्मी माता।

अर्थ: हे लक्ष्मी माता! हे मैया! आपकी जय हो। स्वयं भगवान हरि (विष्णु) और ब्रह्मा (विधाता) भी रात-दिन (निशिदिन) आपकी सेवा-उपासना करते हैं। जब स्वयं परमेश्वर आपके उपासक हैं, तो आपकी महिमा का अनुमान लगाया जा सकता है।

पहला पद

उमा, रमा, ब्रह्माणी, तुम ही जग-माता।
सूर्य-चन्द्रमा ध्यावत, नारद ऋषि गाता॥
ॐ जय लक्ष्मी माता।

अर्थ: आप ही उमा (पार्वती – शिव की शक्ति), रमा (लक्ष्मी – विष्णु की प्रिया) और ब्रह्माणी (सरस्वती – ब्रह्मा की शक्ति) के रूप में प्रकट हैं। तीनों देवियाँ वास्तव में आपके ही स्वरूप हैं – आप ही समस्त जगत की माँ हैं। सूर्य और चंद्रमा आपका ध्यान करते हैं और देवर्षि नारद आपके गुणों का गान करते हैं।

दूसरा पद

दुर्गा रूप निरंजनी, सुख सम्पत्ति दाता।
जो कोई तुमको ध्यावत, ऋद्धि-सिद्धि धन पाता॥
ॐ जय लक्ष्मी माता।

अर्थ: आप दुर्गा के निरंजन (पवित्र, निर्मल) स्वरूप हैं और सुख-सम्पत्ति प्रदान करने वाली हैं। जो भी भक्त श्रद्धा और एकाग्रता के साथ आपका ध्यान करता है, उसे ऋद्धि (समृद्धि), सिद्धि (सफलता और दक्षता) तथा धन की प्राप्ति होती है।

तीसरा पद

तुम पाताल-निवासिनि, तुम ही शुभदाता।
कर्म-प्रभाव-प्रकाशिनी, भवनिधि की त्राता॥
ॐ जय लक्ष्मी माता।

अर्थ: आप पाताल (अधोलोक) में भी निवास करती हैं, अर्थात तीनों लोकों – स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल – में आपकी उपस्थिति है और आप सबको शुभ फल देती हैं। आप प्रत्येक प्राणी के कर्मों का फल प्रकाशित करती हैं और इस भव-सागर (संसार-सागर) से पार लगाने वाली रक्षक (त्राता) हैं।

चौथा पद

जिस घर में तुम रहतीं, सब सद्गुण आता।
सब सम्भव हो जाता, मन नहीं घबराता॥
ॐ जय लक्ष्मी माता।

अर्थ: यह पद सबसे व्यावहारिक आश्वासन देता है। जिस घर में माँ लक्ष्मी का वास होता है, वहाँ सभी सद्गुण स्वयं चले आते हैं – सत्य, धैर्य, विनम्रता, परिश्रम। वहाँ असंभव भी सम्भव हो जाता है और परिवार का मन किसी भी संकट में घबराता नहीं – एक गहरा आंतरिक भरोसा बना रहता है।

पाँचवाँ पद

तुम बिन यज्ञ न होते, वस्त्र न कोई पाता।
खान-पान का वैभव, सब तुमसे आता॥
ॐ जय लक्ष्मी माता।

अर्थ: आपके बिना कोई यज्ञ (धार्मिक अनुष्ठान) पूर्ण नहीं हो सकता और कोई वस्त्र उपलब्ध नहीं हो सकता। खाने-पीने का वैभव, जीवन की हर भौतिक सुख-सुविधा – सब कुछ आपकी कृपा से प्राप्त होता है। यह पद माँ लक्ष्मी को समस्त सांसारिक समृद्धि का मूल स्रोत घोषित करता है।

छठा पद

शुभ-गुण मन्दिर सुन्दर, क्षीरोदधि-जाता।
रत्न चतुर्दश तुम बिन, कोई नहीं पाता॥
ॐ जय लक्ष्मी माता।

अर्थ: आप शुभ गुणों के सुंदर मंदिर हैं और क्षीर-सागर (दूध के महासागर) से समुद्र-मंथन के समय प्रकट हुई हैं। उस महासागर-मंथन से निकले चौदह रत्नों (रत्न चतुर्दश) में से कोई भी आपके बिना प्रकट नहीं होता – आप ही उन सबकी जन्मदात्री और साक्षी हैं। इन चौदह रत्नों में लक्ष्मी, धन्वंतरि, कामधेनु, कल्पवृक्ष और अमृत शामिल हैं।

सातवाँ पद (समापन)

महालक्ष्मीजी की आरती, जो कोई जन गाता।
उर आनन्द समाता, पाप उतर जाता॥
ॐ जय लक्ष्मी माता।

अर्थ: जो भी भक्त महालक्ष्मी जी की इस आरती को सच्चे मन और श्रद्धा-भाव के साथ गाता है, उसके हृदय (उर) में आनंद की लहर भर जाती है और उसके संचित पाप नष्ट हो जाते हैं। यह अंतिम पद आरती का फल स्पष्ट करता है – जप, पाठ और भाव तीनों का मेल ही आरती को पूर्ण बनाता है।

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यह आरती इतनी प्रचलित क्यों है

ॐ जय लक्ष्मी माता” भारत में सर्वाधिक गाई जाने वाली आरतियों में से एक है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि एक ही आरती में माँ लक्ष्मी के सभी स्वरूपों और उनकी महिमा को समेट लिया गया है – समृद्धि की देवी, तीनों लोकों की माँ, कर्म का फल देने वाली, और संसार से पार लगाने वाली त्राता।

इसके सात पदों में माँ लक्ष्मी के सात भिन्न भावों की झाँकी मिलती है: पहले पद में त्रिशक्ति स्वरूप (उमा-रमा-ब्रह्माणी), दूसरे में समृद्धि-दाता, तीसरे में कर्म-प्रकाशिनी, चौथे में गृह-देवी जो सद्गुण लाती हैं, पाँचवें में जीवन-पोषिका, छठे में क्षीरोदधि से प्रकट देवी – और सातवें पद में स्वयं आरती का फल। यह संरचना आरती को एक संपूर्ण स्तोत्र बनाती है।

एक और बात जो इस आरती को अनूठा बनाती है: इसमें माँ लक्ष्मी को केवल “धन की देवी” नहीं, बल्कि उमा (शक्ति), दुर्गा (शौर्य) और ब्रह्माणी (ज्ञान) के रूप में भी स्वीकार किया गया है। यानी भौतिक लक्ष्मी, आत्मिक शक्ति और ज्ञान – तीनों का समन्वय एक ही पाठ में है।

लक्ष्मी आरती कब करें – शुक्रवार, दीपावली और रोज़

माँ लक्ष्मी की उपासना के लिए कोई एक दिन या एक अवसर नहीं है – वे प्रतिदिन की देवी हैं। पर कुछ विशेष अवसर हैं जब यह आरती विशेष फलदायी मानी जाती है:

  • शुक्रवार (प्रत्येक): शुक्रवार लक्ष्मी जी का वार माना जाता है। शाम को घी का दीपक जलाकर आरती करना और माँ लक्ष्मी का स्मरण करना इस दिन विशेष रूप से शुभ है। परंपरा है कि शुक्रवार को व्रत रखें और संध्या-काल में यह आरती अवश्य गाएं।
  • दीपावली की रात: यह माँ लक्ष्मी का सबसे बड़ा पर्व है। अमावस्या की रात घर को दीपों से प्रज्वलित करके, गणेश-लक्ष्मी का षोडशोपचार पूजन करके और यह आरती पूरे परिवार के साथ गाना दीपावली पूजन का केंद्रीय अनुष्ठान है।
  • पूर्णिमा और अमावस्या: ये दोनों तिथियाँ लक्ष्मी पूजन के लिए शुभ मानी जाती हैं। अमावस्या विशेष रूप से पितरों के स्मरण के साथ-साथ लक्ष्मी पूजन का दिन है।
  • संध्या-काल (प्रतिदिन): सूर्यास्त के समय घर में दीप जलाना और माँ की आरती करना एक सनातन गृहस्थ-परंपरा है जिसे “दीप-आरती” कहते हैं। यह घर में सकारात्मक ऊर्जा और शांति बनाए रखने का सरल उपाय है।
  • नवरात्रि की अष्टमी: नवरात्रि में अष्टमी तिथि पर माँ महालक्ष्मी का विशेष पूजन होता है – उस दिन यह आरती गाना विशेष रूप से शुभ है।

लक्ष्मी आरती की सही विधि – कदम-दर-कदम

आरती का भाव सबसे महत्वपूर्ण है, पर सही विधि से की गई आरती और गहरा प्रभाव डालती है। सबसे सामान्य गलती यह होती है कि आरती यंत्रवत – बिना अर्थ जाने, बिना भाव के – गाई जाती है। माँ लक्ष्मी भाव की देवी हैं। इसीलिए इस पृष्ठ पर हर पद के साथ उसका अर्थ दिया गया है – ताकि जब आप गाएं, हर शब्द जीवंत हो।

  • आरती की थाली तैयार करें: पीतल या ताँबे की थाली में घी का दीपक (या पाँच दीपकों की ज्योत), लाल फूल या कमल, कुमकुम, अक्षत (चावल), और घंटी रखें। माँ लक्ष्मी को लाल रंग, कमल और गेंदे के फूल विशेष रूप से प्रिय हैं।
  • स्नान और मन की शुद्धि: आरती से पहले हाथ-मुँह धोएं, स्वच्छ वस्त्र पहनें। एक-दो गहरी सांसें लें और मन से दिनभर की थकान उतारें। आरती से पहले कुछ पल का मौन माँ का ध्यान करने में बिताएं।
  • दीप प्रज्वलन: घी का दीपक जलाएं और माँ लक्ष्मी के सामने स्थापित करें। दीपक की लौ को देखते हुए “ॐ महालक्ष्म्यै नमः” मन ही मन बोलें।
  • आरती गाएं: घंटी बजाते हुए धीरे-धीरे, भाव के साथ “ॐ जय लक्ष्मी माता” गाएं। आरती की थाली को दक्षिणावर्त (घड़ी की दिशा में) गोल-गोल घुमाएं। हर पद के बाद मुखड़ा दोहराएं।
  • परिवार की भागीदारी: आरती अकेले भी की जा सकती है, पर पूरे परिवार के साथ गाने से घर में एकता और भक्ति-भाव दोनों बढ़ते हैं – और बच्चे भी परंपरा से जुड़ते हैं।
  • आरती प्रसाद: आरती समाप्त होने पर थाली को सभी को दिखाएं, माथे पर कुमकुम-तिलक लगाएं और मिठाई या फल का प्रसाद वितरित करें।
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आरती और पूजन एक बार करना शुभ है – पर रोज़ की भक्ति-निरंतरता वह चीज़ है जो जीवन में वास्तविक बदलाव लाती है। और यहीं पर आधुनिक जीवन की सबसे बड़ी चुनौती सामने आती है – व्यस्तता, भूलना, और नियम न बन पाना।

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जिस दिन मंदिर जाना सम्भव न हो, जब पूरी पूजा नहीं हो पाती – उस दिन भी एक मिनट का दर्शन और कुछ नाम-जप माँ से जोड़े रखता है। छोटी-सी दैनिक आदत ही धीरे-धीरे माँ लक्ष्मी की कृपा का द्वार खोलती है।

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लक्ष्मी जी की आरती कब करें?

लक्ष्मी जी की आरती प्रतिदिन सुबह और शाम की जा सकती है। विशेष रूप से शुक्रवार, दीपावली, पूर्णिमा और अमावस्या को यह आरती करना अत्यंत शुभ माना जाता है। शाम को दीप जलाकर आरती करने की परंपरा सर्वाधिक प्रचलित है।

ॐ जय लक्ष्मी माता आरती में कितने पद हैं?

इस आरती में एक मुखड़ा और सात पद (अंतरे) हैं। हर पद के बाद ‘ॐ जय लक्ष्मी माता।’ का मुखड़ा दोहराया जाता है। सातवाँ और अंतिम पद आरती गाने का फल बताता है।

लक्ष्मी माता की आरती के बाद क्या करें?

आरती के बाद थाली परिवार के सभी सदस्यों को दिखाएं, माथे पर तिलक-आरती लें, प्रसाद वितरित करें और कुछ पल शांत बैठकर माँ का स्मरण करें। फिर माँ से धन, सुख और शांति की प्रार्थना करें।

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