राधा आरती - radha-aarti-vrashbhanusuta-arth-sahit

राधा जी की आरती अर्थ सहित – आरती श्री वृषभानुसुता की

राधा रानी की संपूर्ण आरती – “आरती श्री वृषभानुसुता की” – यहाँ हर पद का अर्थ सहित दी गई है। यह परम्परागत पावन आरती वृन्दावन और बरसाना के मंदिरों में प्रतिदिन मंगला और संध्या आरती के समय गाई जाती है। नीचे पूरा पाठ और भावार्थ एक साथ मिलेगा।

आरती श्री वृषभानुसुता की – संपूर्ण पाठ

यह आरती एक पारम्परिक भक्ति-रचना है। “वृषभानुसुता” का सीधा अर्थ है – वृषभान (बरसाना के राजा) की पुत्री, अर्थात श्री राधा रानी। यह आरती राधा-कृष्ण की भक्ति परम्परा में अत्यंत पूजनीय मानी जाती है।

टेक (मुखड़ा):
आरती श्री वृषभानुसुता की,
मंजुल मूर्ति मोहन ममता की ॥

पद 1:
त्रिविध तापयुत संसृति नाशिनि,
विमल विवेकविराग विकासिनि ।
पावन प्रभुपद प्रीति प्रकाशिनि,
सुन्दरतम छवि सुन्दरता की ॥
॥ आरती श्री वृषभानुसुता की..॥

पद 2:
मुनि मन मोहन मोहन मोहिनि,
मधुर मनोहर मूर्ति सोहिनि ।
अविरल प्रेम अमिय रस दोहिनि,
प्रिय अति सदा सखी ललिता की ॥
॥ आरती श्री वृषभानुसुता की..॥

पद 3:
संतत सेव्य सत मुनि जनकी,
आकर अमित दिव्यगुन गनकी ।
आकर्षिणी कृष्ण तन मनकी,
अति अमूल्य सम्पति समता की ॥
॥ आरती श्री वृषभानुसुता की..॥

पद 4:
कृष्णात्मिका, कृष्ण सहचारिणि,
चिन्मयवृन्दा विपिन विहारिणि ।
जगजननि जग दुखनिवारिणि,
आदि अनादिशक्ति विभुता की ॥
॥ आरती श्री वृषभानुसुता की..॥

समापन:
आरती श्री वृषभानुसुता की,
मंजुल मूर्ति मोहन ममता की ॥

हर पद का भावार्थ

टेक का अर्थ

“आरती श्री वृषभानुसुता की” – हम श्री वृषभान की पुत्री (राधा रानी) की आरती कर रहे हैं। “मंजुल मूर्ति मोहन ममता की” – जिनकी मूर्ति अत्यंत मनमोहक है और जो ममता से परिपूर्ण हैं। राधा रानी करुणा की सागर हैं – उनकी आरती में पहला ही शब्द यह बताता है कि वे मातृ-स्नेह और दिव्य सौन्दर्य की एकत्र मूर्ति हैं।

पहले पद का अर्थ – तीनों तापों का नाश

“त्रिविध तापयुत संसृति नाशिनि” – तीनों तापों (आधिभौतिक, आधिदैविक और आध्यात्मिक) से ग्रस्त इस संसार-चक्र को नष्ट करने वाली। “विमल विवेकविराग विकासिनि” – निर्मल विवेक और वैराग्य को जागृत करने वाली। “पावन प्रभुपद प्रीति प्रकाशिनि” – प्रभु के पावन चरणों के प्रति प्रीति को प्रकट करने वाली। इस पद में राधा जी की कृपा का सार है – वे भक्त को संसार की आसक्ति से मुक्त करके भगवान के प्रेम की ओर ले जाती हैं।

दूसरे पद का अर्थ – मुनि-मन-मोहिनि

मुनि मन मोहन मोहन मोहिनि” – जो बड़े-बड़े मुनियों और ऋषियों के मन को भी मोह लेती हैं। यह एक गहरी बात है – जो मन वर्षों की साधना से इन्द्रियों को जीत चुके हैं, वे भी राधा रानी के दर्शन में रम जाते हैं। “अविरल प्रेम अमिय रस दोहिनि” – जो अटूट प्रेम का अमृत-रस देती हैं। “प्रिय अति सदा सखी ललिता की” – जो सदा ललिता सखी को अत्यंत प्रिय हैं। सखी ललिता का उल्लेख महत्वपूर्ण है – राधा-ललिता का सखी-भाव वृन्दावन की भक्ति परम्परा में अत्यंत पूजनीय है।

तीसरे पद का अर्थ – कृष्ण की प्रिया

संतत सेव्य सत मुनि जनकी” – सदा सत्य मुनि-जनों द्वारा सेवित। “आकर अमित दिव्यगुन गनकी” – अगणित दिव्य गुणों की खान। “आकर्षिणी कृष्ण तन मनकी” – जो कृष्ण के तन और मन दोनों को आकर्षित करती हैं। यही राधा रानी की विशेषता है – वे कृष्ण को भी खींचती हैं। “अति अमूल्य सम्पति समता की” – वे अत्यंत अमूल्य सम्पत्ति और समभाव की स्वामिनी हैं।

चौथे पद का अर्थ – जगत-माता

“कृष्णात्मिका, कृष्ण सहचारिणि” – कृष्ण की आत्मा और उनकी नित्य सहचरी। “चिन्मयवृन्दा विपिन विहारिणि” – चिन्मय वृन्दावन में विहार करने वाली। “जगजननि जग दुखनिवारिणि” – जगत की माता और जगत के समस्त दुखों को दूर करने वाली। “आदि अनादिशक्ति विभुता की” – जो आदि और अनादि शक्ति की विभुता हैं। इस पद में राधा रानी को जगत-माता के रूप में देखा गया है – वे केवल कृष्ण की प्रिया नहीं, समस्त सृष्टि की माता हैं जो अपने हर भक्त के दुख हरती हैं।

यह आरती क्यों खास है

अधिकांश भक्त “राधारानी तेरी आरती गाऊँ” भजन-शैली की आरती जानते हैं, लेकिन “आरती श्री वृषभानुसुता की” एक गहन भाव-प्रधान आरती है जो संस्कृत-मिश्रित ब्रज भाषा में रचित है। इसमें राधा रानी के पाँच दिव्य पहलू एक-एक पद में उजागर होते हैं – तापनाशिनी, मुनि-मन-मोहिनी, कृष्ण-आकर्षिणी, मुनि-सेव्या और जगत-माता। यह आरती परम्परागत रूप से वृन्दावन और बरसाना के मंदिरों में गाई जाती है और इसके बोल ब्रज भक्ति-परम्परा से जुड़े हैं।

एक बात ध्यान देने की है – राधा रानी का नाम स्वयं में ही एक महामंत्र है। “राधे राधे” का उच्चारण बरसाना में अभिवादन का तरीका है। प्रेमानंद महाराज जी कहते हैं कि जो “राधे” नाम जपता है, उस पर राधा जी की कृपा स्वयं बरसती है – किसी विशेष विधि या पवित्रता की माँग किए बिना।

आरती कब और कैसे करें

राधा जी की आरती के लिए सबसे शुभ समय है प्रातःकाल (मंगला आरती) और सायंकाल (संध्या आरती)। विशेष रूप से बुधवार, राधा अष्टमी (भाद्रपद शुक्ल अष्टमी) और जन्माष्टमी के आसपास के दिन आरती का विशेष फल मिलता है।

  • थाली तैयार करें: पाँच दीपक (पंचदीप) जलाएं, धूप, फूल (कमल या गुलाब) और मिठाई रखें।
  • आरती गाते समय: थाली को घड़ी की दिशा में (clockwise) धीरे-धीरे घुमाते हुए गाएं।
  • जप के साथ जोड़ें: आरती के बाद “राधे राधे” का 108 बार मन ही मन जप करें – माला की ज़रूरत नहीं, मन की एकाग्रता काफी है।
  • रोज़ दर्शन: अगर मंदिर नहीं जा सकते, घर में ही राधा-कृष्ण की तस्वीर के सामने आरती करें। Devta App में रोज़ दर्शन का विकल्प है जहाँ आप बिना कुछ छुए, किसी भी अवस्था में दर्शन और जप कर सकते हैं।

जप की गिनती रखना हमेशा आसान नहीं होता – माला फिसल जाए या मन भटक जाए तो गिनती टूट जाती है। Devta App का जप काउंटर इसीलिए है – एक tap पर जप, गिनती अपने आप, ध्यान पूरी तरह राधे-राधे के नाम पर।

राधा रानी की कृपा किसी विशेष पवित्रता या समय की बाट नहीं जोहती। मन में “राधे राधे” उठता रहे – यही उनकी सेवा है।

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राधा जी की आरती के बोल क्या हैं?

राधा जी की सबसे पावन परम्परागत आरती है – ‘आरती श्री वृषभानुसुता की, मंजुल मूर्ति मोहन ममता की।’ यह आरती वृन्दावन और बरसाना के मंदिरों में प्रतिदिन गाई जाती है।

राधा आरती कब करें?

राधा आरती प्रतिदिन प्रातःकाल और सायंकाल करें – विशेषकर बुधवार और राधा अष्टमी को। दीपक, धूप और फूल चढ़ाकर श्रद्धापूर्वक गाएं।

वृषभानुसुता का अर्थ क्या है?

वृषभानुसुता का अर्थ है ‘वृषभान की पुत्री’ – अर्थात राधा रानी। वृषभान उनके पिता का नाम है जो बरसाना के राजा थे। इसीलिए राधा रानी को वृषभान-नन्दिनी भी कहते हैं।

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